आगामी विधानसभा के चुनावों के चलते उत्तर प्रदेश की राजनीति में सबसे ज्यादा हो हल्ला ब्राह्मणों को लेकर ही मचाया जा रहा है। सभी राजनीतिक दल इसी बात को लेकर अपना एजेंडा सेट कर रहे हैं कि प्रदेश का बड़ा ब्राह्मण तबका उनके साथ जुड़ रहा है और सत्ता की चाबी उसी ब्राह्मण के हाथ में है। इसके लिए ब्राह्मण कमेटियों से लेकर ब्राह्मण सम्मेलन तक हो रहे हैं। लेकिन हकीकत इससे अलग है। राजनीतिक विश्लेषकों के मुताबिक दरअसल उत्तर प्रदेश में दांव तो ब्राह्मणों पर लगाया जा रहा है लेकिन असली निशाने पर पिछड़े और अति पिछड़े ही हैं। बीते कुछ समय में उत्तर प्रदेश की राजनैतिक उठा पटक में समाजवादी पार्टी ने पिछड़ों और अति पिछड़ों समेत बड़े जातीय संगठनों पर दांव लगाया है।
बीते कुछ समय से समाजवादी पार्टी में नेताओं के शामिल होने के सिलसिले और राजनीतिक उठापटक को अगर बहुत बारीकी से समझा जाए तो यह बिल्कुल 2017 में बिछाई गई भाजपा की राजनीतिक चौसर जैसी ही दिख रही है। अखिलेश यादव ने इस बार अपने कोर वोट बैंक मुस्लिम और यादवों के अलावा सबसे ज्यादा जिस पर दांव लगाया उसे पिछड़े और अति पिछड़े समेत ब्राह्मण भी शामिल हैं। अखिलेश यादव ने जहां जनवादी पार्टी से समझौता कर संजय चौहान और उनके प्रभाव के इलाकों को साधने की कोशिश की, वहीं पश्चिम यूपी में राष्ट्रीय लोकदल के जरिए एक बड़ा जाट वोट बैंक भी साधा है। सुभासपा के ओमप्रकाश राजभर को साथ में लेकर अखिलेश यादव ने अति पिछड़ा वर्ग को जोड़ने की कोशिश की तो कृष्णा पटेल के माध्यम से कुर्मियों के एक बड़े तबके पर भी राजनैतिक वोट बैंक के लिहाज से निशाना साधा।
सरोजानंद सिंह कहते हैं कि अगर समाजवादी पार्टी की प्रदेश टीम को आप ढंग से देखें तो पाएंगे कि 47 फ़ीसदी से ज़्यादा जगह गैर यादव, पिछड़ा और अति पिछड़ा समाज को दी गई है। वह कहते हैं कि ऐसा नहीं है कि भाजपा इस राजनीति गुणा भाग में पीछे है। लेकिन चुनाव के एन वक्त पर जिस तरीके से समाजवादी पार्टी न सिर्फ छोटे संगठनों बल्कि जातीय समीकरणों को साधने वाले संगठनों के बड़े नेताओं को भी तवज्जो देकर चुनावी हवा अपने पक्ष में करने की कोशिश कर रही है। ऐसे में जिस तरीके से पूर्वांचल में प्रभावशाली ब्राह्मण नेता हरिशंकर तिवारी और उनके पूरे परिवार को समाजवादी पार्टी में शामिल कराया गया उसका बड़ा असर दिखेगा।
इसी तरीके से यूपी की राजनीति में कायस्थों की एक बड़ी भूमिका रहती है। इसके लिए समाजवादी पार्टी के मुखिया अखिलेश यादव ने कायस्थों के बड़े नेता सुरेंद्र श्रीवास्तव को न सिर्फ पार्टी में शामिल कराया बल्कि उन्हें प्रदेश उपाध्यक्ष जैसा अहम पद भी दिया। समाजवादी पार्टी के प्रदेश उपाध्यक्ष सुरेंद्र श्रीवास्तव कहते हैं कि वे उत्तर प्रदेश के सबसे बड़े तकरीबन सत्तर लाख कर्मचारियों के कर्मचारी महासंघ के प्रदेश अध्यक्ष रहे हैं। अपने कर्मचारियों के माध्यम के साथ-साथ छिटके हुए कायस्थ समाज को जोड़ने के लिए नोएडा से लेकर झांसी और बलिया से लेकर आगरा तक बड़े कार्यक्रम और सम्मेलन कर चुके हैं। समाजवादी पार्टी के प्रदेश उपाध्यक्ष सुरेंद्र श्रीवास्तव का कहना है कि समाजवादी पार्टी की यही रणनीति जो छोटे-छोटे संगठनों और सभी जाति समुदाय के लोगों को जोड़कर आगे बढ़ रही है वही उनको 2022 में सत्ता में वापस लेकर आएगी।
समाजवादी पार्टी के एक वरिष्ठ नेता के मुताबिक उत्तर प्रदेश में सैनी, शाक्य और मौर्य बिरादरी के तकरीबन आठ से नौ फीसदी वोट माने जाते हैं। इनका प्रभुत्व पश्चिम से लेकर तराई अवध और पूर्वांचल तक है। क्योंकि स्वामी प्रसाद मौर्य का जनता दल से लेकर बहुजन समाज पार्टी के शासनकाल तक में बड़ा प्रभाव रहा है। यही वजह है कि जब वह भाजपा में शामिल हुए तो पार्टी को स्वामी प्रसाद मौर्य के आने से इस समुदाय का वोट बैंक हासिल होने की उम्मीद जुड़ी थी। अब यही जातीय गणित समाजवादी पार्टी के साथ है। समाजवादी पार्टी के उक्त नेता का कहना है कि उनके साथ पहले से महान दल के अति पिछड़े समुदाय के नेता केशव देव मौर्य भी हैं। समाजवादी पार्टी के मुखिया अखिलेश यादव हाल के दिनों में अपने राजनीतिक मंचों से इस बात की घोषणा भी कर चुके हैं कि उनकी सरकार उस हर समुदाय को लेकर आगे बढ़ रही है जो भाजपा सरकार में शोषित थे और उपेक्षित थे।