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सियासत: मोदी और योगी की इस रणनीति से खिसका मायावती का वोट बैंक, अब ब्राह्मणों को अपने खेमे में करने में जुटी बसपा

Sun, 18 Jul 2021 03:30 PM IST
दीप्ति मिश्रा आशीष तिवारी, अमर उजाला, नई दिल्ली

सार

दलितों के एक बड़े वोट बैंक पर भाजपा ने कब्जा किया। बसपा ने इसीलिए दोबारा सोशल इंजीनियरिंग का लिया सहारा ताकि हिंदुओं के तीर्थ स्थान अयोध्या को चुनाव राजनैतिक फसल बोई जा सके। 
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मायावती - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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बहुजन समाज पार्टी (बसपा) सुप्रीमो मायावती को इस बात की भनक लग चुकी है कि आखिर उनके पैरों के नीचे राजनैतिक जमीन खिसक कैसे रही है। पैरों के नीचे की जमीन ब्राह्मणों की वजह से नहीं बल्कि दलितों के उस बड़े वर्ग के शिफ्ट होने से खिसक रही है, जिस पर मोदी ने धीरे-धीरे ही सही, लेकिन अपना जाल बिछाकर गैर जाटव दलितों को अपने खेमे में शामिल करना शुरू कर दिया है। ऐसे में अब मायावती के पास तुरुप की चाल के तौर पर सोशल इंजीनियरिंग का ही दांव बचता है। इसीलिए बसपा ने ब्राह्मणों से अपनी पार्टी में जुड़ने की पेशकश की है। यही वजह है कि हिंदुओं के बड़े तीर्थ स्थल अयोध्या से ब्राह्मण सम्मेलनों की शुरुआत करने की बात कही है।

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दरअसल, बहुजन समाज पार्टी के अपने बड़े वोट बैंक में लगती हुई सेंध को देखकर ब्राह्मणों को साधने की योजना बनाई है। राजनीतिक विश्लेषण एसएन कोहली कहते हैं भारतीय जनता पार्टी और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की रणनीति बनाते हुए कैबिनेट विस्तार में नरेंद्र मोदी ने गैर जाटव दलितों को बड़ा स्थान दिया। मोदी सरकार की और भाजपा की कोशिश है कि उत्तर प्रदेश में बसपा के कोर वोट बैंक दलितों को अपने खेमे में शामिल किया जाए। यही वजह रही कि दलितों में भी गैर जाटव को किनारे कर दिया गया और अन्य लोगों को पार्टी में न सिर्फ बड़ी जिम्मेदारियां दी गई बल्कि मंत्री भी बनाया गया।

2007 में सोशल मीडिया के चलते मिली थी बंपर जीत 
बहुजन समाज पार्टी ने 2007 में पहली बार सोशल इंजीनियरिंग का ताना-बाना बुना था। ब्राह्मणों को जोड़ने का यह पूरा ताना-बाना तैयार किया था सतीश चंद्र मिश्रा ने। नतीजा यह हुआ कि वर्ष 2007 में बहुजन समाज पार्टी ने बंपर जीत हासिल की, लेकिन वर्ष 2012 में बसपा का यह फार्मूला ना सिर्फ फेल हुआ बल्कि उसको सत्ता से भी बाहर कर दिया। 2012 के विधानसभा चुनाव के बाद 2014 में हुए लोकसभा के चुनाव में तो बसपा को ऐसी मुंह की खानी पड़ी कि शायद ही उसने कभी सोचा हो। 
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कभी सत्ता के शीर्ष पर बैठी बहुजन समाज पार्टी का 2014 लोकसभा चुनाव में खाता तक नहीं खुला था। राजनीतिक विश्लेषकों के मुताबिक, बस इसके साथ ही बहुजन समाज पार्टी का उतार शुरू हो गया। वर्ष 2017 में हुए विधानसभा चुनाव में बहुजन समाज पार्टी को कोई खास सफलता हाथ नहीं लगी। हालांकि, यह बात अलग है कि 2019 में समाजवादी पार्टी के साथ गठबंधन कर बहुजन समाज पार्टी ने बहुत बड़ा दांव खेला। नतीजा हुआ कि बसपा को 2014 में 0 सीट के मुकाबले 10 सीटें मिली। हालांकि, उसके बाद बसपा और समाजवादी पार्टी का बिखराव हो गया। इस बिखराव की बड़ी वजह यही रही कि दोनों पार्टियों के वोट बैंक आपस में पूरी तरीके से ट्रांसफर ही नहीं हो सके। 

राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है इन दोनों पार्टियों की आपसी लड़ाई और बसपा के गिरते हुए ग्राफ का पूरा फायदा भारतीय जनता पार्टी को मिलने लगा। भारतीय जनता पार्टी ने बसपा के गिरते ग्राफ को कैश कराने के लिए ना सिर्फ दलितों में अपनी पैठ बनानी शुरू की बल्कि उसके और दूसरे को वोट बैंक में सेंध भी लगानी शुरू कर दी। इसके लिए ना सिर्फ राज्य सरकार बल्कि केंद्र सरकार ने अपनी बड़ी बड़ी योजनाओं में दलितों को बड़ी भूमिकाओं में रखना शुरू कर दिया।

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मोदी की यह रणनीति बसपा पर पड़ रही भारी

नरेंद्र मोदी सरकार ने मंत्रिमंडल विस्तार में इस बार दलितों को जगह दी। खासतौर से उत्तर प्रदेश के चुने गए मंत्रियों में दलितों का खासा स्थान रहा। यह गैर जाटव दलित है। माना जाता है दलितों में जाटव मायावती का कोर वोट बैंक है। बीते दिनों राष्ट्रपति रामनाथ कोविद द्वारा लखनऊ में डॉक्टर भीमराव अंबेडकर सांस्कृतिक केंद्र के शिलान्यास को लेकर भी मायावती ने कड़ी आपत्ति दर्ज की थी, लेकिन भाजपा ने अपने इशारे स्पष्ट कर दिए थे कि वह दलितों को मनाने की पूरी जुगत लगाए हुए हैं। राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि भारतीय जनता पार्टी ने धीरे-धीरे लेकिन बसपा के बड़े वोट बैंक के तौर पर दलितों को उससे अलग करना शुरू कर दिया था। यही वजह रही कि बसपा को नए सिरे से पूरे राजनैतिक समीकरण को साधने की योजना बनानी पड़ी।

सोशल इंजीनियरिंग दिखाएगी अपना असर!
भाजपा जिस तरह से दलितों को अपने खेमे में शामिल कर रही थी, उससे मायावती को न सिर्फ पहले नुकसान हो रहा था बल्कि आने वाले चुनावों में भी बड़ा नुकसान उठाना पड़ सकता था। इसीलिए उन्होंने ब्राह्मणों पर एक बार फिर से अपने साथ जुड़ने की अपील की। हमेशा की तरह इस बार भी बहुजन समाज पार्टी के कद्दावर नेता सतीश चंद्र मिश्र के ऊपर ब्राह्मणों को जोड़ने की पूरी कमान सौंप दी गई है। अयोध्या से शुरू होने वाले ब्राह्मण सम्मेलनों की पूरी जिम्मेदारी सतीश मिश्रा की है। बसपा के पास इस वक्त ब्राह्मणों के बड़े चेहरे के तौर पर न सिर्फ सतीश चंद्र मिश्रा है बल्कि उनका सोशल इंजीनियरिंग का अपना पुराना अनुभव भी साथ में है। अब देखने वाली बात यह होगी कि अगले साल होने वाले विधानसभा चुनावों में सोशल इंजीनियरिंग क्या 2007 की तरह अपना असर दिखा पाएगी या नहीं। 

बसपा के इस बार ब्राह्मणों को जोड़ने की कवायद पर राजनीतिक विश्लेषकों का मत अलग है। उत्तर प्रदेश की राजनीति को करीब से समझने वाले हेमेंद्र शुक्ला कहते हैं कि 2007 में और 2022 में बहुत वक्त गुजर चुका है। उनका कहना है कि वर्ष 2007 की भारतीय जनता पार्टी में हिंदुत्व था, लेकिन कट्टर हिंदुत्व साफ तौर पर सामने से नहीं दिखता था। वर्ष 2022 में तस्वीर एकदम उलट है। मोदी और योगी के राज में हिंदुत्व की कट्टरता स्पष्ट रूप से सामने दिख रही है। इसलिए अब बहुजन समाज पार्टी की सोशल इंजीनियरिंग उसी तरह काम करेगी इस पर संदेह है। लेकिन उनका कहना है यह राजनीति है। इसमें कभी भी कुछ भी हो सकता है क्योंकि यहां की राजनीति जातिगत समीकरणों के आधार पर ही चलती है।
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