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Uttarakhand Election 2022: कांग्रेस हाई कमान के वीटो के बाद ही हुई पार्टी में इंट्री, अब कितना कमाल कर पाते हैं हरक सिंह रावत?

सार

माना जा रहा है कि हरक सिंह रावत ने अपने करीबी और भाजपा के विधायक उमेश काऊ के साथ अगली राजनीतिक पारी का खाका तैयार कर लिया था। कांग्रेस के भी कुछ नेता हरीश रावत पर लगाम कसने के लिए इस रणनीति को आगे बढ़ाने में जुट गए थे। इसकी पृष्ठभूमि यशपाल आर्य के पार्टी में लौटने के बाद ही बन गई थी, लेकिन इस राजनीतिक चाल को हरीश रावत को समझने में जरा भी देर नहीं लगी।
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हरक सिंह रावत - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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उत्तराखंड विधानसभा चुनाव से ऐन पहले हरक सिंह रावत को राजनीति में अपनी इज्जत और वजूद बचाने के लिए खूब पापड़ बेलने पड़े। कांग्रेस के दिग्गज नेता हरीश रावत की राजनीति के आगे वह न केवल पस्त हुए, बल्कि कांग्रेस हाई कमान, राज्य के प्रभारी मोहन प्रकाश के वीटो के बाद ही उनकी और उनकी बहू अनुकृति की पार्टी में इंट्री हो पाई।

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विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष प्रीतम सिंह ने हरक सिंह रावत को पार्टी में लेने के लिए अपने सारे घोड़े खोल दिए। देवेंद्र यादव ने भी पूरी कोशिश की कि दिग्गज नेता कांग्रेस पार्टी में शामिल हो जाएं। उन्हें उनके कद को देखते हुए सम्मान दे दिया जाए। सूत्र बताते हैं कि हरीश रावत ने पिछले दो महीनों में प्रीतम सिंह, देवेंद्र यादव की महत्वकांक्षा को भांपकर उन्हें घेर लिया था। 

इसमें पूर्व मुख्यमंत्री काफी हदतक सफल हो चुके थे, लेकिन इसी बीच में हरक सिंह रावत का प्रकरण आ गया। माना जा रहा है कि हरक सिंह रावत ने अपने करीबी और भाजपा के विधायक उमेश काऊ के साथ अगली राजनीतिक पारी का खाका तैयार कर लिया था। कांग्रेस के भी कुछ नेता हरीश रावत पर लगाम कसने के लिए इस रणनीति को आगे बढ़ाने में जुट गए थे। इसकी पृष्ठभूमि यशपाल आर्य के पार्टी में लौटने के बाद ही बन गई थी, लेकिन इस राजनीतिक चाल को हरीश रावत को समझने में जरा भी देर नहीं लगी।
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हरक सिंह के लिए अग्निपरीक्षा है उत्तराखंड 2022
हरक और हरीश एक पार्टी में भले हैं, लेकिन कभी एक दूसरे के काफी करीब रहने वाले दोनों नेताओं के बीच अब एक बहुत बारीक लेकिन मजबूत दीवार खड़ी हो गई है। कभी दिल्ली के केंद्रीय मंत्रिमंडल का हिस्सा रहने के दौरान हरीश रावत अपने करीबी हरक सिंह रावत के ही जरिए उत्तराखंड की राजनीति और मुख्यमंत्री बनने की महत्वाकांक्षा को जीवंत बनाए रखते थे। ऐसे में हरक सिंह रावत के लिए यह समय कांग्रेस में अग्निपरीक्षा देने का है। 

हरक सिंह रावत के प्रभाव वाले तमाम विधानसभा क्षेत्रों में हरीश रावत के साथ खड़े होने वाले कांग्रेस के युवा नेता प्रत्याशी के रूप में चुनाव मैदान में हैं। लैंसडौन, डोईवाला, केदारनाथ, चौबट्टाखाल और श्रीनगर जैसे तमाम विधानसभा क्षेत्रों में हरक सिंह रावत बड़े नेता का दबदबा रखते हैं। इनके लिए प्रचार करना और इन्हें पार्टी का जिताने की अब बड़ी जिम्मेदारी हरक सिंह रावत के कंधे पर है। 

उत्तराखंड की राजनीति में 25-27 सीटों पर रावत बिरादरी का प्रभाव रहता है। रावतों की राजनीति में हरीश और हरक दिग्गज नेता माने जाते हैं। अपनी खींचतान में भाजपा के नेता त्रिवेंद्र और तीरथ अभी खुलकर मैदान में नहीं उतर रहे हैं। भाजपा ने भी रावतों के महत्व के समझते हुए दिवंगत सीडीएस जनरल विपित रावत के भाई को राजनीति में शामिल किया है। इसी महत्व को समझकर और भीतरघात रोकने के लिए कांग्रेस ने भी हरक को बिल्कुल आखिरी समय में पार्टी में आने का रास्ता दिया है। ऐसे में देखना है कि हरक सिंह रावत परीक्षा में कितना बड़ा स्कोर कर पाते हैं।  

बिना धार वाली राजनीति की तलवार रखते हैं हरीश रावत
हरीश रावत राजनीति के बारीक खिलाड़ी हैं। हरक सिंह रावत से उम्र में 12 साल बड़े हैं। उन्होंने 1980 में अल्मोड़ा की सीट से डॉ. मुरली मनोहर जोशी को हराकर राजनीति में अपनी छाप छोड़ी। यह अभी तक कायम है। उनके बारे में आम है कि उनके तलवार में धार नहीं होती। हरीश रावत को अपनी पार्टी के राजनीतिक विरोधियों की चाल को भांपने में देर नहीं लगी। उन्होंने इसका जवाब अपनी शैली में ही देना शुरू कर दिया है। 

कांग्रेस के लिए 2016 में उत्तराखंड की चुनी सरकार गिराने का षडयंत्र एक शूल की तरह था। तब हरीश रावत मुख्यमंत्री थे। षडयंत्र में मुख्य किरदार हरक सिंह रावत ने निभाया था। तब हरीश रावत के समर्थकों ने इस दर्द को भूलने के लिए इसे कांग्रेस का कचरा साफ होना बताया था। उमेश काऊ जैसे नेताओं ने हरक के इशारे पर बड़ी भूमिका निभाई थी। 

उत्तराखंड के राजनीतिक पंडित बताते हैं कि इसे भूल पाना भी हरीश रावत के लिए आसान नहीं था। लिहाजा उन्होंने कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी से इस प्रकरण को लेकर अपने दिल की बात कह दी। यही उन्होंने कांग्रेस पार्टी के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी के साथ भी साझा किया। उत्तराखंड के एक पूर्व मंत्री का कहना है कि हरीश रावत कहीं न कहीं हरक सिंह रावत को कांग्रेस में लेने के पक्ष में थे, लेकिन वह उन्हें लेने से पहले कुछ स्पष्टता चाहते थे। वह बताते हैं कि हरक सिंह रावत भले कहें कि वह बिना किसी शर्त के कांग्रेस में आए हैं, लेकिन उन्हें अपनी तरफ से कई शर्तों पर रजामंदी देनी पड़ी है।

32 साल का शानदार रहा राजनीतिक करियर और पड़ गए थे इज्जत के लाले
हरक सिंह रावत उत्तराखंड के उन नेताओं में हैं, जिनकी इज्जत भाजपा और कांग्रेस के अच्छे अच्छे युवा नेता करते हैं। भाजपा के ही उत्तराखंड के शिक्षा मंत्री धन सिंह रावत भी हरक सिंह रावत की राजनीतिक प्रतिभा के कायल हैं। कांग्रेस के अविनाश पांडे समेत तमाम नेता पिछले पांच दिनों के घटनाक्रम में जिस तरह से हरक सिंह की पैरवी कर रहे थे, वह देखने और समझने लायक था। कभी हरीश रावत का भी उनपर पूरा भरोसा रहता था। 

हरक सिंह उत्तराखंड के उन लोगों में हैं जिन्हें 31 साल पहले (1991) यूपी सरकार के मंत्रिमंडल में पर्यटन मंत्री के तौर पर शामिल होने का अवसर मिला था। तब वह मंत्रिमंडल के सबसे कम आयु के मंत्री थे। तब वह पौड़ी विधानसभा सीट से चुने गए थे। तब से हरक ने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। उत्तराखंड बनने के बाद हरक सिंह के इर्द गिर्द राज्य की राजनीति घूमती रही। 2002 में राज्य सरकार के चार महत्वपूर्ण विभागों के मंत्री थे। 2007 में वह नेता प्रतिपक्ष थे और उत्तराखंड में हरीश रावत का दाहिना हाथ माने जाते थे। लेकिन महत्वाकांक्षा के फेर में उन्होंने 2016 में मुख्यमंत्री हरीश रावत को धोखा दे दिया। भाजपा में चले गए।  

अब मोहन प्रकाश के कंधे पर बढ़ गया भार
समाजवादी सोच के और सबको साथ लेकर चलने वाले उत्तराखंड कांग्रेस वरिष्ठ पर्यवेक्षक मोहन प्रकाश के कंधे पर बड़ा बोझ आ गया है। अविनाश पांडे समेत कई कांग्रेसी नेता उत्तराखंड की राजननीति में संतुलन बनाने का प्रयास कर रहे हैं। कांग्रेस विधायक दल के नेता प्रीतम सिंह, प्रदेश प्रभारी देवेंद्र यादव की कोशिश हरक सिंह रावत को कांग्रेस ज्वाइन कराने की थी। 

अविनाश पांडे ने भी इसका समर्थन किया था। जबकि हरीश रावत इस स्थिति के लिए बहुत तैयार नहीं थे। कांग्रेस पार्टी के नेताओं को उत्तराखंड में अपनी सरकार बनती दिखाई दे रही है। मुख्यमंत्री बनने की तमन्ना कई नेताओं में है। हरीश रावत 73 साल की उम्र में भी ऊर्जावान हैं। ऐसे में मोहन प्रकाश की जिम्मेदारी सभी में तालमेल बनाने की है। यह बहुत आसान नहीं है। हालांकि मोहन प्रकाश के पास गुजरात, महाराष्ट्र, म.प्र. जैसे तमाम राज्यों में बहुत विषय परिस्थिति में काम करने का अनुभव है।

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