एआईएडीएमके ने तो आरोप भी मढ़ दिया है कि टीडीपी दरअसल आंध्र को विशेष दर्जा दिए जाने की मांग उठाकर तमिलनाडु के नदी जल संबंधी हितों की आवाज दबा रही है। इसमें पेंच यह है कि ये दोनों दल अविश्वास प्रस्ताव के समर्थक नहीं। यानी प्रकारांतर से सरकार के साथ हैं। इसलिए टीडीपी और उसके अविश्वास प्रस्ताव को समर्थन देने वाली दूसरी पार्टियों को कहने का मौका मिल गया है कि अपने इन समर्थक दलों के जरिए एनडीए सरकार अविश्वास प्रस्ताव पर चर्चा टाल रही है।
हालांकि, गृह मंत्री राजनाथ सिंह और अनंत कुमार कह चुके हैं कि सरकार अविश्वास प्रस्ताव समेत हर एक विषय पर चर्चा के लिए तैयार है। सरकार तैयार है और विपक्ष भी उसके खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव पर बहस चाहता है। लेकिन बहस है कि हो नहीं रही! इसकी दो वजहें हो सकती हैं। पहली का संबंध आंध्र प्रदेश की राजनीति से है। आंध्र में वाइएसआर कांग्रेस ने विशेष दर्जे की मांग को लेकर टीडीपी की नाक में दम कर रखा है। दूसरे, बीजेपी अपनी विस्तारक योजना के जरिए कार्यकर्ताओं को प्रत्येक विधानसभा क्षेत्र में अपना आधार मजबूत करने के लिए तैनात कर रही है जिससे खासकर सत्तारुढ़ टीडीपी की सांसें फूली हुई हैं।
अविश्वास प्रस्ताव में कांग्रेस की नहीं थी दिलचस्पी
टीडीपी समेत दूसरे विपक्षी दलों ने बीजेपी की पैर पसारने की इस योजना का चमत्कार उत्तर-पूर्व के राज्यों और त्रिपुरा में देख लिया है। टीडीपी के लिए वाइएसआर कांग्रेस और बीजेपी के विस्तारवादी इरादे दोहरी चुनौती खड़ी कर रहे हैं। फिर सरकार उसके इस तर्क की भी आंकड़ों के साथ काट पेश कर रही है कि वादे के अनुरूप उसने आंध्र को नई राजधानी निर्माण, गरीबों के लिए घर जैसे कई कामों के लिए यथोचित रकम नहीं दी। इससे टीडीपी के लिए भविष्य संकटमय हो सकता है।
इसलिए पार्टी ने अपना सर्वोत्तम हित इसी में देखा कि विशेष दर्जे के नाम पर अविश्वास प्रस्ताव दूसरे विपक्षी दलों को जोड़कर माहौल बनाया जाए। जिससे अगले लोकसभा चुनाव में उसकी सीटें बरकरार रह सकें। टीडीपी को मालूम है कि देश में आंध्र प्रदेश के लिए विशेष दर्जे की मांग दूसरे कुछ
पिछड़े राज्यों की ऐसी ही मांगों के मद्देनजर ज्यादा लोगों के गले नहीं उतर रही। उसके अविश्वास प्रस्ताव का समर्थन करने वाले कांग्रेस, तृणमूल जैसे दल जानते हैं कि सदन की चर्चा में प्रधानमंत्री मोदी समेत हर किसी को बोलने का मौका मिलेगा। विपक्ष अपने तरकश का हर तीर तो सदन के बाहर ही चला चुका है जबकि सरकार उसकी खासकर कांग्रेस की बोलती बंद करने के लिए बहुत कुछ नया मसाला ला सकती है।
सरकार को अपने बहुमत के मद्देनजर अविश्वास प्रस्ताव में जरा भी दिलचस्पी नहीं दिखती, हालांकि मौका आया तो अपनी तैयारी सरकारी पक्ष साफ जता चुका है। ऐसे में एक संभावना यह भी बनती है कि अप्रैल के शुरू में राज्यसभा के नए सदस्यों की शपथ विधि पूरी हो जाने के बाद सदन की बैठक अपना समय पूरा किए बिना अनिश्चितकाल के लिए स्थगित हो जाए। यह चर्चा-बहस और मतभिन्नता के आधार पर चलने वाली हमारी लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए कोई अच्छी बात न होगी।