प्रयागराज में कृषि के बढ़ते घाटे को लेकर किया गया प्रदर्शन
- फोटो : Amar Ujala
अब भी लगातार घाटा
वर्तमान समय में भी आलू-गेहूं उत्पादक किसानों की समस्या खत्म नहीं हुई हैं। आलू की पैदावार लागत छह-सात रुपये के करीब आ रही है, जबकि खुले बाजार में आलू 10-12 रुपये के करीब बिक रहा है। आढ़तिया किसानों को उत्पादन मूल्य भी देने को तैयार नहीं हैं क्योंकि उनका आलू खरीद के बाद बाजारों में पहुंचाने और उसे बिक्री करने पर अतिरिक्त लागत आ रही है, जिसके बाद उन्हें बचत कम हो रही है। इससे एक बार फिर आलू उत्पादक किसानों की नाराजगी बढ़ रही है।
कोल्ड स्टोरेज में रखकर आलू को बाद में बेचकर लाभ कमाया जा सकता है। लेकिन बढ़ते बिजली मूल्य के कारण कोल्ड स्टोरेज में रखना भी अब सामान्य किसानों की जेब से बाहर होता जा रहा है। कोल्ड स्टोरेज में आलू रखने की कीमत दो रुपये से तीन रुपये किलो तक पहुंच गई है। इसे लाने-ले जाने और बाद में बेचने का खर्च इतना बढ़ जाता है कि वह सामान्य किसानों के बस की बात नहीं रह जाती। जिन किसानों को जल्द पैसा पाकर साहूकारों को चुकाना होता है, उनके लिए एक बार फिर मजबूरी में आढ़तियों का द्वार खटखटाना पड़ता है।
पिछले वर्ष खाद सब्सिडी के रूप में 2.55 लाख करोड़ रुपये का फंड निर्धारित किया गया था, लेकिन सरकार ने इस वर्ष इसमें 50 हजार करोड़ रुपयों की कटौती कर दी है। दाम बढ़ने से रोकने के लिए दूसरा रास्ता तैयार कर लिया गया है। यूरिया की बोरी 50 किलो की होती थी, जिसे अब 45 किलो का कर दिया गया है। डीएपी खादों का मूल्य अब भी बढ़ रहा है। जिससे किसान अब इसे खरीद भी नहीं पा रहे हैं।
सरकार ऑर्गेनिक खेती को बढ़ावा देने के नाम पर खाद सब्सिडी कम करने को सही ठहरा रही है, गंगा नदी के किनारे इसके बढ़ावा देने की योजना भी बना दी गई है, लेकिन जिन आलू उत्पादक किसानों की खेती पूरी तरह यूरिया खाद पर निर्भर होती है, जिससे उनका घाटा बढ़ता जा रहा है। गेहूं-धान की फसल में डीएपी खादों की बहुत आवश्यकता होती है जो लगातार महंगा होता जा रहा है।
कैसे हो समस्या का निदान
अखिल भारतीय किसान मजदूर सभा के राष्ट्रीय महासचिव डॉ. आशीष मित्तल ने अमर उजाला को बताया कि आलू का पॉउडर और पापड़ उद्योग बनाकर आलू उत्पादक किसानों की समस्या समाप्त करने का दावा किया गया था, लेकिन इस पूरी बेल्ट में अभी तक इस तरह का एक भी उद्योग स्थापित नहीं हुआ है। इससे किसानो की समस्या बढ़ती जा रही है।
इस नाराजगी का परिणाम हुआ है कि अब जगह-जगह सरकार विरोधी रैलियां निकलने लगी हैं और लोग खुलकर सरकार के विरोध में नारेबाजी कर रहे हैं। इन चुनावों में सरकार को इसका नुकसान उठाना पड़ सकता है।