केंद्र सरकार ने जम्मू-कश्मीर के जमात-ए-इस्लामी संगठन पर पांच साल का प्रतिबंध लगाने के बाद कश्मीर में संगठन से जुड़ी कई संपत्तियों को सील कर दिया। प्रतिबंध के फैसले के खिलाफ श्रीनगर में पूर्व मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती और पीडीपी कार्यकर्ताओं ने जमकर विरोध प्रदर्शन किया। बता दें कि शुक्रवार को दक्षिणी कश्मीर के कई जगहों पर सुरक्षाबलों की छापे की कार्रवाई के बाद जमात-ए-इस्लामी से जुड़े दो दर्जन से अधिक सदस्यों को गिरफ्तार किया था। गृह मंत्रालय ने रक्षा मामलों की कैबिनेट समिति की बैठक में सहमति के बाद यह कदम उठाया। ऐसे में अहल सवाल यह है कि आखिर जमात-ए-इस्लामी (जम्मू-कश्मीर) में ऐसा क्या कर रही है कि सरकार को इस पर प्रतिबंध लगाना पड़ा।
पहले भी लग चुका है प्रतिबंध
इससे पहले भी दो बार जमात-ए-इस्लामी संगठन की गतिविधियों के कारण इस पर प्रतिबंध लगाया जा चुका है। पहली बार जम्मू-कश्मीर सरकार ने इस संगठन को साल 1975 में दो साल के लिए प्रतिबंधित किया था। वहीं दूसरी बार केंद्र सरकार ने साल 1990 में इस पर प्रतिबंध लगाया था जो दिसंबर 1993 तक जारी रहा।
कैसे बना जमात-ए-इस्लामी
स्वतंत्रता से पहले साल 1941 में एक संगठन बनाया गया जिसका नाम जमात-ए-इस्लामी था। जमात-ए-इस्लामी का गठन इस्लामी धर्मशास्त्री मौलाना अबुल अला मौदुदी ने किया था और यह इस्लाम की विचारधारा को फैलाने का काम करता था।
हालांकि देश को स्तवंत्रता मिलने के बाद जमात-ए-इस्लामी कई धड़ों में बंट गया। जिसमें जमात-ए-इस्लामी पाकिस्तान और जमात-ए-इस्लामी हिंद शामिल है। यह जमात-ए-इस्लामी का असर था कि इससे प्रेरणा लेकर कई और संगठन भी बने, जिसमें जमात-ए-इस्लामी बांग्लादेश, जमात-ए-इस्लामी कश्मीर, जमात-ए-इस्लामी ब्रिटेन और जमात-ए-इस्लामी अफगानिस्तान कुछ प्रमुख नाम हैं। जमात-ए-इस्लामी पार्टियां दुनियाभर के मुस्लिम समूहों के साथ सक्रिय तौर पर संबंध बनाए रखती हैं।
क्या करता है जमात-ए-इस्लामी (जम्मू-कश्मीर)
जमात-ए-इस्लामी (जम्मू-कश्मीर) कश्मीर की सियासत में महत्त्वपूर्ण भूमिका रही है। साल 1971 से यह चुनावी मैदान में कूदी। हालांकि तब इसे एक भी सीट पर जीत नहीं मिली, लेकिन बाद में हुए चुनावों में इसने बेहतर प्रदर्शन किया और सियासत में अपनी मौजूदगी दर्ज कराई।
जमात-ए-इस्लामी काफी लंबे समय से कश्मीर को पाकिस्तान में मिलाने की मुहिम भी चला रहा है। उसका मानना है कि कश्मीर का विकास भारत के साथ रहकर नहीं हो सकता है। सूत्रों के मुताबिक, घाटी में कार्यरत कई आतंकी संगठन जमात के इन मदरसों और मस्जिदों में पनाह लेते रहे हैं।
बताया जाता है कि यह आतंकी संगठन हिजबुल मुजाहिदीन का राजनीतिक चेहरा है। जमात-ए-इस्लामी जम्मू कश्मीर ने ही हिजबुल मुजाहिदीन को खड़ा किया है और उसे हर तरह की मदद करता है।