बच्चों के खिलाफ बढ़ते यौन अपराधों को देखते हुए एक शीर्ष पैनल ने सिफारिश की है कि गंभीर अपराधों में केंद्र सरकार को बालिग होने की उम्र को 18 से घटाकर 16 देना चाहिए। समिति ने उल्लेख किया कि पोक्सो एक्ट के तहत दर्ज मामलों लगभग 45 फीसदी की बढ़ोतरी हुई है। ऐसे मामले 2017 में 32,608 थे इससे बढ़कर 2019 में 47,325 हो गए। जो चिंताजनक है।
साथ ही पैनल ने कुछ महत्वपूर्ण सिफारिशें भी केंद्र सरकार के सामने रखीं जिनमें साइबर क्राइम पर नजर और महिलाओं के खिलाफ अपराधों पर पुलिस की जवाबदेही बढ़ाने की बात कही।
अभी पोक्सो या भारतीय दंड संहिता के तहत गंभीर अपराध में 16 से 18 साल के उम्र वाले को बालिग के रूप में रखा जाता है। आमतौर पर यह निर्णय किशोर न्याय बोर्ड के पास होता है। कोई किशोर अगर अपराध करते पकड़ा जाता है तो उसे सुधार गृह में भेजा जाता है, न कि जेल में। साथ ही उसकी पुनर्वास की एक प्रक्रिया भी तैयार की जाती है।
पैनल की सिफारिशें अब अगले हफ्ते की शुरुआत में संसद में पेश होंगी। साथ ही पैनल ने कानून के तहत अच्छी सजा दर के लिए उत्तर प्रदेश सरकार की भी सराहना की। पोक्सो एक्ट 2012 में लागू किया गया था। इसमें बच्चों के खिलाफ बढ़ते अपराधों की जांच करने और अपराध में लिप्त पाए जाने के बाद उम्रकैद और मौत की सजा का प्रावधान किया गया था।
अक्सर ऐसा देखा जाता है अपराधी नाबालिक होने की आड़ में बड़ा अपराध कर बैठता है। अगर वह पकड़ भी लिया जाता है तो कानून की आड़ में बच जाता है। इसका एक उदाहरण दिल्ली चलती बस में हुआ सामूहिक दुष्कर्म था जहां 17 साल के अपराधी को नाबालिग मानकर सजा दी गई। इस घटना के बाद से ही नाबालिग की उम्र घटाने को लेकर कई समितियां काम कर रही हैं।
सुबूतों के अभाव में प्रतिदिन यौन शोषण के शिकार चार बच्चों को नहीं मिल पाता न्याय
कैलाश सत्यार्थी चिल्ड्रेन्स फाउंडेशन (केएससीएफ) की ओर से पोक्सो एक्ट- 2012 के तहत दर्ज केसों और उनके निपटारे के तरीके के अध्ययन के बाद यह तथ्य उभर कर सामने आया कि सुबूतों के अभाव में प्रतिदिन यौन शोषण के शिकार चार बच्चों को न्याय नहीं मिल पाता।
अध्ययन में यह बात उभर कर सामने आई कि वर्ष 2017 और 2019 के बीच केसों को बंद करने की संख्या बढ़ गई। पुलिस ने केसों को जांच के बाद सुबूतों के अभाव का हवाला देते हुए बंद कर दिया और आरोप पत्र दाखिल नहीं किए।
अध्ययन में बताया गया कि देश में बच्चों के खिलाफ यौन शोषण की घटनाओं में वृद्धि हुई है। भले ही देश में बच्चों की सुरक्षा के मकसद से पोक्सो कानून लागू किया गया मगर इस पर अमल की रफ्तार बेहद धीमी और असंतोषजनक है। केएससीएफ केमुताबिक 2019 तक करीब 89 फीसदी मामलों को न्याय का इंतजार था।