सुप्रीम कोर्ट ने कमजोर वर्ग की गर्भवती महिलाओं और दुधमुंहे बच्चों की माताओं को मातृत्व लाभ योजना के तहत 6 हजार रुपये दिए जाने पर केंद्र सरकार से रिपोर्ट मांगी है। शीर्ष कोर्ट मंगलवार को एनजीओ पीपुल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज की उस याचिका पर सुनवाई कर रहा था जिसमें दावा किया गया था कि लॉकडाउन के दौरान केंद्र ने लाभार्थियों को राशि का भुगतान नहीं किया है।
सीजेआई एसए बोबडे, जस्टिस आर सुभाष रेड्डी और जस्टिस एएस बोपन्ना की पीठ के समक्ष एनजीओ के वकील कोलिन गोनसाल्वेज ने बताया कि 2017 में शुरू की गई मातृत्व लाभ योजना को सरकार ने लॉकडाउन शुरू होते ही बंद कर दिया है।
इस पर पीठ ने केंद्र की ओर से मौजूद सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता को स्टेटस रिपोर्ट पेश करने का निर्देश दिया। गोनसाल्वेज ने पीठ को बताया कि इस योजना में शिशु के जन्म से पहले खुद की और बाद में शिशु की देखभाल के लिए काम छोड़ने वाली कमजोर वर्ग की महिलाओं की आर्थिक मदद का प्रावधान किया गया था। राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा कानून की धारा 4बी के तहत ऐसी माताओं को पर्याप्त पोषण मुहैया कराने के लिए सरकार द्वारा 6000 रुपये दिए जाते थे।
गोनलाल्वेज ने कोर्ट को बताया कि लॉकडाउन के दौरान इस योजना के तहत भुगतान नहीं किया जा रहा है। ऐसे में गरीब तबके की माताओं को पैसों की कमी के कारण पर्याप्त पोषण नहीं मिल पा रहा है। इससे मातृ शिशु मृत्युदर में इजाफा होने का खतरा बढ़ गया है। इस पर पीठ ने सरकार से पूछा कि क्या इस योजना के तहत भुगतान किया जा रहा है या नहीं।