फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

कम वोटिंग से भाजपाई खेमे में चिंताः क्या महंगाई-बेरोजगारी से शांत पड़ गया पार्टी का वोटर? शक्ति केंद्र प्रमुखों के आइडिया पर उठे सवाल

सार

सामान्य तौर पर तेज मतदान को सरकार के खिलाफ माना जाता है। कहा जाता है कि जब मतदाताओं को किसी सरकार से नाराजगी होती है तो वे उसे बदलने के लिए बढ़चढ़कर वोटिंग करते हैं। 2007 के विधानसभा चुनाव में 45.96 प्रतिशत मतदान हुआ था, लेकिन 2012 के यूपी विधानसभा चुनाव में 59.40 प्रतिशत मतदान हुआ था। 2017 के विधानसभा चुनाव में भी यही ट्रेंड देखा गया था।
विज्ञापन
Cm yogi Priyanka akhilesh - फोटो : अमर उजाला
विज्ञापन

विस्तार
वॉट्सऐप चैनल फॉलो करें

यूपी विधानसभा चुनाव के पहले चरण में केवल 60.17 प्रतिशत मतदान हुआ है। यह 2017 के 63.47 प्रतिशत मतदान की तुलना में बेहद कम है। ग्रामीण इलाकों में बेहतर मतदान हुआ है, तो शहरी इलाकों में अपेक्षाकृत कम मतदान हुआ है। कैराना जैसे बेहद संवेदनशील इलाके में रिकॉर्ड 75 प्रतिशत और मुजफ्फरनगर में 65.34 प्रतिशत मतदान हुआ तो शहरी इलाकों वाले गौतमबुद्ध नगर में केवल 57.07 प्रतिशत और गाजियाबाद में 58.31 प्रतिशत मतदान हुआ। किसान और मुसलमान नेताओं का दावा है कि उनके मतदाता बढ़-चढकर वोटिंग कर रहे हैं और यह मतदान सरकार के खिलाफ जा रहा है, जबकि कम मतदान पर भाजपा नेता पूरी तरह चुप हैं।

विज्ञापन


सामान्य तौर पर तेज मतदान को सरकार के खिलाफ माना जाता है। कहा जाता है कि जब मतदाताओं को किसी सरकार से नाराजगी होती है तो वे उसे बदलने के लिए बढ़चढ़कर वोटिंग करते हैं। 2007 के विधानसभा चुनाव में 45.96 प्रतिशत मतदान हुआ था, लेकिन 2012 के यूपी विधानसभा चुनाव में 59.40 प्रतिशत मतदान हुआ था। माना गया था कि यह बसपा सरकार को बदलने के लिए लोगों का गुस्सा था।

2017 के विधानसभा चुनाव में भी यही ट्रेंड देखा गया था। 2012 के 59.40% की तुलना में 2017 में भी तेज मतदान हुआ और 61.24% लोगों ने अपने मताधिकार का प्रयोग किया। इसे अखिलेश सरकार को बदलने का गुस्सा और नरेंद्र मोदी-भाजपा की लहर का असर माना गया था।
विज्ञापन


भाजपा ने पलटा ट्रेंड
हालांकि, भाजपा के सत्ता में आने के बाद यह समीकरण कुछ पलटता हुआ भी दिखाई पड़ा, जब भाजपा ने पूर्व के वोट शेयर से ज्यादा मत प्राप्त कर इस थ्योरी को गलत साबित कर दिया। 2004 के लोकसभा चुनाव में 58.07% वोट पड़ा, 2009 के चुनाव में 58.21% मतदान हुआ। जबकि 2014 में लोगों ने यूपीए सरकार को हटाने के लिए बढ़चढ़कर वोट किया। माना जाता है कि नरेंद्र मोदी के प्रभाव के कारण 2014 के चुनाव में 66.44% मतदान हुआ। इस चुनाव में भाजपा को 31% मत मिला।

जबकि इसके बाद 2019 के आम चुनाव में पिछले चुनाव से ज्यादा यानी 67.40% मतदान हुआ। इस चुनाव में भाजपा को मिले मत प्रतिशत में भी बढ़ोतरी हुई और उसने 2014 के 31 प्रतिशत की तुलना में 37.36 प्रतिशत मत प्राप्त किया। सत्ता में होने के बाद भी मतदान प्रतिशत बढ़ने को नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता और भाजपा के बढ़ते प्रभाव के रूप में देखा गया। भाजपा ने इसी तरह का प्रदर्शन कुछ राज्यों में भी दोहराया है। यही कारण है कि उत्तर प्रदेश में कम मतदान देख भाजपा नेता चिंतित दिखाई पड़ रहे हैं।    

क्या भाजपा कार्यकर्ता हुए शांत
भाजपा नेताओं ने अपने मतदाताओं को बूथ तक लाने के लिए विशेष अभियान चलाया था। हर बूथ पर मतदाता रजिस्टर के हर पन्ने का अलग प्रमुख बनाया गया था। पांच बूथों पर एक शक्ति केंद्र प्रमुख बनाकर सबको ऊर्जावान रखने की रणनीति बनाई गई थी। पार्टी नेता अमित शाह और पार्टी अध्यक्ष जेपी नड्डा ने पन्ना प्रमुखों-शक्ति केंद्र प्रमुखों को खूब उत्साहित करने का काम भी किया था। लेकिन पहले चरण में ही हुए कम मतदान ने भाजपा की इस रणनीति पर सवाल उठा दिए हैं। कम मतदान को पार्टी अपने नुकसान के तौर पर देख रही है और पार्टी नेता इस पर चिंतित हैं।  

क्या है संभावना
बीजेपी के एक वरिष्ठ नेता के मुताबिक, मुस्लिम बहुल आबादी में तेज मतदान 2014-2019 के आम चुनाव में हमारे पक्ष में गया था। लेकिन बदली परिस्थिति में यूपी के संदर्भ में यह हमारे खिलाफ जा सकता है। हालांकि, चूंकि कोरोना अभी पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है, इस बात की पूरी संभावना है कि चुनाव आयोग द्वारा पूरे इंतजाम के दावों के बाद भी लोगों ने स्वयं को सुरक्षित रखने के लिए मतदान केंद्रों से दूरी बना ली हो।

हालांकि, संभावना इस बात की भी है कि महंगाई और बेरोजगारी के कारण नाराज लोगों ने चुनाव से दूर रहना ही ठीक समझा हो। लेकिन यहीं यह भी स्पष्ट है कि लोगों ने अखिलेश यादव-जयंत चौधरी के गठबंधन को पसंद नहीं किया है, अन्यथा वे सरकार बदलने के लिए भारी संख्या में मतदान करते। पार्टी नेता आगे के दौर में मतदाताओं, बूथ और शक्ति केंद्र प्रमुखों को उत्साहित करने की रणनीति बना रही है। 

किसानों ने किया तेज मतदान
संयुक्त किसान मोर्चा के नेता डॉ. आशीष मित्तल ने अमर उजाला से कहा कि पहले चरण में ही किसानों ने खूब बढ़चढ़कर वोटिंग की है। किसान विरोधी नीतियों के कारण वे सरकार से नाराज थे और अपनी इस नाराजगी को जाहिर करने के लिए लोगों ने मतदान को अपना हथियार बनाया। 
उन्होंने कहा कि पूरे 58 सीटों पर ग्रामीण इलाकों में अच्छी वोटिंग हुई है। इससे उनका उद्देश्य सफल होता दिख रहा है। किसान नेता ने दावा किया कि आने वाले बाकी के छह चरणों में भी किसानों का यही रुख बना रहेगा। 

जाट-मुसलमान मतदाताओं में नहीं हुआ बिखराव
राष्ट्रीय लोकदल के महासचिव तारेक मुस्तफा ने कहा कि बागपत, मेरठ, शामली और मुजफ्फरनगर के सभी इलाकों में मतदाताओं ने खूब बढ़चढ़कर वोटिंग की है। मुस्लिम बहुल सीटों पर रिकॉर्ड मतदान हुआ है तो जाट मतदाताओं ने भी खूब मतदान किया है। उन्होंने कहा कि जाट मतदाताओं में बिखराव होने की बात कही जा रही थी, लेकिन मतदान ने साबित कर दिया है कि उनके मतदाताओं में कहीं कोई बिखराव नहीं हुआ है और सबने एकजुट होकर गठबंधन के पक्ष में मतदान किया है। उनका दावा है कि इन 58 सीटों में गठबंधन कम से कम 40 सीटें जीत रहा है।

विज्ञापन
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें