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मणिपुर चुनाव : सत्ताधारी कांग्रेस के सामने कड़ी चुनौती, कहां खड़ी है बीजेपी?

Thu, 19 Jan 2017 12:50 PM IST
दिलीप शर्मा / गुवाहटी से बीबीसी हिंदी डॉटकॉम के लिए
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मणिपुर में मुख्यमंत्री ओकराम इबोबी के नेतृत्व में पिछले 15 सालों से कांग्रेस की सरकार चल रही हैं। इस बार भी कांग्रेस विकास के मुद्दे को लेकर मैदान में उतरेगी। जबकि बीजेपी भ्रष्टाचार मुक्त और सुशासन के वादे के साथ इस बार मणिपुर में एक पूर्ण बहुमत की सरकार बनाने का दावा कर रही हैं। एंटी इंकमबेंसी की बात कर रहे बीजेपी नेताओं का कहना है
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कि पहाड़ी और घाटी के लोगों के बीच ग़लतफ़हमी को दूर करना भी उनकी पार्टी का प्रमुख काम होगा। मणिपुर की कुल 60 विधानसभा सीटों में 20 सीट पहाड़ी इलाकों में है और 40 सीट घाटी में। पहाड़ों में बसे नगा लोगों के विरोध की वजह यह भी रही है कि राज्य प्रशासन और प्रदेश की राजनीति में हमेशा मेतई समुदाय का ही दबदबा रहा है।

मणिपुर की करीब 31 लाख जनसंख्या में 63 प्रतिशत मेतई है। मुख्यमंत्री इबोबी सिंह भी मेतई समुदाय से हैं। इसलिए मणिपुर में सरकार बनाने के लिए सभी पार्टियों को मेतई बहुल घाटी की सीटों पर ही फोकस करना पड़ता हैं। बीजेपी के खासकर राष्ट्रीय नेताओं की सक्रियता के कारण मणिपुर में जो माहौल तैयार हो रहा है 
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उससे यह जरूर कहा जा सकता है कि पार्टी ने सत्ताधारी कांग्रेस के सामने एक कड़ी चुनौती खड़ी कर दी है। मणिपुर में 4 और 8 मार्च को दो चरणों में मतदान होने हैं। साल 2012 के विधान सभा चुनाव में 42 सीट जीतने वाली कांग्रेस अबतक प्रदेश में विपक्ष नहीं होने की बात कर रही थी, लेकिन इसबार उसका सीधा मुकाबला बीजेपी से ही हैं। मणिपुर प्रदेश बीजेपी के प्रवक्ता डॉ। आरके रजंन कहते है कि अगर उनकी पार्टी की सरकार बनती है

तो खास तौर पर पहाड़ी क्षेत्रों में कनेक्टिविटी को सुधारा जाएगा। इससे पहाड़ी और घाटी के लोगों के बीच संबंधो में सुधार की संभावना बढ़ेगी। वह आरोप लगाते है कि कांग्रेस ने पहाड़ी क्षेत्र के विकास के लिए कोई काम नहीं किया। बीजेपी के वरिष्ठ नेताओं का पूरा ध्यान भले ही यूपी चुनाव पर है, लेकिन मणिपुर की जीत भी पार्टी के लिए काफी अहम हैं।

बीजेपी ने पूर्वोत्तर के सभी राज्यों को कांग्रेस से मुक्त करवाने के लिए पिछले साल राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह की देखरेख में नार्थ ईस्ट डेमोक्रेटिक अलायंस (नेडा) का गठन किया है। मणिपुर में बीजेपी के प्रभारी केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्री प्रकाश जावड़ेकर, राम माधव, अजय जामवाल, रामलाल जैसे नेता चुनाव जीतने की रणनीति तो तैयार कर रहे हैं लेकिन प्रदेश में पिछले 70 दिनों से चल रही आर्थिक नाकाबंदी वाले मसले में इन राष्ट्रीय नेताओं की भूमिका पर सवाल भी उठाए जा रहें हैं। 

इम्फाल फ्री प्रेस के संपादक प्रदीप फनजौबम कहते है कि चुनाव से ठीक पहले मुख्यमंत्री ओकराम इबोबी सिंह ने सात नए जिले गठन कर एक ऐसी राजनीतिक चाल चल दी है जिसे बीजेपी नेता संभाल नहीं पा रहें हैं। दरअसल इबोबी सरकार ने नगा बहुल इलाकों वाले पहाड़ी जिलों में विभाजन कर दो नए जिले बना दिए है। ये कूकी समुदाय की काफी पुरानी मांग थी। मणिपुर में करीब तीन लाख कूकी है।

जबकि नगा और कूकी समुदाय के बीच पुराना झगड़ा है। दोनों समुदाय के बीच टकराव के कारण हुई हिंसा में सैकड़ो लोगों ने जान गंवाई हैं। ऐसे में यूनाइटेड नगा काउंसिल (यूएनसी) के बैनर तले विभिन्न नगा संगठन आर्थिक नाकेबंदी के जरिए राज्य सरकार के इस फैसले का कड़ा विरोध कर रहें है। जबकि मणिपुर में यूएनसी के बारे में यह बात प्रचलित है कि उसका सीधा संबंध टी मुइवा के नेतृत्व वाले एनएससीएन चरमपंथी गुट के साथ है।

इसलिए कांग्रेस आर्थिक नाकेबंदी को लेकर केंद्र सरकार से मिलने वाली मदद पर सवाल खड़े कर रही है। क्योंकि यूएनसी की मदद कर रहे एनएससीएन के साथ केंद्र सरकार शांति-वार्ता कर रही है। केंद्र सरकार पर आरोप है कि वह इस चरमपंथी गुट को अपने नियंत्रण में नहीं रख पा रही है जिसके कारण मणिपुर में इतनी समस्या हो रही है।

 

हाल ही में बीजेपी छोड़कर कांग्रेस में शामिल हुए विधायक खुमुकचम जयकिशन के पार्टी छोड़ने का भी यही कारण बताया जाता है। जयकिशन प्रदेश में खाता खोलने वाले बीजेपी के दो विधायकों में से एक थे। इलाके के एक नागरिक संगठन ने केंद्र सरकार की ओर से एनएससीएन (आईएम) के साथ किए गए समझौते की रूपरेखा से जुड़ी सामग्री को पिछले 24 दिसंबर के भीतर प्रकाशित करने का अल्टीमेटम दिया था।

साथ ही सरकार के ऐसा नहीं करने पर इलाके में बीजेपी का बहिष्कार करना की बात कही थी। इसके बाद जयकिशन ने बीजेपी से इस्तीफा दे दिया था। प्रदीप का कहना है कि इबोबी की इस चाल से पहाड़ी इलाकों की सीटों में विभाजन होगा और कांग्रेस को इससे चुनावी फायदा मिलेगा। केवल कूकी बहुल इलाकों में विधानसभा की 6 सीटें हैं।

इबोबी ने इस मुद्दे को एक 'सेंटीमेंट गेम' बना दिया है। पहाड़ों पर बसे नगा जितना विरोध करेंगे घाटी में कांग्रेस का समर्थन उतना ही मजबूत होगा। वहीं प्रदेश के उप-मुख्यमंत्री गाईखांगम नगा समुदाय से है और उनकी सीट कांग्रेस के खाते में ही जाती है। प्रदीप के अनुसार एंटी इंकमबेंसी को लेकर बीजेपी को जिस तरह की भूमिका निभानी चाहिए थी, अभी तक वैसा कुछ देखने को मिला नहीं हैं। 
 

बल्कि नोटबंदी मसले को लेकर बीजेपी पर कांग्रेस का अभियान भारी पड़ रहा हैं। इस समय सबसे ज्यादा चर्चा बीजेपी में टिकट बंटवारे के मसले पर पार्टी नेताओं के बीच हो रहे टकराव को लेकर चल रही है। राजनीतिक विश्लेषक थोंगम सुनिल सिंह कहते है कि जीत के लिए बीजेपी को मजबूत उम्मीदवार मैदान में उतारने होंगे। लेकिन पार्टी की मुश्किल यह है कि एक-एक विधानसभा सीट से पांच से अधिक नेता टिकट मांग रहें हैं।

टिकट को लेकर बीजेपी में काफी घमासान हो रहा है। इसलिए पार्टी अबतक अपने उम्मीदवारों की सूची तक तैयार नहीं कर सकी है। मणिपुर प्रदेश कांग्रेस के महासचिव विद्यापति सेनजाम बीबीसी से बातचीत में यह दावा करते हैं कि इस बार भी पूर्ण बहुमत के साथ कांग्रेस सरकार बनाएगी। इबोबी सरकार ने पिछले 15 सालों में काफी विकास किया है। यह बात मणिपुर के लोग जानते है।

बीजेपी के सभी आरोपों को खारिज करते हुए कांग्रेस नेता कहते है कि बीजेपी के पास खुद का कोई उम्मीदवार ही नहीं है। यहां-वहां से तोड़कर लाए गए नेताओं के बल पर बीजेपी चुनाव लड़ना चाहती है। बीजेपी नेताओं का कहना है कि टिकट वितरण को लेकर प्रदेश के वरिष्ठ नेताओं के बीच कोई झगड़ा नहीं है। बीजेपी मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार के बिना चुनाव लड़ेगी। 
 
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राजनीति विश्लेषक जेम्स खांगेंबम इबोबी सरकार की नाकामियों का जिक्र करते हुए कहते है कि कांग्रेस 15 साल से शासन में है लेकिन मणिपुर में उग्रवाद, फर्जी मुठभेड़, विवादित अफ़्स्पा कानून, बेरोजगारी, सरकारी तंत्र में भ्रष्टाचार, आर्थिक नाकाबंदी, आम हड़ताल, पहाड़ी और घाटी के लोगों के बीच टकराव जैस मुद्दे वैसे के वैसे ही हैं। सत्ताधारी कांग्रेस ने इन मुद्दों को सुलझाने के लिए थोड़ा भी जोखिम नहीं उठाया।

अगर घाटी की सीटों पर कांग्रेस से मुकाबला करना है तो बीजेपी को इन मुद्दों को लेकर लोगों के बीच जाना होगा। मानवधिकार कार्यक्रता इरोम शर्मिला चानू की पार्टी पीपलस रिसर्जेंस एंड जस्टिस अलायंस भी मैदान में हैं। लेकिन लोगों की प्रतिक्रियाओं से यह लगता नहीं कि शर्मिला की पार्टी किसी अन्य दल के लिए कोई चुनौती खड़ा कर पाएगी। कांग्रेस और बीजेपी से मुकाबला करने के लिए सीपीआई, सीपीआई (एम), एनसीपी, आम आदमी पार्टी, जद (यू) और मणिपुर नेशनल डेमोक्रेटिक फ्रंट ने लेफ्ट डेमोक्रेटिक फ्रंट नाम से एक संयुक्त मोर्चा बनाया है।

मणिपुर पीपुल्स पार्टी और मणिपुर स्टेट कांग्रेस पार्टी नामक क्षेत्रिय दल भी मैदान में हैं। इनमें सीपीआई का पिछले चुनाव में खाता ही नहीं खुला और एनसीपी को जो एक सीट मिली थी। वह विधायक बाद में कांग्रेस में शामिल हो गया। हालांकि मणिपुर स्टेट कांग्रेस पार्टी ने पांच सीट पर जीत दर्ज की थी। जबकि तृणमूल कांग्रेस के जो चार विधायक थे वे पहले ही कांग्रेस में शामिल हो चुके हैं।
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