असदुद्दीन ओवैसी के साथ पल्लवी पटेल (बाएं), अखिलेश यादव।
- फोटो : Twitter
यूपी की सियासत में लड़ाई अब 'ए' और 'एम' पर आकर अटक गई है। अखिलेश यादव की समाजवादी पार्टी जहां पीडीए में 'ए' को अल्पसंख्यक बताकर इससे ताल्लुक रखने वालों को अपने साथ जोड़ रही है। वहीं ओवैसी ने अपना दल (कमेरावादी) से गठबंधन करके पीडीएम को आगे बढ़ाने की बात कही है। ओवैसी और पल्लवी पटेल के 'एम' को अखिलेश के 'ए' का रिप्लेसमेंट माना जा रहा है। दरअसल, पल्लवी और ओवैसी ने 'एम' से मुस्लिम का जिक्र कर एक बड़ी आबादी को निशाना बनाया है। सियासी गलियारों में अब चर्चा इस बात की हो रही है कि यूपी में अब 'ए' और 'एम' की लड़ाई में सियासी दांव पेंच चले जाएंगे।
दरअसल असदुद्दीन ओवैसी और पल्लवी पटेल के बीच हुए सियासी करार में मुस्लिमों के वोट को लेकर स्पष्ट संदेश दिया गया है। अपना दल कमेरावादी के नेता जेपी पटेल कहते हैं कि उनकी नेता पल्लवी पटेल ने पीडीए में पिछड़ा और दलित के साथ "अल्पसंख्यको" का नाम देकर बहुत कुछ घालमेल कर दिया था। जेपी कहते हैं कि असल में पीडीए की जगह पर इसका असली नाम उनके नेता पल्लवी पटेल और असदुद्दीन ओवैसी ने पीडीएम रख कर दुरुस्त किया है। उनका दावा है कि एम के साथ खुले तौर पर स्पष्ट रूप से मुस्लिम उनके उस एजेंडे में शामिल है, जहां पर उनके विकास की सबसे ज्यादातर दरकार है। वह कहते हैं कि समाजवादी पार्टी ने भी मुसलमान को अल्पसंख्यकों की उसे श्रेणी में रखा जहां पर उनकी हिस्सेदारी में कई बटाईदार शामिल थे। जबकि पीडीएम में पिछड़े दलित और मुस्लिम स्पष्ट रूप से उनके साथ कंधे से कंधा मिलाकर चलेंगे और उनकी पार्टी उनके लिए काम करेगी।
सियासी जानकार कहते हैं कि पल्लवी पटेल और ओवैसी का सियासी गठजोड़ क्या गुल खिलाएगा यह तो चुनाव परिणाम तय करेंगे। लेकिन इस गठबंधन के साथ उत्तर प्रदेश की सियासत में मुसलमान के वोट बैंक को लेकर बड़ी हलचल तो मच ही गई है। वरिष्ठ पत्रकार बृजेश शुक्ला का मानना है कि अखिलेश यादव ने निश्चित तौर पर अपने पीडीए में जहां पिछले दलित और अल्पसंख्यकों का जिक्र किया था। वही एक कदम आगे बढ़कर ओवैसी ने पीडीएम का जिक्र कर सीधे तौर पर मुसलमान को अपने साथ जोड़ने और उनके साथ खुद के जुड़े होने का संदेश दे दिया। वह कहते हैं कि अपना दल कमेरावादी की नेता पल्लवी पटेल ने भी स्पष्ट रूप से इस बात का जिक्र किया कि अखिलेश के पीडीए में "ए" के कई अलग-अलग मायने निकाले जाते थे। लेकिन सीधे तौर पर मुसलमानो के साथ खड़े होने का दावा कोई पार्टी नहीं करती थी। यही वजह है कि अपना दल नहीं ओवैसी के साथ गठबंधन कर 'एम' को स्पष्ट रूप से मुसलमाने के साथ जोड़ा है।
वही जिस आक्रामकता के साथ असदुद्दीन ओवैसी ने उत्तर प्रदेश के मुसलमानो की राजनीति के लिए अपने कदम आगे बढ़ाए हैं। उसको लेकर कई तरह की चर्चाएं भी राजनीति में हो रही हैं। समाजवादी पार्टी के नेता और पूर्व विधायक रहे डीपी सिंह कहते हैं पहले तो ओवैसी ही भाजपा की बी पार्टी हुआ करती थी। अब उन्होंने उत्तर प्रदेश के एक और राजनीतिक दल को अपने साथ जोड़ कर अपने पुराने एजेंडे को आगे बढ़ाया है। उनका कहना है कि ओवैसी भारतीय जनता पार्टी के कहने पर उत्तर प्रदेश में मुसलमानों पर के वोट बैंक में सेंधमारी करने के लिए उतरते हैं। हालांकि यह बात अलग है कि वह अपने एजेंडे में यहां कभी सफल नहीं हुए। इस बार भी वह अपनी उसी नियत के साथ उत्तर प्रदेश में चुनाव लड़ने उतरे हैं।
सियासी जानकार प्रद्युम्न प्रकाश कहते हैं कि अब सियासी गणित को माने तो यह लगता है कि ओवैसी मुसलमानो के वोट बैंक में सेंधमारी करेंगे। लेकिन जिस तरह समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी उत्तर प्रदेश में मुसलमानो के हितैषी होने का दावा करती है उससे एक लड़ाई कठिन हो जाती है। हालांकि प्रकाश का मानना है इस कठिन लड़ाई में ही सियासी तौर पर भारतीय जनता पार्टी को माइलेज मिल सकता है। लेकिन यह कहना कि इस बार मुसलमानो के वोट बैंक पर सबसे ज्यादा कौन हिस्सा लेगा यह तो चुनावी परिणाम बताएंगे। फिलहाल यूपी की सियासत में नया दांव है "ए" बनाम 'एम' का तो शुरू हो गया है।