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विकास दुबे एनकाउंटर मामले में सुप्रीम कोर्ट कर सकता है फैक्ट फाइंडिंग कमेटी का गठन

Wed, 15 Jul 2020 06:32 AM IST
संजीव कुमार झा अमर उजाला नेटवर्क, नई दिल्ली
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विकास दुबे - फोटो : ANI
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सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को यह संकेत दिया कि वह हैदराबाद एनकाउंटर की ही तरह यूपी के गैंगस्टर विकास दुबे और उसके साथियों के एनकाउंटर को लेकर फैक्ट फाइंडिंग कमेटी का गठन कर सकता है। वही यूपी सरकार ने इस मामले में अपना पक्ष रखने के लिए अदालत से समय मांगा है।

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चीफ जस्टिस एस ए बोबडे, जस्टिस आर सुभाष रेड्डी और जस्टिस ए एस बोपन्ना की पीठ ने मंगलवार को सुनवाई के दौरान कहा कि सुप्रीम कोर्ट आमतौर पर इस तरह के मामले पर विचार करने से दूर ही रहता है। पीठ ने कहा कि वह हैदराबाद एनकाउंटर की तरह ही इस मामले में भी फैक्ट फाइंडिंग कमेटी का गठन करने पर विचार कर रही है।

सुनवाई के दौरान यूपी सरकार की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि राज्य सरकार ने भी इस संबंध में कई कदम उठाए हैं। उन्होंने पीठ से कहा कि राज्य सरकार को अपना पक्ष रखने के लिए वक्त दिया जाए। उन्होंने कहा कि हो सकता है कि राज्य सरकार के प्रयासों को देखने के बाद सुप्रीम कोर्ट को कोई आदेश देने की जरूरत ही न पड़े। इसके बाद पीठ ने  यूपी सरकार को गुरुवार तक जवाब दाखिल करने के लिए कहा। अगली सुनवाई सोमवार को होगी।
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शीर्ष अदालत तीन याचिकाओं पर सुनवाई कर रही है। इन याचिकाओं में विकास दुबे और उसके गैंग के कई साथियों के एनकाउंटर की जांच सीबीआई या एनआईए या अदालत की निगरानी में कराने की मांग की गई है। याचिकाओं में कहा गया है कि इस मामले की निष्पक्ष जांच होनी चाहिए जिससे कि इन घटनाओं के पीछे शामिल पुलिसकर्मियों व नेताओं व अन्य लोगों की भूमिका का पता चल सके।

याचिकाओं में कहा गया है कि कानून के शासन को राज्य मशीनरी की इस तरह की कार्रवाइयों के द्वारा बहाल नहीं किया जा सकता। याचिकाकर्ता वकील का कहना है कि अगर पुलिस द्वारा की गई इन कार्रवाई को जांच के दायरे में नहीं लाया गया तो इससे अराजकता पैदा हो जाएगी।

उन्होंने यह भी कहा कि जीवन को कानून द्वारा स्थापित एक प्रक्रिया द्वारा ही लिया जा सकता है। याचिकाओं में यह भी सवाल उठाया कि क्या पुलिस द्वारा दिए गए त्वरित न्याय को कोई लोकतांत्रिक समाज इजाजत देता है? यह पता लगाने की जरूरत है कि विकास दुबे के घर को ध्वस्त करके और उसे खत्म करके कुछ चुनिंदा लोगों को बचाने की कोशिश तो नहीं की गई है। वहीं गैरसरकारी संगठन पीयूसीएल ने इस पूरे मामले की एसआईटी जांच कराने की मांग की है।

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