नरेंद्र मोदी सरकार ने मंत्रिमंडल विस्तार में इस बार दलितों को जगह दी। खासतौर से उत्तर प्रदेश के चुने गए मंत्रियों में दलितों का खासा स्थान रहा। यह गैर जाटव दलित है। माना जाता है दलितों में जाटव मायावती का कोर वोट बैंक है। बीते दिनों राष्ट्रपति रामनाथ कोविद द्वारा लखनऊ में डॉक्टर भीमराव अंबेडकर सांस्कृतिक केंद्र के शिलान्यास को लेकर भी मायावती ने कड़ी आपत्ति दर्ज की थी, लेकिन भाजपा ने अपने इशारे स्पष्ट कर दिए थे कि वह दलितों को मनाने की पूरी जुगत लगाए हुए हैं। राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि भारतीय जनता पार्टी ने धीरे-धीरे लेकिन बसपा के बड़े वोट बैंक के तौर पर दलितों को उससे अलग करना शुरू कर दिया था। यही वजह रही कि बसपा को नए सिरे से पूरे राजनैतिक समीकरण को साधने की योजना बनानी पड़ी।
सोशल इंजीनियरिंग दिखाएगी अपना असर!
भाजपा जिस तरह से दलितों को अपने खेमे में शामिल कर रही थी, उससे मायावती को न सिर्फ पहले नुकसान हो रहा था बल्कि आने वाले चुनावों में भी बड़ा नुकसान उठाना पड़ सकता था। इसीलिए उन्होंने ब्राह्मणों पर एक बार फिर से अपने साथ जुड़ने की अपील की। हमेशा की तरह इस बार भी बहुजन समाज पार्टी के कद्दावर नेता सतीश चंद्र मिश्र के ऊपर ब्राह्मणों को जोड़ने की पूरी कमान सौंप दी गई है। अयोध्या से शुरू होने वाले ब्राह्मण सम्मेलनों की पूरी जिम्मेदारी सतीश मिश्रा की है। बसपा के पास इस वक्त ब्राह्मणों के बड़े चेहरे के तौर पर न सिर्फ सतीश चंद्र मिश्रा है बल्कि उनका सोशल इंजीनियरिंग का अपना पुराना अनुभव भी साथ में है। अब देखने वाली बात यह होगी कि अगले साल होने वाले विधानसभा चुनावों में सोशल इंजीनियरिंग क्या 2007 की तरह अपना असर दिखा पाएगी या नहीं।
बसपा के इस बार ब्राह्मणों को जोड़ने की कवायद पर राजनीतिक विश्लेषकों का मत अलग है। उत्तर प्रदेश की राजनीति को करीब से समझने वाले हेमेंद्र शुक्ला कहते हैं कि 2007 में और 2022 में बहुत वक्त गुजर चुका है। उनका कहना है कि वर्ष 2007 की भारतीय जनता पार्टी में हिंदुत्व था, लेकिन कट्टर हिंदुत्व साफ तौर पर सामने से नहीं दिखता था। वर्ष 2022 में तस्वीर एकदम उलट है। मोदी और योगी के राज में हिंदुत्व की कट्टरता स्पष्ट रूप से सामने दिख रही है। इसलिए अब बहुजन समाज पार्टी की सोशल इंजीनियरिंग उसी तरह काम करेगी इस पर संदेह है। लेकिन उनका कहना है यह राजनीति है। इसमें कभी भी कुछ भी हो सकता है क्योंकि यहां की राजनीति जातिगत समीकरणों के आधार पर ही चलती है।