असम में क्या भविष्य है?
सवाल तृणमूल कांग्रेस में शामिल हुई एक नेता का है। वह असम में बराक घाटी में अपनी पकड़ रखती हैं। उनके क्षेत्र से दो लोकसभा सीटें आती हैं। खुलकर कहती हैं कि कांग्रेस में रहते हुए वहां से सांसद बनने की उम्मीद खत्म हो रही थी। वहां बड़ी संख्या में बंगाली मूल के हैं और दीदी ममता बनर्जी जैसे व्यक्तित्व की पार्टी वहां सफलता पा सकती है। दरअसल मुकाबले में भाजपा है और भाजपा को हराने की क्षमता दीदी में है।
दूसरा सवाल, उड़ीसा में नवीन पटनायक की राजनीति को क्या कांग्रेस चुनौती दे सकती है? फिर वहां नवीन पटनायक के बाद भाजपा जो सपना देख रही है, उसका मुकाबला कौन करेगा? तृणमूल के नेता यहां कांग्रेस की तुलना में ममता बनर्जी को कहीं अधिक उपयुक्त पाते हैं। शांतनु बनर्जी कहते हैं कि मुझे तो उत्तर प्रदेश के तमाम शहरों में बड़ी संख्या में बंगालियों के होने की जानकारी है। अकेले बनारस और इलाहाबाद में बड़ी संख्या में हैं। शांतनु कहते हैं कि ममता बनर्जी को ब्राह्मण भी हैं। उन्हें एक संभावना दिखाई पड़ रही है कि ममता बनर्जी अगले साल उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के दौरान भाजपा को रोकने के लिए कोई बड़ा निर्णय ले सकती हैं।
कैसे रोकेंगे भाजपा को
तृणमूल के नेता मानते हैं कि बिना विपक्षी दलों की एकता के राष्ट्रीय स्तर पर भाजपा को रोकना मुश्किल है। सुमित कोचगवे कहते हैं कि इसके लिए सभी राजनीतिक दलों को दलगत भावना और निजी स्वार्थ से उपर उठना होगा। यह काफी मुश्किल भी है। प्रशांत किशोर के साथ बिहार विधानसभा चुनाव 2015 और आंध्र प्रदेश विधानसभा चुनाव में काम कर चुके सूत्र का कहना है कि आप देख लीजिए। जिन राज्यों में मुख्यमंत्री का चेहरा दमखम वाला है, वहां सरकार ठीक चल रही है। इसके लिए वह राजस्थान, महाराष्ट्र, पंजाब, पश्चिम बंगाल, बिहार, तमिलनाडु, उड़ीसा, उत्तर प्रदेश, दिल्ली का देते हैं। कहते हैं कि अब इसमें एक नाम असम का भी जुड़ रहा है।
इससे साफ संदेश जाता है कि जनता नेता के रूप में निर्णायक, मजबूत व्यक्तित्व को पसंद करती है। वह कहते हैं कि बिहार में नीतीश कुमार के पार्टी की सीटें कितना भी कम आईं तो भी 40 के ऊपर रहीं। येदियुरप्पा कर्नाटक में अंदरुनी राजनीति के कारण भले हटा दिए गए, लेकिन जनता में उनकी लोकप्रियता में कोई बड़ी गिरावट नहीं आई। आप प्रधानमंत्री की ही छवि को देख लीजिए। महज 28 लोकसभा सीटों वाले गुजरात के मुख्यमंत्री ने दमदार छवि के बूते खुद को राष्ट्रीय बनाया। इसे समझना होगा। इसलिए यदि विपक्ष एक मजबूत, निर्णायक चेहरा रख पाएगा तो देश की राष्ट्रीय राजनीति भी बदलेगी।