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पश्चिम बंगाल: ममता के विजय रथ के ‘सारथी’ क्यों कहलाते हैं अभिषेक बनर्जी, टीएमसी में उनका रुतबा बढ़ने की क्या है कहानी

प्रतिभा ज्योति
Updated Wed, 03 Nov 2021 02:16 PM IST

सार

मीडिया की चकाचौंध से दूर रहने वाले बनर्जी ही वह शख्स माने जा रहे हैं जो न केवल पार्टी को जीत दिला रहे हैं। बल्कि आंतरिक बदलाव भी कर रहे हैं और ममता को मजबूत करने के लिए भाजपा और दूसरी पार्टियों से विधायकों और नेताओं को टीएमसी में लाने में कामयाब हो रहे हैं। 
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ममता बनर्जी और अभिषेक बनर्जी। - फोटो : ANI
30 अक्तूबर को पश्चिम बंगाल की चार विधानसभा सीटों दिनहाता, शांतिपुर, खरदाह और गोसाबा में हुए उपचुनाव में तृणमूल कांग्रेस ने भारतीय जनता पार्टी को लड़ाई से बाहर कर दिया। दिनहाता और शांतिपुर तो वह विधानसभा सीटें हैं, जहां छह महीने पहले हुए विधानसभा चुनाव में भाजपा ने जीत दर्ज की थी, लेकिन इस बार इन सीटों पर तृणमूल कांग्रेस ने भाजपा को कड़ी शिकस्त दी है।

टीएमसी की इस जीत के पीछे पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के भतीजे अभिषेक बनर्जी की बड़ी भूमिका मानी जा रही है। इतना ही नहीं इसी साल मार्च-अप्रैल में हुए विधानसभा चुनाव की बात हो या सितंबर में भवानीपुर उपचुनाव या फिर 30 अक्तूबर को हुए चार सीटों के उपचुनाव, तृणमूल कांग्रेस के विजय रथ को खींचने का श्रेय अभिषेक बनर्जी को दिया जा रहा है। माना जा रहा है कि प्रशांत किशोर के साथ मिलकर वे हर चुनाव की रणनीति बनाने में सबसे अहम भूमिका निभा रहे हैं।   


2019 के बाद पार्टी में बढ़ता गया दबदबा
जानकार बताते हैं कि 2019 के लोकसभा चुनाव के बाद, जैसे-जैसे पार्टी में उनका दबदबा बढ़ता गया वे चुनावी रणनीतिकार प्रशांत किशोर को अपने साथ ले आए। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर पार्टी की छवि और संदेश दोनों में सुधार करके पार्टी को बदलने की कोशिश की। अब पार्टी में उनका कद और रुतबा बढ़ता ही जा रहा है। अभिषेक पश्चिम बंगाल के डायमंड हार्बर सीट से चुनाव जीतकर संसद पहुंचे हैं  और पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव हैं।


 
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ममता बनर्जी और अभिषेक बनर्जी। - फोटो : ANI
30 अक्तूबर को पश्चिम बंगाल की चार विधानसभा सीटों दिनहाता, शांतिपुर, खरदाह और गोसाबा में हुए उपचुनाव में तृणमूल कांग्रेस ने भारतीय जनता पार्टी को लड़ाई से बाहर कर दिया। दिनहाता और शांतिपुर तो वह विधानसभा सीटें हैं, जहां छह महीने पहले हुए विधानसभा चुनाव में भाजपा ने जीत दर्ज की थी, लेकिन इस बार इन सीटों पर तृणमूल कांग्रेस ने भाजपा को कड़ी शिकस्त दी है।

टीएमसी की इस जीत के पीछे पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के भतीजे अभिषेक बनर्जी की बड़ी भूमिका मानी जा रही है। इतना ही नहीं इसी साल मार्च-अप्रैल में हुए विधानसभा चुनाव की बात हो या सितंबर में भवानीपुर उपचुनाव या फिर 30 अक्तूबर को हुए चार सीटों के उपचुनाव, तृणमूल कांग्रेस के विजय रथ को खींचने का श्रेय अभिषेक बनर्जी को दिया जा रहा है। माना जा रहा है कि प्रशांत किशोर के साथ मिलकर वे हर चुनाव की रणनीति बनाने में सबसे अहम भूमिका निभा रहे हैं।   

2019 के बाद पार्टी में बढ़ता गया दबदबा
जानकार बताते हैं कि 2019 के लोकसभा चुनाव के बाद, जैसे-जैसे पार्टी में उनका दबदबा बढ़ता गया वे चुनावी रणनीतिकार प्रशांत किशोर को अपने साथ ले आए। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर पार्टी की छवि और संदेश दोनों में सुधार करके पार्टी को बदलने की कोशिश की। अब पार्टी में उनका कद और रुतबा बढ़ता ही जा रहा है। अभिषेक पश्चिम बंगाल के डायमंड हार्बर सीट से चुनाव जीतकर संसद पहुंचे हैं  और पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव हैं।


 

अगरतला में अभिषेक बनर्जी - फोटो : एएनआई
ले रहे पार्टी के सभी फैसले
पश्चिम बंगाल की राजनीति की नब्ज पकड़ने वाले राजनीतिक विश्लेषक और वरिष्ठ पत्रकार गौतम लहरी कहते हैं ममता बनर्जी नीतिगत बातें तय करती हैं, लेकिन पार्टी के सभी फैसले अभिषेक बनर्जी ही ले रहे हैं। पार्टी मे किसकी क्या भूमिका होगी यह वे ही तय करते हैं। ममता ने उन्हें पार्टी के मामले में फैसले लेने की पूरी छूट दी है। वे बहुत अच्छे वक्ता और व्यवस्थापक हैं। प्रभावशाली बातचीत से लोगों को अपनी तरफ खींच लेते हैं। 

गौतम लहरी कहते हैं फिलहाल पार्टी में अभी उनके खिलाफ कोई प्रतिद्वंद्वी नजर नहीं आता। पार्टी के जो वरिष्ठ नेता हैं उन्होंने अभिषेक बनर्जी के नेतृत्व को स्वीकार कर लिया है। फिलहाल पार्टी में उनके नेतृत्व को कोई चुनौती नहीं दे रहा है और उन्होंने पार्टी पर अपनी पकड़ मजबूत कर ली है। वे लगातार पार्टी पर अपना प्रभाव बढ़ा रहे हैं और पार्टी के दूसरे सबसे महत्वपूर्ण नेता के रूप में खुद को स्थापित कर लिया है। 

हालांकि इसी वजह से अभिषेक बनर्जी आलोचनाओं का शिकार भी होते रहे हैं। भाजपा लगातार चुनाव प्रचार में ‘बुआ-भतीजे’ को निशाना बनाती रही। टीएमसी छोड़ने वाले ज्यादातर नेताओं ने भी अभिषेक बनर्जी के पार्टी पर नियंत्रण को ही बड़ी वजह बताया। कई नेताओं ने आरोप लगाया कि पार्टी "दीदी (ममता बनर्जी) नहीं चला रही हैं। 

 

मुकुल रॉय - फोटो : PTI
सुर्खियों से दूर
अभिषेक बनर्जी अपनी बुआ के विपरीत अक्सर सार्वजनिक चकाचौंध और सुर्खियों से दूर रहने वाले है। वे मीडिया के सामने बहुत कम आते हैं और कम बोलते हैं। वे टीएमसी के कोलकाता के मध्य में स्थित अपने कार्यालय से काम करते हैं, न कि पार्टी मुख्यालय से।

हालांकि,  कुछ राजनीतिक विश्लेषक दोनों नेताओं के बीच नेतृत्व कौशल से लेकर किसी भी तरह की तुलना को उचित नहीं मानते। एक वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषक ने कहा “ममता बनर्जी खुद संघर्ष करके आगे बढ़ने वाली नेता हैं जिन्होंने शून्य से शुरुआत की। वह छात्र और स्थानीय राजनीति से निकल कर आई हैं और राष्ट्रीय राजनीति में अपनी पहचान बनाई है। अभिषेक परिवारवाद  का हिस्सा हैं  और उनके नेतृत्व के पीछे काफी हद तक उनकी बुआ के राजनीतिक महत्व का योगदान है।

भाजपा-कांग्रेस से नेताओं को लाने में कामयाब
इसी साल हुए विधानसभा चुनावों में अपनी सबसे जोरदार चुनावी जीत दर्ज करने के ठीक एक महीने बाद,  दो जून को, पार्टी महासचिव अभिषेक बनर्जी तब भाजपा विधायक मुकुल रॉय की पत्नी कृष्णा रॉय का हाल-चाल लेने कोलकता के एक निजी अस्पताल पहुंचे। वे उस समय कोरोना का इलाज करा रही थीं। बनर्जी के अस्पताल पहुंचने की खबर ने कोलकता से लेकर दिल्ली तक राजनीतिक हलचल मचा दी, क्योंकि कृष्णा रॉय से मिलने अब तक भाजपा के कोई नेता नहीं पहुंचे थे। इस घटना के कुछ दिनों बाद भाजपा के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष रहे मुकुल रॉय अपने घर (टीएमसी) लौट आए। मुकुल रॉय ने 1998 में पार्टी की स्थापना में ममता बनर्जी को मदद की थी।
 

टीएमसी की सदस्यता ग्रहण करतीं सुष्मिता देव, साथ में अभिषेक बनर्जी (फाइल फोटो) - फोटो : ANI
भाजपा और कांग्रेस के नेताओं को टीएमसी में लाने का जो सिलसिला अभिषेक बनर्जी ने शुरू किया है वह अभी तक थमा नहीं है। मुकुल रॉय के पार्टी में आने के कुछ समय बाद अखिल भारतीय महिला कांग्रेस की अध्यक्ष सुष्मिता देव में भी टीएमसी में शामिल हो गईं और उन्हें हफ्तों के भीतर राज्यसभा के लिए नामित कर दिया गया। देव के राज्यसभा पहुंचने के लिए टीएमसी की राज्यसभा सांसद अर्पिता घोष ने अपना इस्तीफा दे दिया। इसी तरह पूर्व केंद्रीय मंत्री और दो बार के भाजपा सांसद बाबुल सुप्रियो भी अभिषेक बनर्जी के कहने पर टीएमसी में शामिल हो गए। इसके अलावा भाजपा के कई विधायक और भाजपा-कांग्रेस के दर्जनों नेता अब तक टीएमसी में शामिल हो चुके हैं। 

नई प्रतिभाओं को ला रहे
पार्टी के एक शीर्ष नेता ने बताया कि अभिषेक बनर्जी संगठन के पुनर्गठन और विस्तार के लिए नए क्षेत्रों की तलाश में धीरे-धीरे और लगातार नई प्रतिभाओं को पार्टी में ला रहे हैं और दूसरी तरफ संगठनात्मक बदलाव कर रहे हैं। सयोनी घोष को युवा विंग का अध्यक्ष बनाने की बात हो या भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) के पूर्व सांसद रीताब्रत बनर्जी को टीएमसी के श्रमिक विंग के प्रमुख के रूप में नियुक्ति, इसमें अभिषेक बनर्जी ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। पार्टी कुछ समय पहले एक व्यक्ति-एक पद की नीति लेकर आई है जिसके परिणामस्वरूप कई मंत्रियों ने संगठनात्मक पदों को छोड़ दिया और जिला स्तर पर एक नया नेतृत्व उभरा है।
 

तृणमूल कांग्रेस के महासचिव अभिषेक बनर्जी - फोटो : एएनआई
चुनावी रणनीति बनाने में अहम भूमिका
जानकार बताते हैं कि अभिषेक बनर्जी पश्चिम बंगाल के बाहर टीएमसी के विस्तार की योजना से लेकर विपक्ष के मुख्य नेता के तौर पर पैन इंडिया ममता बनर्जी की स्वीकार्यता बढ़ाने की रणनीति पर काम कर रहे हैं। वे धीरे-धीरे अन्य राज्यों में चुनाव लड़ने की तैयारी कर रहे हैं ताकि कई राज्यों में टीएमसी की मौजूदगी हो जाए और राष्ट्रीय राजनीति में भी अपनी धाक जमाने की पार्टी की महत्वाकांक्षा को जमीन मिल सके।

अभिषेक बनर्जी ने त्रिपुरा का दौरा किया और वहां इस बात पर जोर दिया कि उनकी पार्टी पूरी गंभीरता से यहां विधानसभा चुनाव लड़ेगी। इसी तरह पार्टी ने गोवा में भी पूरी ताकत के साथ चुनाव लड़ने का फैसला किया है। पार्टी सूत्र बताते हैं कि 2024 में होने वाले लोकसभा चुनाव से पहले अभिषेक बनर्जी की योजना 2023 तक कई छोटे राज्यों में होने वाले विधानसभा चुनाव में अपनी मौजदूगी दर्ज कराने की है। गोवा और त्रिपुरा में चुनाव लड़ने का फैसला इसकी ही कड़ी है।

गौतम लहरी कहते हैं अभिषेक बनर्जी हर चुनाव की रणनीति तैयार कर रहे हैं। उपचुनाव में भी उन्होंने एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उन्होंने न केवल पूरे चुनाव अभियान की कमान अपने हाथों में रखी थी बल्कि वे चुनाव प्रचार भी करते नजर आए। वे एक चुनाव जीतते ही तुरंत दूसरे चुनाव की तैयारी में जुट जाते हैं और पार्टी नेताओं के साथ खड़े नजर आते हैं। वे जिस राज्य में चुनाव लड़ना चाहते हैं वहां पहले युवा नेताओं की फौज भेज कर शुरूआती तैयारी की जिम्मेदारी सौंपते हैं और तुरंत बाद वहां पहुंच जाते हैं।
 

अभिषेक बनर्जी और उनकी पत्नी रुजिरा (फाइल फोटो) - फोटो : Social Media
निशाने पर बनर्जी
इस साल हुए पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव से पहले ही अभिषेक बनर्जी केंद्रीय जांच एजेंसियों की जांच के दायरे में आ गए हैं। उन्हें कोयला चोरी घोटाले में सीबीआई के समन का सामना करना पड़ा। प्रवर्तन निदेशालय ने मनी लॉन्ड्रिंग से जुड़े मामले में उन्हें और उनकी पत्नी को भी तलब किया। हालांकि उन्होंने बार-बार कहा है कि टीएमसी जांच एजेंसियों के समन और नोटिस के आगे नहीं झुकेगी। अभिषेक बनर्जी ने कहा कि भाजपा केंद्रीय जांच एजेंसियों का राजनीतिक विरोधियों के खिलाफ इस्तेमाल कर रही है। वे जांच एजेंसियों की कार्रवाई को भाजपा का प्रतिशोध बताते हैं.

अगला लक्ष्य क्या 
सूत्र बताते हैं कि अभिषेक बनर्जी ने पार्टी का अगला लक्ष्य यह तय किया है कि 2019 के लोकसभा चुनाव में उनके वोट शेयर का जो नुकसान हुआ है उसे दोबारा हासिल किया जाए। पिछले लोकसभा चुनाव में पश्चिम बंगाल की 42 में से 18 सीटें भाजपा ने जीतीं थीं। जबकि राज्य में सत्तारूढ़ टीएमसी को 42 में से मात्र 22 सीटों से ही संतोष करना पड़ा है। पार्टी भाजपा के खाते में गई सीटें उससे छीनना चाहती है। 

पश्चिम बंगाल की राजनीति को समझने वाले बताते हैं कि हालांकि भाजपा के खाते से पूरी 18 सीटें तो नहीं छीनी जा सकती, लेकिन उसे कम जरूर किया जा सकता है। लेकिन अभिषेक के लिए असली परीक्षा तृणमूल कांग्रेस को एक राष्ट्रीय खिलाड़ी बनाना होगी।  2022 में त्रिपुरा में होने वाले विधानसभा चुनाव उनके लिए पहली चुनौती हो सकती है।
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