केंद्रीय मंत्रिमंडल ने बुधवार को राज्यसभा की चयन समिति की सिफारिशों को शामिल करने के बाद सरोगेसी (विनियमन) विधेयक को मंजूरी दी। प्रस्तावित बिल के मुताबिक, कोई भी महिला अपनी इच्छा से सरोगेट मां बन सकेगी। निसंतान जोड़ों के अलावा विधवा और तलाकशुदा महिलाओं को भी इसका फायदा मिलेगा।
कमेटी ने सरोगेसी बिल के पुराने ड्राफ्ट का अध्ययन करके किराए की कोख के व्यापार पर प्रतिबंध लगाने की बात कही थी। इसके साथ ही नए बिल में इसे नैतिक रूप देने की बात कही गई थी।
क्या है नए विधेयक में खास
नए विधेयक में केंद्र में नेशनल सरोगेसी बोर्ड और राज्यों में स्टेट सरोगेसी बोर्ड बनाने का प्रावधान किया गया है। ये बोर्ड ही सरोगेसी की प्रक्रिया की निगरानी करेंगे। इसके अलावा सरोगेट मदर की बीमा की सीमा को 16 महीने से बढ़ाकर 36 महीने तक कर दिया गया है। व्यावसायिक सरोगेसी पर प्रतिबंध होगा और इसके प्रचार-प्रसार पर भी रोक लगाई जाएगी।
क्या है सरोगेसी
कुछ महिलाओं के गर्भाशय में प्राकृतिक-तकनीकी कमी के कारण भ्रूण का पूरा विकास नहीं हो पाता है। भ्रूण के परिपक्व होने के पहले ही महिला का गर्भपात हो जाता है। ऐसी स्थिति में ऐसी महिलाएं मातृत्व सुख से वंचित रह जाती हैं। लेकिन अब आईवीएफ तकनीकी की सहायता से ऐसी महिलाओं को भी मातृत्व का सुख दिया जाना संभव होने लगा है।
दरअसल, ऐसी स्थिति में महिला के गर्भाशय में अंडे के निषेचित होने के बाद एक निश्चित अवधि पर उसे महिला के गर्भ से निकालकर एक अन्य स्वस्थ महिला के गर्भ में प्रत्यारोपित कर दिया जाता है जहां इसका पूर्ण विकास होता है। समय पूरा होने पर इससे एक स्वस्थ बच्चे का जन्म होता है।
इसमें पति-पत्नी और एक तीसरी महिला(किराए की कोख-सरोगेट मदर) शामिल होती है। इसे सामान्य भाषा में सरोगेसी कहा जाता है। जो महिला दूसरे के भ्रूण को अपने गर्भाशय में पालती है, उसे सरोगेट मदर के नाम से जाना जाता है।