श्रद्धांजलि देने से किया मना
आजादी के बाद यहां भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद का सेंट्रल इंस्टीट्यूट फॉर जूट एंड एलायड रिसर्च खुल गया। बनारस की सुभाष संस्था के महासचिव तमल सान्याल ने इस इंस्टीट्यूट के भीतर जाकर आजाद हिंद फौज के शहीदों को श्रद्धांजलि देने और लोगों को इस घटना के बारे में बताने के लिए एक छोटा सा कार्यक्रम आयोजित करने की इजाजत मांगी थी, जिसके लिए इंस्टीट्यूट ने मना कर दिया है। इंस्टीट्यूट का कहना है कि इस बाबत केंद्रीय गृह मंत्रालय से बात करें।
आजादी से पहले साहेब बागान था जगह का नाम
सुभाष संस्था के महासचिव तमल सान्याल और उत्तर 24 परगना स्थित नीलगंज (बैरकपुर) में नेताजी सुभाष चंद्र मिशन के सचिव सधन बोस के मुताबिक, आजादी से पहले यहां पर साहेब बागान था। इसके अलावा यहां पर आर्मी कैंप भी स्थापित किया गया। कैंप में ब्रिटिश आर्मी के अफसर रहते थे। सितंबर 1945 के दौरान इस बागान में युद्धबंदी लाए गए। ये युद्धबंदी कोई और नहीं, बल्कि आजाद हिंद फौज के सदस्य थे।
इन्हें दुनिया के विभिन्न हिस्सों से पकड़ कर लाया गया था। 25 सितंबर की रात ब्रिटिश आर्मी ने एक योजना के तहत नरसंहार की घटना को अंजाम दिया। आर्मी कैंप में चारों तरफ खून बिखरा पड़ा था। हैरानी की बात यह थी कि सैनिकों के खून से केवल बागान ही लथपथ नहीं था, बल्कि निकटवर्ती नौआई नदी की राह भी लाल हो चुकी थी। नरसंहार के बाद ब्रिटिश आर्मी ने सैनिकों के शवों को इसी नदी में फेंक दिया था।
जांच रिपोर्ट में लिखा, घटना तो हुई, मगर शव कहां हैं?
जब यह मामला तूल पकड़ने लगा तो ब्रिटिश आर्मी की पूर्वी कमान के मेजर जनरल 6-ओएमडी को इस हत्याकांड की जांच सौंपी गई। उन्होंने जब घटनास्थल का मुआयना किया, तो सच सामने आ गया। उन्होंने अपनी रिपोर्ट में लिखा कि यहां हत्याकांड को अंजाम दिया गया है, मगर इतनी जल्दी शव कहां चले गए। चूंकि अंग्रेजों ने सभी शवों को रातों-रात नदी में फेंक दिया था, इसलिए वहां कोई सबूत नहीं बचा था।
इंडियन नेशनल आर्मी के कर्नल जीएस ढिल्लन ने अपने एक पत्र में इस हत्याकांड का जिक्र करते हुए लिखा था, 25 सितंबर की उस रात 2,300 सैनिकों को मार डाला गया था। कोलकाता यूनिवर्सिटी से नेताजी सुभाष चंद्र बोस पर शोध कर चुके डॉ. जयंत चौधरी ने लिखा है, आजाद हिंद फौज के सैनिकों के शव ट्रकों में भरकर नदी पर लाए गए। बहुत से शव ऐसे भी रहे, जो आसपास के जंगलों में फेंक दिए गए। चूंकि यह एक नरसंहार था, इसलिए शवों की संख्या भी बहुत ज्यादा थी। ताड़ के पेड़ों पर सैनिकों के शव पड़े होने के सबूत मिले थे।
लड़ाई तो जारी रहेगी...
तमल सान्याल का कहना है कि वे लंबे समय से यह लड़ाई लड़ रहे हैं। मुझे समझ नहीं आता कि इंस्टीट्यूट को आखिर क्या दिक्कत है। वह किसी दूसरे मुल्क का हिस्सा तो नहीं है न। भारत में है, वहां भारत का कानून लागू होता है। लोग उस नरसंहार के बारे में जानना चाहते हैं।
यदि हम वहां जाकर आजाद हिंद फौज के शहीदों को श्रद्धांजलि दें तो इसमें हर्ज क्या है। स्थानीय लोग जब अपने शहीदों को श्रद्धांजलि देने जाते हैं, तो उन्हें जूट संस्थान के मुख्य गेट पर ही रोक दिया जाता है। सुभाष संस्था ने सरकार से मांग की थी कि नीलगंज में श्रद्धांजलि समारोह आयोजित करने की इजाजत दी जाए। खैर, ये संघर्ष जारी रहेगा। इस बाबत जल्द ही केंद्रीय गृह मंत्रालय के साथ पत्राचार शुरू होगा।