उत्तराखंड की सियासी गुत्थी सुलझाने पर बुरी तरह उलझी भाजपा को अब महज चमत्कार का ही अंतिम आसरा है। राष्ट्रपति शासन मामले में हालांकि सुप्रीम कोर्ट का फैसला नहीं आया है, मगर पार्टी में इस मामले में हुई सुनवाई के दौरान सर्वोच्च अदालत की टिप्पणी से बेचैनी है।
राज्य इकाई के नेता दबी जुबान से रावत सरकार को गिराने का अभियान पूरा होने से पहले ही पार्टी नेतृत्व की ओर से पूर्व मुख्यमंत्री भगत सिंह कोश्यारी को सरकार की कमान दिए जाने के संकेत को भी बड़ी भूल मान रहे हैं।
इनका मानना है कि अभियान पूरा किए बिना कोश्यारी पर दांव लगाने के कारण राज्य इकाई के एक असरदार नेता ने कांग्रेस विधायकों को तोड़ने की मुहिम को बीच में ही रोक दिया। इस बीच स्थिति को हाथ से निकलते देख सरकार ने राष्ट्रपति शासन की संसद से मूंजरी लेने की अनिवार्यता की पहल राज्यसभा से करने का मन बनाया है। गौरतलब है कि उच्च सदन में सरकार के पास बहुमत नहीं है।
राज्य से रावत सरकार को बेदखल करने के अभियान से जुड़े एक वरिष्ठ नेता के मुताबिक राष्ट्रपति शासन पर सुप्रीम कोर्ट की पहली ही सुनवाई के दौरान की गई टिप्पणियां पार्टी और केंद्र सरकार के लिए शुभ संकेत नहीं है।
दरअसल सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई के दौरान न केवल सदन में शक्तिपरीक्षण को महत्वपूर्ण माना, बल्कि विधानसभा स्पीकर की अधिकार को भी खासा महत्व दिया। उक्त नेता के मुताबिक हालांकि अभी फैसला नहीं आया है और सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र से 7 सवाल पूछे हैं। मगर जिस तरह के सवाल पूछे गए हैं और जैसी टिप्पणियां की गई हैं, वह शुभ संकेत नहीं है।
समस्या यह भी है कि नैनीताल हाईकोर्ट ने कांग्रेस के 9 बागी सदस्यों की सदस्यता पर फैसला 9 मई तक टाल दिया है। जबकि सुप्रीम कोर्ट राष्ट्रपति शासन पर तीन से पांच मई तक सुनवाई करेगी।
सुनवाई पूरी करने के दौरान अगर सुप्रीम कोर्ट ने सदन में शक्ति परीक्षण का आदेश दिया तो बागी विधायकों का मामला अप्रसांगिक हो जाएगा। ऐसे में सारी शक्तियां स्पीकर के पास होंगी और स्पीकर ने पहले ही इन सदस्यों की सदस्यता खत्म कर दी है।