केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह पूरे दमखम के साथ पश्चिमी यूपी के मोर्चे पर डट गए हैं। कैराना में बीजेपी उम्मीदवार मृगांका सिंह के लिए घर-घर प्रचार करने के बाद गुरूवार को वे मथुरा पहुंचे। यहां उन्होंने पहले बांकेबिहारी मंदिर में दर्शन किया और फिर भाजपा प्रत्याशी श्रीकांत शर्मा के पक्ष में प्रचार किया। इसके बाद ग्रेटर नोएडा के दादरी विधानसभा क्षेत्र पहुंचकर बीजेपी उम्मीदवार तेजपाल सिंह नागर के लिए घर-घर जाकर वोट मांगे।
अमित शाह जैसे कद्दावर नेता को यह कड़ी मशक्कत केवल इसलिए करनी पड़ रही है क्योंकि कथित तौर पर किसान आंदोलन में जाटों की उपेक्षा करने के कारण पश्चिमी यूपी के जाट मतदाता भाजपा से नाराज हैं। अमित शाह लगातार जाट नेताओं के साथ बैठक कर उनकी नाराजगी दूर करने की कोशिश कर रहे हैं। लेकिन क्या वे जाट मतदाताओं को एक बार फिर भाजपा के पक्ष में जोड़ने में सफल रहेंगे?
अभी की स्थिति में सपा-आरएलडी गठबंधन पश्चिमी मोर्चे पर मजबूत स्थिति में है। लेकिन जिस तरह अमित शाह ने जाट नेताओं से मुलाकात करने और घर-घर जाकर वोट मांगने की रणनीति अपनाई है, उससे स्थिति में कुछ सकारात्मक असर पड़ रहा है। भाजपा ने जाट उम्मीदवारों को मैदान में उतारकर जाट मतदाताओं में बंटवारा अवश्य कर दिया है। अब उसके पक्ष में कितने फीसदी जाट वोट आएंगे, यह देखने वाली बात होगी। जिन सीटों पर सुरक्षा का मुद्दा मजबूती से उभर रहा है, वहां भी जाट मतदाताओं में बंटवारा होने की बात कही जा रही है।
जाट-मुस्लिम बहुल आबादी होने के कारण पश्चिमी यूपी की ज्यादातर विधानसभाओं के समीकरण भाजपा के खिलाफ बताए जा रहे हैं। मुजफ्फरनगर की छह सीटों में पांच पर सपा-आरएलडी गठबंधन के मजबूत स्थिति में होने की बात कही जा रही है, जबकि एक सीट भाजपा के खाते में जा सकती है। मुजफ्फरनगर सदर सीट ज्यादातर भाजपा के पक्ष में रही है। यहां से भाजपा के उम्मीदवार कपिलदेव अग्रवाल योगी आदित्यनाथ सरकार में मंत्री हैं। उनकी स्थिति सपा के उम्मीदवार सौरभ स्वरूप उर्फ बंटी की तुलना में मजबूत बताई जा रही है।
जाटलैंड की कुछ सीटों पर अभी की स्थिति
बुढ़ाना विधानसभा क्षेत्र में आरएलडी उम्मीदवार राजपाल बाल्यान पहले भी दो बार विधायक रह चुके हैं। महेंद्र सिंह टिकैत के करीबी रहने के कारण जाट मतदाताओं के बीच उनकी छवि बहुत अच्छी मानी जाती है और उन्हें टिकैत परिवार से अपने संबंधों का लाभ मिल रहा है। उनकी स्थिति जाट-मुस्लिम समीकरण के कारण मजबूत बताई जा रही है, जबकि बुढ़ाना से वर्तमान विधायक उमेश मलिक दुबारा भाजपा के टिकट पर मैदान में हैं। वे अच्छी लड़ाई लड़ रहे हैं, उनकी साख भी बेहतर बताई जाती है, लेकिन जाट-मुस्लिम समीकरण उनके खिलाफ जा रहा है।
चरथावल सीट पर कांग्रेस से सपा में गए पंकज मलिक मजबूत लड़ाई लड़ रहे हैं, जबकि भाजपा उम्मीदवार सपना कश्यप अपने स्वर्गवासी पति विजय कश्यप की साख भुनाने की कोशिश कर रही हैं। सहानुभूति के बाद भी उनकी लड़ाई पंकज मलिक के सामने काफी कमजोर बताई जा रही है।
खतौली विधानसभा क्षेत्र में लगभग 90 हजार मुस्लिम मतदाता सपा-आरएलडी गठबंधन की बड़ी ताकत बताए जा रहे हैं, बसपा सरकार में मंत्री रहे राजपाल सैनी ने अब सपा का दामन थाम लिया है और वे अब यहां से सपा-आरएलडी गठबंधन के प्रत्याशी के तौर पर मजबूत लड़ाई लड़ रहे हैं। गठबंधन के समझौते के अंतर्गत सपा का नेता होने के बाद भी वे यहां से आरएलडी के चुनाव निशान पर मैदान में हैं और अच्छी लड़ाई लड़ रहे हैं।
विवादित बयानों के कारण हमेशा चर्चा में रहने वाले भाजपा उम्मीदवार विक्रम सैनी अपनी साख के कारण यहां से कुछ कमजोर प्रत्याशी बताए जा रहे हैं। इसी सीट पर करतार सिंह भड़ाना बसपा प्रत्याशी के रूप में मैदान में हैं। धनकुबेर नेता करतार सिंह भड़ाना इस मुकाबले को त्रिकोणीय बनाने की क्षमता रखते हैं, लेकिन बसपा की कमजोर लड़ाई का उन्हें नुकसान उठाना पड़ रहा है। इस पूरे समीकरण में सपा-आरएलडी उम्मीदवार राजपाल सैनी मजबूती से लड़ाई लड़ते बताए जा रहे हैं।
जिले की एकमात्र सुरक्षित सीट पुरकाजी से भाजपा उम्मीदवार प्रमोद उटवाल दुबारा मैदान में हैं। बाल्मीकी समुदाय से उनका अच्छा समर्थन होने के कारण वे मजबूत लड़ाई लड़ रहे हैं, लेकिन उनके सामने आरएलडी उम्मीदवार अनिल कुमार पूर्व में दो बार विधायक रह चुके हैं। गठबंधन का लाभ लेते हुए वे यहां से मजबूत प्रत्याशी बताए जा रहे हैं। बसपा के एडवोकेट सुरेंद्र पाल सिंह भी दलित मतदाताओं के बीच बेहतर पकड़ रखते हैं जिससे मामला त्रिकोणीय हो सकता है।
इसी तरह शामली को भी जाट-मुस्लिम समीकरण से सबसे ज्यादा प्रभावित क्षेत्र माना जाता है। यहां के भाजपा उम्मीदवार तजिंदर सिंह निर्वाल अच्छी लड़ाई लड़ रहे हैं, लेकिन राष्ट्रीय लोकदल के उम्मीदवार प्रसन्न चौधरी काफी मजबूत स्थिति में बताए जा रहे हैं। उन्हें जाट-मुस्लिम समीकरण का लाभ मिलता बताया जा रहा है। बसपा ने यहां से मुस्लिम उम्मीदवार मोहम्मद अयूब जंग को मैदान में उतारा है। लेकिन कथित तौर पर मुस्लिम मतदाता एकजुट होकर बदलाव के लिए वोट कर रहे हैं, और इसका लाभ प्रसन्न चौधरी को मिल सकता है।
थाना भवन में भाजपा के बड़े नेता सुरेश राणा मैदान में हैं। मजबूत छवि होने के बाद भी इस बार यहां उन्हें कांटे के मुकाबले का सामना करना पड़ रहा है। आरएलडी उम्मीदवार अशरफ अली उन्हें कड़ी टक्कर दे रहे हैं। यहां उन्हें असली चुनौती निर्दलीय प्रत्याशी शेर सिंह राणा से मिल रही है।
कैराना से मृगांका सिंह हुकुमदेव सिंह की विरासत संभाल रही हैं। अमित शाह ने उनकी सीट पर जाकर स्वयं उनके पक्ष में प्रचार किया और लोगों से घर-घर जाकर वोट मांगे। लेकिन मुस्लिम बहुल आबादी होने के कारण यहां का समीकरण मृगांका सिंह के खिलाफ जा सकता है। सपा के उम्मीदवार नाहिद हसन पर आपराधिक छवि होने के आरोप लगाए जा रहे हैं और वे वर्तमान में जेल में हैं, लेकिन इस बार वे कैराना की लड़ाई में मृगांका सिंह पर भारी पड़ते दिखाई पड़ रहे हैं।