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गंगा किनारे लाशों का सच: क्यों मजबूर हुए लोग, पढ़िए अमर उजाला की ग्राउंड रिपोर्ट

Sun, 16 May 2021 04:39 PM IST
सुरेंद्र जोशी आशीष तिवारी, अमर उजाला, उन्नाव/कानपुर/शुक्लागंज

सार

दहशत के चलते गंगा की रेती में ही दफना रहे अपनों को। अमर उजाला डॉट कॉम को गंगा किनारे बसे लोगों ने सुनाई दास्तान और बताए क्या हैं हालात।
 
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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : amar ujala
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विस्तार
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उन्नाव के शुक्लागंज इलाके में एक गांव है सरोसी। इस गांव के कुछ लोगों की मौत हो गई तो ज्यादातर लोगों ने गंगा नदी के किनारे रेती में अपनों को दफना दिया। इस गांव की अधिसंख्य आबादी हिंदू है, इसलिए शवों को दफनाने की मान्यता तो नहीं है। बावजूद इसके इस गांव और आसपास के अधिकतर गांवों के लोग मृत स्वजनों को गंगा किनारे रेती में ही दफन कर रहे हैं। इसकी वजह गांव के लोग कोरोना का खौफ बताते हैं। उनका कहना है कि महामारी के डर के मारे लोग शव की अंत्येष्टि तुरत-फुरत कर देना चाहते हैं। इसीलिए वे उन्हें दफना रहे हैं या गंगा मैया में विसर्जित कर रहे हैं। 

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इतनी मौतें हो रही कि जलाएं भी तो कहां?
उन्नाव के शुक्लागंज इलाके के रहने वाले चमन शुक्ला कहते हैं कि गंगा के किनारे बसे हिंदू बाहुल्य आबादी वाले इलाकों में शवों को दफनाने का चलन ही नहीं है। लेकिन वह कहते हैं कि इतनी मौतें हो रहीं है कि लोग सहमे हुए हैं। उनको डर लग रहा है कि शव को जलाएं भी तो कहां। 

चमन कहते हैं कि उन्नाव के गंगाघाटों पर वह बीते कम से कम 20 बरस से शवों को जलाने का काम देखते हैं, लेकिन ऐसी भयावहता कभी नहीं देखी। वह कहते हैं कि लोग अपनों को जलाने के लिए कोई मिन्नत तक नहीं करता। लोग दूर-दूर से आकर गंगा की रेती में शवों को दफना रहे हैं। 
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पहले कभी गांव के लोगों को शव दफनाते नहीं देखा
कानपुर के बिल्हौर के खेरेश्वर घाट पर शवों के क्रियाकर्म करने का काम देखने वाले जगत प्रकाश कहते हैं कि पीढ़ियों से उनके स्वजन यही काम करते आ रहे हैं। आज तक तो उन्होंने इन इलाको के गांव वालों को कभी भी शवों को दफनाते हुए नहीं देखा। लेकिन आज आलम यह है कि सबसे ज्यादा शव यहीं दफनाए जा रहे हैं। 

रेत में शव को छिपाकर चले जाते हैं लोग

जगत के मुताबिक वह इन इलाके के गांव वालों को बखूबी पहचानते हैं, लेकिन इस वक्त यहां आने वालों में कानपुर के ही नहीं दूर दराज के जिलों के लोग भी पहुंच रहे हैं। जगत कहते हैं शुरुआत से ही इन गांवों में शवों के दफनाने की मान्यता ही नहीं रही।  जगत का कहना है कि इस आपदा के वक्त आने वाले लोग सिर्फ डर के मारे ही अपनों के शवों को दफनाने की बजाय शवों को एक तरह से ऐसे ही छोड़ जाते हैं। बस थोड़ी सी रेती में शव को छिपा देते हैं। 

खेरेश्वर घाट के किनारे बसे जगदीशपुर गांव के लखन कहते हैं कि लगातार इतनी मौतें हो रहीं हैं कि लोग रात को भी शवों को दफनाने के लिए आते हैं। कई लोग तो रातों को शवों को बहा जाते हैं। हालांकि इसकी संख्या नहीं के बराबर है।

 

जहां मैदानी इलाका दिखा वहीं दफना रहे

शुक्लागंज के घाटों पर बीते कुछ दिनों से खुले में दफनाए गए शवों की तस्वीरों के सामने आने के बाद प्रशासन ने उनको ढक दिया है। स्थानीय प्रशासन के मुताबिक लोग घाटों को छोड़कर दूर दराज के इलाकों में जहां गंगा का मैदानी इलाका दिख जाता है, वहीं संस्कार के नाम पर शव को दफना देते हैं। 

जलाने के लिए नहीं मिल रही लकड़ी
यहां के घाट पर अपने रिश्तेदार का संस्कार करने पहुंचे शुक्लागंज के संतोष चरण साहू कहते हैं कि उनको तो लकड़ी मिल गई, इसलिए वो अंतिम संस्कार जलाकर करेंगे, लेकिन हकीकत यह है कि लोगों को संस्कार के लिए लकड़ी तक नहीं मिल रही है। 
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मजबूरी में तोड़ रहे हैं परंपरा

साहू का कहना है कि यही वजह है कि लोग अपनों को या तो मान्यताओं के विपरीत दफना कर जा रहे हैं या फिर शव को गंगा में छोड़कर। वह कहते हैं कि जब तक कोई बहुत मजबूरी नहीं होगी तब तक लोग अपनी परंपराओं को नहीं तोड़ेंगे। शायद यह मजबूरियां ही होंगी जो लोग अपनों की पार्थिव देह को यूं ही गंगा के आंचल में छोड़कर जा रहे हैं।  
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