साल 1999 की गर्मियों में इंग्लैंड में हुए वर्ल्ड कप में पाकिस्तान पर भारत की शानदार जीत के बाद युवाओं के सीने में क्रिकेट का ज्वार उफान पर था। क्रिकेट का शौक तो पहले से ही था वर्ल्ड कप के बाद क्रिकेटर बनने का जुनून दिमाग पर छा गया।
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दो बार फेल होने के बाद मैट्रिक पास होने का किला अभी अभी फतह किया था, इसलिए घरवालों की रोकटोक की भी ज्यादा चिंता नहीं थी। दिक्कत ये थी कि सहारनपुर जैसे छोटे से शहर में क्रिकेट की बहुत ज्यादा संभानाएं दिखाई नहीं देती थी, ऐसे में हमने मदद ली अपने कोच जगमोहन नेगी की, नेगी सर अपने जमाने के धुरंधर खिलाड़ी रहे थे।
उन्होंने अपने एक दोस्त राजकुमार शर्मा का नाम सुझाया, जो दिल्ली के पश्चिम बिहार में क्रिकेट एकेडमी चलाते थे। बस फिर क्या था राजकुमार शर्मा का पता लेकर मैंने रात को ही दिल्ली जाने वाली पैसेंजर ट्रेन पकड़ ली।
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सुबह चार बजे उसने मुझे नई दिल्ली स्टेशन उतारा, वहां से बस पकड़ कर सीधा पहुंच गया पश्चिम बिहार के सेंट जेवियर कालेज। जून की गर्माहट भरी सुबह में मैं कालेज में घुसा तो पहली नजर नेट पर बैटिंग कर रहे 'छोटे से' बल्लेबाज पर पड़ी। पांच फुट तीन इंच का वो वो लड़का सारे गेंदबाजों को मारे जा रहा था।
जो फॉस्ट बॉलर जितनी तेज गेंद करता उस पर सधे बल्ले के साथ वो उतना ही तेज प्रहार करता। स्पिन गेंदबाजों को तो वह कुछ समझ ही नहीं रहा था। उसे खेलते देखकर मुझे अपने फेवरेट सचिन तेंदुलकर की याद आ गई। क्योंकि मेरे सामने पन्द्रह मिनट की बल्लेबाजी में वो बालक बामुश्किल एक या दो बार बीट हुआ होगा।
कम उम्र में ही गेंदबाजों पर हावी रहने लगे थे कोहली
बालक विराट कोहली को पुरस्कार देते आशीष नेहरा
बैटिंग करने के बाद जैसे ही वो नेट से बाहर आया मैं तेजी से उसके पास पहुंचा और वहां खड़े एक दूसरे लड़के से पूछा क्या नाम है इसका। मेरी तरफ देखे बिना ही वह बोला 'चीकू'। मैंने कहा चीकू कौन सा नाम हुआ। अब तक उस लड़के का पारा चढ़ चुका था, शायद वो बहुत देर से अपनी बल्लेबाजी के इंतजार में था और उसकी निगाहें कोच राजकुमार शर्मा पर थी कि वो उसे आवाज लगाने वाले होंगे।
लेकिन कोच ने तो आवाज नहीं लगाई मैंने जरूर उसे कुरेदना शुरू कर दिया था। वो गुस्से में आकर बोला आप यहां नये आए हो क्या? मैंने कहा, हां। तभी आप इसे नहीं जानते...ये रोज हमारी बैटिंग खा जाता है, कोच इसे देर तक खिलाते हैं और हमें बैटिंग मिल नहीं पाती। इसका नाम है विराट.... विराट कोहली। कोहली की उम्र उस समय मात्र 11-12 साल की रही होगी।
जी हां... वही विराट कोहली, पूरी दुनिया के गेंदबाज आज जिसके आगे नतमस्तक हैं। जिन्होंने टी-20 वर्ल्ड कप में आस्ट्रेलिया के खिलाफ अपनी शानदार पारी से पूरी दुनिया को दीवाना कर दिया है। विराट कोहली से मेरा पहला परिचय कुछ ऐसा ही था।
नेट खत्म होने के बाद मैं कोच राजकुमार शर्मा से मिला और अपना परिचय दिया। उन्होंने मुझे अगले दिन से ही नेट पर बुला लिया। मैं सहारनपुर से आया था और 16-17 साल की उम्र थी। वहां खेलता था तो लगता था बहुत शानदार बल्लेबाजी करता हूं, लेकिन कोहली को देखकर मेरा सारा मुगालता हवा हो चुका था।
उसके मुकाबले मैं एक चौथाई भी नहीं था। अब मैं रोज जाता तो था खुद प्रैक्टिस करने के लिए लेकिन देखता रहता था कोहली को बल्लेबाजी करते हुए। पांच छह दिन नेट करने के बाद मुझे घर की याद सताने लगी और मैं कोच से विदा लेकर वापस अपने घर पहुंच गया।
दूसरे सत्र में ही बन गए थे दिल्ली की टीम के कप्तान
तेज गेंदबाज ईशांत शर्मा के साथ विराट कोहली
घर पहुंचा तो साथी क्रिकेटरों को बताने की बेताबी थी कि मैंने एक ऐसे लड़के को खेलते देखा है जो बिल्कुल सचिन तेंदुलकर की तरह बैटिंग करता है और एक दिन इंडियन टीम में खेलेगा।
यह सुनकर हर कोई हैरत में था लेकिन मैंने कोहली का नाम अपनी जुबान से इतनी बार दोहरा दिया कि दोस्तों को भी उसका नाम रट गया। कुछ साल बाद विराट कोहली का चयन जब दिल्ली की अंडर 15 टीम में हुआ तो अपने दोस्तों को यह जानकारी देने वालों में मैं सबसे पहला था। मैंने बड़े चहकते हुए बताया कि देखना ये लड़का बहुत लंबा जाएगा।
2002-2003 में पहले सीजन में विराट ने पाली उमरीगर ट्राफी में 34.40 की औसत से रन तो मात्र 172 ही बनाए लेकिन दिग्गजों को उसकी प्रतिभा की झलक लग चुकी थी। इसीलिए उसे अगले सीजन में दिल्ली की टीम का कप्तान बना दिया गया।
इसी साल विराट सहारनपुर में होने वाले शिव कुमार गुप्ता मैमोरियल अंडर 16 क्रिकेट टूर्नामेंट में खेलने के लिए आया। कोच राजकुमार शर्मा उसे दिल्ली की टीम की तरफ से लेकर आए थे। मुझे ये पता लगा तो मैं स्टेडियम में प्रैक्टिस करने वाले अपने साथियों को लेकर उसका मैच देखने पहुंच गया।
मैच शुरू होने में अभी देर थी लेकिन मैंने दोस्तों के सामने कोहली की इतनी तारीफ कर दी कि हर कोई बेसब्री से उसके इंतजार में था। कोहली दिल्ली की तरफ से तीसरे नंबर पर बल्लेबाजी के लिए आए, हमारी धड़कनें बढ़ी हुई थी। उसने आते ही एक दो झन्नाटेदार शॉट दिखाए तो मैं खड़ा होकर दोस्तों को चिढ़ाने लगा।
पिता के शव को घर में छोड़ टीम को निकाला था संकट से
रविन्द्र जडेजा के साथ विराट कोहली
लेकिन पूरी रौ में आने से पहले ही वह एक ऊंची उठती गेंद पर अपना विकेट गंवाकर वापिस लौट गया। कोहली के जल्दी लौटते ही मेरे दोस्तों ने मुझे घेर लिया और जमकर मेरा मजाक उड़ाया। बात आई गई हो गई और मेरी निगाहें विराट को अखबार के पन्नों में ढूंढती रहीं।
एक दिन निगाह एक खबर पर पड़ी जिसे पढ़कर यकीन ही नहीं हुआ कि कोई इंसान इतने बड़े दिल और जीवट वाला भी हो सकता है। साल 2006 में कर्नाटक के खिलाफ रणजी ट्राफी मैच के दूसरे दिन का खेल खत्म कर विराट कोहली घर पहुंचे तो टीम बुरी स्थिति में थी और उस पर फॉलोऑन के साथ शर्मनाक हार का खतरा मंडरा रहा था। लेकिन इससे भी बुरी खबर घर में उनका इंतजार कर रही थी।
रात को ही विराट के पिता प्रेम कोहली की दिल का दौरा पड़ने से मौत हो गई। अब विराट धर्मसंकट में थे पिता की लाश घर में थी और टीम संकट में। विराट ने फैसला लेने में जरा भी देर नहीं लगाई और पिता के शव को घर में ही छोड़ कर वह मैच खेलने पहुंच गए। विराट ने शानदार 90 रन बनाए और टीम के फालोऑन से बचा लिया। जब लगा वह टीम को अच्छी स्थिति में ले जा सकते हैं तभी अंपायर के एक गलत फैसले ने उन्हें लौटने पर मजबूर कर दिया।
उस समय उनकी टीम के कप्तान रहे मिथुन मिन्हास बताते हैं कि आउट होकर विराट बहुत रोए। काफी देर तक अकेले ड्रैसिंग रूम में बैठे रहे। इसके बाद पूरी टीम विराट के घर पहुंची और उनके पिता के अंतिम संस्कार में भाग लिया।
उस वाकये को याद कर उनकी मां सरोज बताती हैं कि उस दिन के बाद से विराट में बहुत बदलाव आया। वह काफी परिपक्व हो गया और हर मैच को गंभीरता से लेने लगा। उसे टीम से बाहर बैठने में नफरत हो गई।
सालों बाद 2006 में राजकुमार शर्मा की एकेडमी में ही एक बार फिर कोहली से मुलाकात हुई लेकिन तब तक वह स्टार बन चुके थे इंडिया की अंडर 19 टीम में उनकी जगह पक्की हो गई थी। लेकिन मस्तमौला स्वभाव तब भी वैसा ही था।
हर साथी खिलाड़ी से छेड़छाड़ करने की उसकी आदत उन्हें सबका प्रिय बनाती थी। कोच राजकुमार डांटते तो तफरी में उनकी बात उड़ा देते। साइड में खड़ा होकर मैं उनसे बात करता कि यह अब भी नहीं बदला, वो बोलते, "नहीं।"
आज कोहली को खेलते देखकर गर्व होता है कि कुछ दिन ही सही हम भी उनसे साथ खेले थे। उम्मीद है विराट तुम इसी तरह हमें खुश होने और चहकने के मौके देते रहोगे। तुम आगे बढ़ते रहना हमेशा.... हमेशा।।
(अमर उजाला के पत्रकार हरेन्द्र सिंह मोरल के विराट कोहली संग बिताए दिनों के अनुभव पर आधारित।)