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Dalai Lama: पेलोसी का भारत की धरती से जिनपिंग पर तंज कसना क्या देगा नए बवाल को न्योता? या घुटनों पर आएगा चीन

हरेंद्र चौधरी
Updated Thu, 20 Jun 2024 06:17 PM IST

सार

अमेरिका के हाउस ऑफ रिप्रजेंटेटिव का एक द्विदलीय प्रतिनिधिमंडल, जिसमें पूर्व स्पीकर नैंसी पेलोसी समेत विदेशी मामलों के अध्यक्ष माइकल मैकोल समेत सात सांसदों ने तिब्बत के निर्वासित धार्मिक गुरु दलाई लामा से धर्मशाला में मुलाकात की। इस बातचीत के दौरान इस प्रतिनिधिमंडल ने तिब्बत की आजादी के पक्ष में भी आवाज बुलंद की।
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दलाई लामा से मिला अमेरिकी प्रतिनिधिमंडल। - फोटो : अमर उजाला


'रिजॉल्व तिब्बत एक्ट’ पर बातचीत

अमेरिका के हाउस ऑफ रिप्रजेंटेटिव का एक द्विदलीय प्रतिनिधिमंडल, जिसमें पूर्व स्पीकर नैंसी पेलोसी समेत विदेशी मामलों के अध्यक्ष माइकल मैकोल समेत सात सांसदों ने तिब्बत के निर्वासित धार्मिक गुरु दलाई लामा से धर्मशाला में मुलाकात की। इस बातचीत के दौरान इस प्रतिनिधिमंडल ने तिब्बत की आजादी के पक्ष में भी आवाज बुलंद की। वहीं, यह मुलाकात ऐसे समय हो रही है, जब दलाई लामा अपने घुटनों का इलाज कराने के लिए अमेरिका जाने की योजना बना रहे थे। इस चर्चा में 'रिजॉल्व तिब्बत एक्ट 2024' बिल पर चर्चा हुई, जिसे अमेरिका राष्ट्रपति जो बाइडन जल्द साइन करने वाले हैं। इस बिल का उद्देश्य दलाई लामा के साथ बातचीत फिर से शुरू करने के लिए बीजिंग पर दबाव बनाना है, ताकि वह तिब्बत के साथ चल रहे विवाद को निपटाए। दोनों पक्षों ने 2010 से औपचारिक बातचीत नहीं की है। अमेरिका के दोनों सदनों हाउस ऑफ रिप्रजेंटेटिव और सीनेट ने 12 जून को ही 'रिजॉल्व तिब्बत एक्ट’ 391-26 वोटों से पारित किया था। इस बिल में चीन के उस नैरेटिव को काउंटर किया जाएगा, जिसमें वह तिब्बत पर अपना दावा करता है। 


पेलोसी ने धर्मशाला में चीनी राष्ट्रपति पर बोला हमला

वहीं दलाई लामा के साथ मुलाकात के बाद अमेरिकी कांग्रेस की पूर्व स्पीकर नैंसी पेलोसी ने चीन और चीनी राष्ट्रपति शी जिंगपिंग पर जमकर हमला बोला। धर्मशाला में बोलेते हुए नैंसी पेलोसी ने कहा, "...परम पावन दलाई लामा अपने ज्ञान, परंपरा, करुणा, आत्मा की पवित्रता और प्रेम के संदेश के साथ लंबे समय तक जीवित रहेंगे और उनकी विरासत हमेशा जीवित रहेगी। लेकिन आप, चीन के राष्ट्रपति, आप चले जाएंगे और कोई भी आपको किसी भी चीज का श्रेय नहीं देगा। दलाई लामा को मेरा यह कहना पसंद नहीं आएगा कि जब मैं चीनी सरकार की आलोचना करती हूं। दलाई लामा कहते हैं, चलो नैंसी के लिए प्रार्थना करें कि वह अपने नकारात्मक दृष्टिकोण से छुटकारा पाएं। मुझे उम्मीद है कि वे आज मुझे यह कहने की अनुमति देंगे कि बदलाव आने वाला है। जैसा कि हमारे सहयोगियों ने कहा है कि उम्मीद कुछ विश्वास लाती है और दूसरों की भलाई में तिब्बती लोगों का विश्वास ही सब कुछ बदल देगा...।" गौरतलब है कि नैंसी पेलोसी वही अमेरिकी नेता हैं, जिनके ताइवान जाने का विरोध करते हुए चीन ने लड़ाई की चेतावनी दी थी। इससे पहले 2008 में पेलोसी ने धर्मशाला में दलाई लामा से मुलाकात की थी और तिब्बत पर चीन के कब्जे की निंदा की थी।


बाइडन पर तिब्बत मुद्दे पर बोलने का दबाव

भारत में विदेशी मामलों के जानकार और राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद के पूर्व सलाहकार प्रोफेसर ब्रह्मा चेलानी कहते हैं कि धर्मशाला में दलाई लामा के साथ द्विदलीय अमेरिकी कांग्रेस टीम की बैठक ऐसे समय में हो रही है, जब बाइडन पर तिब्बत पर बोलने के लिए घरेलू दबाव है। वह कहते हैं कि नैंसी पेलोसी तो लंबे समय से तिब्बत की आवाज उठाती रही हैं। 2008 में पेलोसी ने धर्मशाला में दलाई लामा से मुलाकात की थी और तिब्बत पर चीन के कब्जे की निंदा की थी। चेलानी के मुताबिक पूरी दुनिया जहां दलाई लामा की लंबी उम्र की दुआ मांग रही है, तो वहीं चीन उनके मरने का इंतजार कर रहा है। वह उनकी जगह पर अपना कठपुतली उत्तराधिकारी बैठाना चाहता है, ताकि तिब्बतियों को अपनी उंगली पर नचा सके। वह आगे कहते हैं कि बाइडन एडमिनिस्ट्रेशन तिब्बत मुद्दे पर बोलने से बचता था। तिब्बत में अब जो अमेरिकी सांसदों की यात्रा हुई है, वह उसी की क्षतिपूर्ति है। बाइडन के सामने आज दो टेस्ट हैं, पहला, तिब्बत पर चीन की गलत सूचनाओं का मुकाबला करने में मदद के लिए बाइडन को नए 'रिजॉल्व तिब्बत एक्ट’ पर हस्ताक्षर कर उसे कानून बनाना होगा। दूसरा, बाइडन को खुल कर तिब्बत पर बोलने की जरूरत है। वह कहते हैं कि 2020 में अमेरिकी चुनावों क दौरान तत्कालीन राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप दलाई लामा से मिले थे। वहीं अब जब दलाई लामा अपने घुटनों का इलाज कराने के लिए अमेरिका जाने की योजना बना रहे हैं, तो बाइडन को भी मुलाकात कर देश की जनता को दिखाने का सही मौका है। 


चीन की ताइवान पर से ध्यान हटाने की कोशिश

अंतराष्ट्रीय मामलों के जानकार और इंस्टीट्यूट ऑफ चाइना स्टडीज के फैलो जोरावर दौलत सिंह भी नैंसी पेलोसी के इस दौरे पर कहते हैं कि भू-राजनीतिक नजरिए से अमेरिका और चीन के बीच हजारों मील दूर ताइवान स्ट्रेट में अनिश्चितता बनी हुई है दोनों के बीच वहां प्रतिस्पर्धा काफी जोरों पर है, लेकिन अब चीन का ध्यान वहां से हटा कर उसके अपने द्वीप के दक्षिण-पश्चिम में लाने से क्या फायदा होगा? वह भी ऐसे समय जब जम्मू-कश्मीर में पाकिस्तान की खूनी प्रॉक्सी वॉर फल-फूल रही है और पश्चिमी देश जो भारत के करीबी रणनीतिक साझेदार हैं, वे भारतीय आतंकवादियों और अलगाववादियों के लिए सुरक्षित ठिकाने बने हुए हैं और उन्हें वैध बनाने के लिए हर संभव प्रयास कर रहे हैं।


पाकिस्तान ने भी चीन की धरती से किया कश्मीर का जिक्र

पेलोसी के धर्मशाला में चीन के खिलाफ दिए भाषण पर भारत के विदेश सचिव रहे कंवल सिब्बल कहते हैं कि मान लीजिए अगर हमने उन्हें और द्विदलीय कांग्रेस प्रतिनिधिमंडल को वीजा देने से इनकार कर दिया होता या उन्हें बताया होता कि वे कोई सार्वजनिक बयान नहीं दे सकते हैं, और यह बयान सार्वजनिक हो गया होता। तो भारत में विपक्ष और मीडिया में हंगामा करता कि हम चीन के सामने झुक गए, चीनी प्रतिक्रिया से चिंतित हैं। 

 

चीन ने भारत की किसी संवेदना का ख्याल नहीं रखा

वह आगे कहते हैं कि चीन हमेशा से सभी सीमा समझौतों का उल्लंघन करता रहा है। गलवान में वह हमारे सैनिकों के साथ हिंसा करता है। अपनी सेना को पीछे हटाने से इनकार कर देता है। सिक्किम में यांग्त्से इलाके को हड़पने की कोशिश करता है। अरुणाचल में स्थानों को चीनी नाम देता है और सीमावर्ती गांवों का निर्माण करता है। वह कहते हैं, ऐसे में हमें चीन पर दबाव क्यों कम करना चाहिए। चीन ने हमें किस मोर्चे पर रियायत दी है। चीन ने हमारी किसी संवेदना का ख्याल नहीं रखा है। 
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भारत के लिए सकारात्मक कदम

वहीं, भारत ने अमेरिकी सांसदों की दलाई लामा से मुलाकात पर कोई आधिकारिक टिप्पणी नहीं की है। हालांकि अमेरिकी सांसदों के इस दल को धर्मशाला आने की औपचारिक तौर पर मंजूरी भारतीय विदेश मंत्रालय ने ही दी है। विदेश मंत्रालय के सूत्रों का कहना है कि नैंसी पेलोसी की दलाई लामा से मुलाकात से भारत की तिब्बत की नीति में कोई बदलाव आएगा, इस पर अभी ये कहना जल्दबादी होगा। पिछले कुछ सालों में सरकार ने कुछ ऐसे कदम जरूर उठाए हैं, जिससे चीन को ये संदेश गया है कि अगर वो संवेदनशील विषयों पर भारत को ठेस पहुंचा सकता है, तो भारत भी ठीक वैसा ही कर सकता है। 


सूत्र कहते हैं कि भारत-चीन विवाद में तिब्बत के संदर्भ को अगर देखा जाए तो दलाई लामा और नैंसी पेलोसी की मुलाकात भारत के लिए सकारात्मक कदम है। क्योंकि इससे क्षेत्रीय भूराजनीति संतुलन बढ़ेगा। यह भारत और अमेरिका के बीच रणनीतिक साझेदारी की मजबूती दिखाता है। वहीं, तिब्बत पर अमेरिका के इस रुख का चीन को कड़ा संदेश जाता है कि उसकी विस्तारवादी नीति का कड़ा मिलेगा, वहीं अमेरिका के इस कदम से चीन पर दबाव भी बढ़ेगा।
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