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200 शब्दों में समझिए मध्यप्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ के नतीजों के मायने

Tue, 11 Dec 2018 09:16 PM IST
अनिल पांडेय, नई दिल्ली
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राहुल गांधी - फोटो : PTI
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2013 के विधानसभा चुनावों में मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान में भारतीय जनता पार्टी ने सत्ता हासिल की थी। इसके बाद हुए आम चुनावों में नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में केंद्र में भाजपा ने प्रचंड बहुमत हासिल किया था। उस समय एक नारा बनाया गया था, कांग्रेस मुक्त भारत का।

 

कई विधानसभा चुनावों में यह नारा फलीभूत होता भी दिखा। लेकिन 2018 में कर्नाटक में ऐसा नहीं हुआ। इसके बाद 11 दिसंबर को आए नतीजों ने तो मानो इस जुमले की हवा पूरी तरह से निकाल दी है। भाजपा के मजबूत किलों में शामिल छत्तीसगढ़ और राजस्थान में परचम बदल गया है। मध्यप्रदेश का किला भी देर रात ढह गया। अब यहां की प्राचीर पर पंजे की छाप आ गई है। माना जा रहा है कि यहां कमलनाथ के हाथों में सत्ता की कमान सौंपी जा सकती है। 

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यह सवाल आपके मन-मस्तिष्क में भी उठ रहा होगा कि आखिर यह बदलाव हुआ कैसे। दरअसल इसके पीछे एंटी इनकमबेंसी, यानी मौजूदा सरकार से नाराजगी भी बड़ी वजह है। माना जा रहा था कि अजीत जोगी और बसपा का गठबंधन कांग्रेस के वोट काटेगा। लेकिन ऐसा हुआ नहीं। क्यों। क्योंकि, लोगों की नाराजगी जोगी या कांग्रेस से नहीं बल्कि सत्तारूढ़ भाजपा से थी। इतनी ज्यादा नाराजगी थी कि भाजपा के अलावा सबको वोट मिला। जोगी-बसपा ने भी भाजपा से नाराज वोट हासिल किए। 

विकल्पहीनता का लाभ मिला

जनता इस कदर नाराज थी कि जहां भी कांग्रेस मजबूत दिखी, उसे वोट दे दिया। छत्तीसगढ़ में अजीत जोगी और बहुजन समाज पार्टी, मध्यप्रदेश में कांग्रेस और बसपा, राजस्थान में कांग्रेस और निर्दलीयों को भी वोट दे दिया। यदि मध्यप्रदेश की बात करें तो यहां आरक्षण, किसान आंदोलन और एंटी इनकमबैंसी सत्ता गंवाने की सबसे बड़ी वजह रहे। 

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