जगत के मुताबिक वह इन इलाके के गांव वालों को बखूबी पहचानते हैं, लेकिन इस वक्त यहां आने वालों में कानपुर के ही नहीं दूर दराज के जिलों के लोग भी पहुंच रहे हैं। जगत कहते हैं शुरुआत से ही इन गांवों में शवों के दफनाने की मान्यता ही नहीं रही। जगत का कहना है कि इस आपदा के वक्त आने वाले लोग सिर्फ डर के मारे ही अपनों के शवों को दफनाने की बजाय शवों को एक तरह से ऐसे ही छोड़ जाते हैं। बस थोड़ी सी रेती में शव को छिपा देते हैं।
खेरेश्वर घाट के किनारे बसे जगदीशपुर गांव के लखन कहते हैं कि लगातार इतनी मौतें हो रहीं हैं कि लोग रात को भी शवों को दफनाने के लिए आते हैं। कई लोग तो रातों को शवों को बहा जाते हैं। हालांकि इसकी संख्या नहीं के बराबर है।
शुक्लागंज के घाटों पर बीते कुछ दिनों से खुले में दफनाए गए शवों की तस्वीरों के सामने आने के बाद प्रशासन ने उनको ढक दिया है। स्थानीय प्रशासन के मुताबिक लोग घाटों को छोड़कर दूर दराज के इलाकों में जहां गंगा का मैदानी इलाका दिख जाता है, वहीं संस्कार के नाम पर शव को दफना देते हैं।
जलाने के लिए नहीं मिल रही लकड़ी
यहां के घाट पर अपने रिश्तेदार का संस्कार करने पहुंचे शुक्लागंज के संतोष चरण साहू कहते हैं कि उनको तो लकड़ी मिल गई, इसलिए वो अंतिम संस्कार जलाकर करेंगे, लेकिन हकीकत यह है कि लोगों को संस्कार के लिए लकड़ी तक नहीं मिल रही है।
साहू का कहना है कि यही वजह है कि लोग अपनों को या तो मान्यताओं के विपरीत दफना कर जा रहे हैं या फिर शव को गंगा में छोड़कर। वह कहते हैं कि जब तक कोई बहुत मजबूरी नहीं होगी तब तक लोग अपनी परंपराओं को नहीं तोड़ेंगे। शायद यह मजबूरियां ही होंगी जो लोग अपनों की पार्थिव देह को यूं ही गंगा के आंचल में छोड़कर जा रहे हैं।