दिल्ली में प्रदूषण का कहर जारी
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दिल्ली में प्रदूषण की मौजूदा स्थिति क्या है?
केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी) के अनुसार, दिल्ली भर में वायु गुणवत्ता 'गंभीर' श्रेणी में बनी हुई है। बुधवार सुबह को आनंद विहार में एक्यूआई 452, आरके पुरम में 433, ओखला में 426, पंजाबी बाग में 460, श्री अरबिंदो मार्ग में 382 शादीपुर में 413 और आईटीओ में 413 दर्ज किया गया।
इससे पहले मंगलवार शाम को दिल्ली के आधे से अधिक केंद्रों पर प्रदूषण का स्तर 400 पार दर्ज किया गया। 34 केंद्रों में से आनंद विहार में सबसे ज्यादा 448 एक्यूआई दर्ज किया गया। शादीपुर, डीटीयू, आरके पुरम, पंजाबी बाग, मथुरा रोड, आईजीआई एयरपोर्ट, नेहरू नगर, द्वारका सेक्टर 8, पटपडगंज, डॉ. करण सिंह शूटिंग रेंज, जहांगीरपुरी, रोहिणी, विवेक विहार, नरेला, ओखला, मुडंका, आनंद विहार में एक्यूआई 400 से अधिक रहा।
प्रदूषण कम करने के लिए दिल्ली सरकार की कृत्रिम वर्षा की योजना क्या है?
दिल्ली में हवा बेहद प्रदूषित है और दिन प्रति दिन खराब ही होती जा रही है। बिना बारिश इसका कम होना भी मुश्किल है। इसी को लेकर दिल्ली सरकार ने आईआईटी कानपुर से संपर्क साधा है। जानकारी के मुताबिक, दिल्ली सरकार और आईआईटी कानपुर के बीच राजधानी में कृत्रिम वर्षा कराने को लेकर वार्ता चल रही है। जल्द ही प्रस्ताव मिलने पर आगे की प्रक्रिया शुरू की जाएगी।
इससे पहले कृत्रिम वर्षा की तकनीक के लिए नागरिक उड्डयन महानिदेशालय (डीजीसीए) सहित सरकारी अधिकारियों से आवश्यक अनुमति प्राप्त कर ली गई है। संस्थान के कंप्यूटर विज्ञान और इंजीनियरिंग विभाग के प्रोफेसर मणींद्र अग्रवाल ने कहा कि डीजीसीए के अलावा संस्थान को राष्ट्रीय राजधानी के ऊपर एक विमान उड़ाने के लिए गृह मंत्रालय और विशेष सुरक्षा समूह (एसपीजी) (जो प्रधानमंत्री की सुरक्षा के लिए जिम्मेदार है) से भी अनुमति की आवश्यकता है।
इसे पहले सितंबर में मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने द कॉन्फेडरेशन ऑफ इंडियन इंडस्ट्री (सीआईआई) के साथ बैठक में कहा था कि चीन व दुबई में क्लाउड सीडिंग तकनीक इस्तेमाल की जा रही है, उसी तर्ज पर दिल्ली में खासकर सर्दी के तीन महीने के दौरान इसकी संभावना देखेंगे। इसमें सीआईआई, दिल्ली सरकार का साथ देगी।
क्या है आईआईटी कानपूर की कृत्रिम वर्षा तकनीक?
देश के नामचीन शिक्षण संस्थानों में शुमार आईआईटी कानपुर ने क्लाउड सीडिंग के जरिए कृत्रिम बारिश की टेक्नॉलजी विकसित की है। संस्थान ने जून में इसका परीक्षण किया था।
दरअसल, कृत्रिम वर्षा वह होती है जो कृत्रिम रूप से 'सूखी बर्फ' (जमे हुए कार्बन डाइऑक्साइड), सिल्वर आयोडाइड या अन्य उपयुक्त कणों के साथ बादलों को मंडराने से उत्पन्न होती है। इसमें कार्बन डाइऑक्साइड, सिल्वर आयोडाइड या अन्य कण संघनन नाभिक के रूप में कार्य करते हैं।
सरल शब्दों में समझें तो विमानों के जरिए बादलों पर खास तरह के रसायनों का छिड़काव किया जाता है, जिसके बाद वह वर्षा होती है। कृत्रिम बारिश कराने के लिए मौसम में विशेष परिस्थिति की जरूरत होती है। जैसे पर्याप्त नमी के साथ बादल और हवा दोनों हो। यह तकनीक ठंड और गर्म बादलों दोनों के लिए अलग-अलग होती है।
यह तकनीक काम किस प्रकार करती है?
क्लाउड सीडिंग में बादलों के निर्माण और बारिश कराने के लिए जल-अवशोषित सामग्रियों का उपयोग शामिल है ताकि उन क्षेत्रों में फसल उत्पादन बढ़ाया जा सके जहां पानी कम है। हालांकि, क्लाउड सीडिंग की प्रभावशीलता कितनी है, यह अभी भी वैज्ञानिक बहस के केंद्र में है। कुछ लोगों को चिंता है कि यह तकनीक वास्तव में नुकसान पहुंचा सकती है।
कृत्रिम वर्षा का इस्तेमाल कहां-कहां होता है:
- बौछार बढ़ाने में
- बर्फबारी बढ़ाने में
- वर्षा में वृद्धि
- ओलावृष्टि से होने वाले नुकसान को कम करने में
- कोहरा छांटने में
कृत्रिम वर्षा कराने में खर्च कितना होता है?
पर्यावरण पर राष्ट्रीय सलाहकार परिषद के सदस्य और आईआईटी कानपुर के फैकल्टी सच्चिदानंद त्रिपाठी की मानें तो क्लाउड सीडिंग प्रक्रिया के लिए विमान और आवश्यक उपकरणों के उपयोग से परियोजना की लागत बढ़ जाती है। उपकरण लगे विमान का किराया अधिक होता है और विमान में उपकरण लगाना भी महंगा सौदा है। त्रिपाठी के अनुसार, एक घंटे के अभ्यास में लगभग दो से पांच लाख रुपये खर्च होते हैं।
त्रिपाठी ने यह भी बताया कि महाराष्ट्र, कर्नाटक और आंध्र प्रदेश में कृत्रिम बारिश कराई गई है, लेकिन परियोजना की सफलता दर अभी तक ज्ञात नहीं है। इस्राइल, दक्षिण अफ्रीका और अमेरिका ने इस परियोजना को सफलतापूर्वक कार्यान्वित किया है।