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उत्तर प्रदेश चुनाव: ये दो मुद्दे तो बहुत बड़े रहे, लेकिन क्यों हो गए फुस्स! लोगों पर कितना डालेंगे असर?

सार

राजनीतिक विश्लेषक जीडी शुक्ला कहते हैं जिस तरह उन्नाव रेप कांड के बाद राजनीति शुरू हुई उससे यह अंदाजा लगाया जा रहा था कि आने वाले विधानसभा के चुनावों में यह मुद्दा राजनैतिक रूप से बहुत मजबूत होगा। लेकिन उन्नाव रेप कांड का उतना व्यापक असर इस विधानसभा के चुनावों में बहुत बड़े मुद्दे के तौर पर बिल्कुल नहीं हो रहा है...
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उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव - फोटो : अमर उजाला (फाइल फोटो)
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विस्तार
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उत्तर प्रदेश विधानसभा के चुनावों में चौथे चरण का मतदान बुधवार को होगा। बुधवार को होने वाले मतदान में दो जिले ऐसे भी हैं जो बीते कुछ समय में सबसे ज्यादा चर्चा में रहे। इसमें एक जिला लखीमपुर है तो दूसरा उन्नाव। दोनों जिलों की सभी सीटों पर भाजपा के विधायक हैं। लखीमपुर में किसानों पर गाड़ी चढ़ाने का मामला हो या उन्नाव का बहुचर्चित रेप कांड- इस बार इनकी वजह से भाजपा के लिए अपनी सभी सीटों पर बादशाहत कायम रखने की बड़ी चुनौती है। वहीं कुछ राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि दोनों जिलों में हुए बड़े-बड़े कांडों का असर चुनाव में उस स्तर पर नहीं दिख रहा है जिसका अनुमान लगाया जा रहा था।

उन्नाव में रेपकांड के अलावा कई और चुनावी मुद्दे भी

उन्नाव में हुए रेप कांड के दोषी और भाजपा विधायक कुलदीप सेंगर को आजीवन कारावास की सजा के बाद विधानसभा की सदस्यता से हाथ धोना पड़ा था। उन्नाव रेप कांड के बाद तमाम राजनीतिक दलों ने जमकर न सिर्फ इस मामले को राजनीतिक तौर पर अपने पाले में करने के लिए जी तोड़ मेहनत की, बल्कि देश भर में यह मामला छाया रहा। राजनीतिक विश्लेषक जीडी शुक्ला कहते हैं जिस तरह उन्नाव रेप कांड के बाद राजनीति शुरू हुई उससे यह अंदाजा लगाया जा रहा था कि आने वाले विधानसभा के चुनावों में यह मुद्दा राजनैतिक रूप से बहुत मजबूत होगा। इस मुद्दे की बदौलत उत्तर प्रदेश के राजनीतिक परिदृश्य भी बदलेंगे। शुक्ला कहते हैं कि उन्नाव रेप कांड का उतना व्यापक असर इस विधानसभा के चुनावों में बहुत बड़े मुद्दे के तौर पर बिल्कुल नहीं हो रहा है। वह कहते हैं कि पहले, दूसरे और तीसरे चरण के मुद्दों को उठाकर आप देख लें तो उन्नाव रेप कांड जैसे जघन्य अपराध का मुद्दा कहीं भी बहुत प्रभावी तौर पर नहीं उठा। राजनैतिक विश्लेषक कहते हैं कि जिन मुद्दों पर उत्तर प्रदेश में चुनाव लड़े जा रहे हैं उन्हीं मुद्दों पर उन्नाव के भी चुनाव हो रहे हैं।

जितनी उम्मीद थी, उतना असर नहीं डाल रहा लखीमपुर मुद्दा

इसी तरह लखीमपुर में किसानों पर गाड़ी चढ़ा कर मारने के आरोप में केंद्रीय गृह राज्य मंत्री अजय मिश्र टेनी के बेटे आशीष को जेल हुई। लखीमपुर में जब यह घटना हुई तो सभी राजनीतिक दलों ने इस पूरे मुद्दे को बहुत जोर शोर से उठाया। राजनीतिक विशेषज्ञ जटाशंकर सिंह कहते हैं जिस तरह यह मुद्दा उठाया गया खासतौर से कांग्रेस ने जब इस मामले को उठाना शुरू किया तो यह माना जाने लगा कि लखीमपुर में किसानों की हुई मौत का मुद्दा पंजाब और उत्तर प्रदेश समेत अन्य जगहों पर होने वाले चुनावों में जबरदस्त असर डालेगा। सिंह कहते हैं पंजाब में तो चुनाव हो गया। लेकिन लखीमपुर का मुद्दा वहां भी उस तरह नहीं उठाया गया। इसके पीछे शायद यह वजह हो सकती है कि पंजाब में भाजपा की स्थिति उतनी मजबूत नहीं है, जिससे कांग्रेस इस मुद्दे पर भाजपा को वहां घेरती।

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वह कहते हैं उत्तर प्रदेश में जरूर कांग्रेस ने इस मुद्दे को उठाया और प्रदेश सरकार को अभी भी वह इस पर घेर रही है, लेकिन चुनावी मैदान में कांग्रेस की असलियत उसके नेता भी जानते हैं। जटाशंकर सिंह कहते हैं कि लखीमपुर में आठ विधानसभा सीटें हैं और भाजपा के खाते में सभी सीटें आती हैं। ऐसे में निश्चित तौर पर मनोवैज्ञानिक नजरिए से भाजपा पर इस घटनाक्रम का एक दबाव भी बना हुआ है। लेकिन जो मुद्दे उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनावों में हावी हैं उसमें पूरा चुनाव लखीमपुर के मुद्दे पर लड़ा जा रहा हो ऐसा बिल्कुल नहीं है। वह कहते हैं लखीमपुर में कुछ सीटों पर भाजपा और सपा में कड़ा मुकाबला है। लेकिन इस कड़े मुकाबले की कई अन्य राजनीतिक वजहें हैं।

पीलीभीत की सीटों पर हो सकता है लखीमपुर मुद्दे का असर

उत्तर प्रदेश की राजनीति को करीब से समझने वाले राजनैतिक विश्लेषक ओपी मिश्र कहते हैं कि तराई बेल्ट में जहां सिख ज्यादा हैं, वहां जरूर लखीमपुर कांड का असर देखने को मिल सकता है। उसमें लखीमपुर की दो विधानसभा सीटें पलिया और निघासन शामिल है। जबकि पीलीभीत की सीटें भी इसमें शामिल हैं। ओपी मिश्रा कहते हैं कि पीलीभीत में भी चौथे चरण में मतदान होना है और यहां के मुद्दों में लखीमपुर का मुद्दा खासतौर से तराई के सिख बहुल इलाकों में बना हुआ है। इसके साथ ही पीलीभीत से सांसद वरुण गांधी इसे लेकर जिस तरह के बयान देते रहे हैं और सरकार को घेरते रहे हैं उसका असर भी पीलीभीत विधानसभा सीटों पर पड़ सकता है।

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