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दलितों के एक कदम पास तो दो कदम दूर मोदी

Thu, 26 May 2016 01:23 PM IST
अभय कुमार दुबे/एसोसिएट प्रोफ़ेसर, सीएसडीएस
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मोदी सरकार को सामाजिक मोर्चे पर एक बहुत बड़ी उलझन का सामना करना पड़ा - फोटो : BBC
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पिछले दो साल की हुकूमत में मोदी सरकार को सामाजिक मोर्चे पर एक बहुत बड़ी उलझन का सामना करना पड़ा है। सरकार के रणनीतिकारों की समझ में नहीं आ रहा है कि दलित समुदाय के भीतर भारतीय जनता पार्टी की पहुँच किस तरह बढ़ाई जाए। 2014 के चुनाव में कांग्रेस विरोधी हवा और मोदी के बड़े-बड़े वादों से प्रभावित हो कर दलित समाज के पढ़े-लिखे हिस्से ने भारतीय जनता पार्टी को समर्थन दिया था। इसी से उत्साहित हो कर राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ के मार्गदर्शन में भाजपा ने नियोजित रूप से दलितों को अपने साथ जोड़ने की मुहिम शुरू की। इसके लिए संघ के सरसंघचालक ने अनुसूचित जातियों को आरक्षण का खुला समर्थन किया (संघ के इतिहास में ऐसा पहली बार हुआ)। हिंदुत्ववादियों ने डॉ आंबेडकर को सार्वजिनक मंचों पर अपना आदर्श-पुरुष बताना शुरू कर दिया।
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ऐसा पहले भी किया जाता था, पर इस बार तो संघ के मुखपत्र 'पांचजन्य' ने आंबेडकर के विचारों पर 100 पन्नों का विशेषांक ही निकाल डाला। इससे भी आगे बढ़ कर सरकार ने 'स्टैंडअप इंडिया' की योजना घोषित करके दलितों के बीच उद्यमशीलता को बढ़ावा देने की तरफ़ कदम बढ़ाए।

सब-कुछ ठीक-ठाक चल रहा था कि अचानक हैदराबाद केंद्रीय विश्वविद्यालय के एक शोध-छात्र रोहित वेमुला ने आत्महत्या कर ली। इसके बाद हुए घटनाक्रम से छवि यह बनी कि इस खुदकशी में दो केंद्रीय मंत्रियों और विश्वविद्यालय की विद्यार्थी परिषद की इकाई का कथित रूप से कहीं न कहीं हाथ है। केंद्रीय सरकार और पार्टी ने जिस तरह से इस मसले को निपटाने की कोशिश की, उससे संघ की सारी कोशिशों पर पानी फिर गया। रोहित वेमुला को देशद्रोही तक बताया गया। सुषमा स्वराज ने उसे ग़ैर-दलित बताने की कोशिश भी की। न केवल हैदराबाद में बल्कि देश के सभी विश्वविद्यालयों में और आम तौर पर दलित समाज में रोहित का मासूम चेहरा दलितों के प्रति मोदी और उनकी सरकार के नकारात्मक रवैये का प्रतीक बनता चला गया। आज स्थिति यह है कि दलितों से जुड़ना तो दूर, भाजपा सरकार के दो साल पूरे होने पर सामने आए सूचकांकों में दलितों के संबंध में यह सरकार सबसे ज़्यादा नुकसान में दिख रही है। ईटी मैग़ज़ीन और बिग डेटा फ़र्म मैविनमैग्नेट का मिला-जुला ऑनलाइन सर्वे इसका सबूत है। इसके मुताबिक़ मोदी सरकार के प्रति दलितों में सकारात्मकता शून्य और नकारात्मकता आठ फ़ीसदी है।
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इस समय स्थिति यह है कि दिल्ली और बिहार के चुनाव में दलित मतदाताओं के बीच पिछड़ने के बाद भाजपा पंजाब और उत्तर प्रदेश में दलितों के गुस्से का निशाना बनने की तरफ़ बढ़ती नज़र आ रही है। पंजाब में 35 फ़ीसदी से ज़्यादा दलित आबादी है। वहाँ अकाली-भाजपा सरकार के ख़िलाफ़ ज़बरदस्त सत्ता विरोधी लहर चल रही है। उत्तर प्रदेश में दलितों के पास अपना स्थापित नेतृत्व है जो उन्हें सीधे-सीधे सत्ता दिलवा चुका है।

दरअसल, हुआ यह कि सरकार, पार्टी और संघ की योजना दलितों के बीच उभरी एक नई राजनीतिक प्रवृत्ति के कारण मार खा गई। पिछले दो-तीन साल या शायद उससे भी ज़्यादा समय से राजनीतिक रूप से सचेत दलित छात्रों और युवकों के बीच मार्क्सवाद और आम्बेडकरवाद को जोड़ कर आजमाने का रुझान विकसित हो रहा है। हो सकता है कि यह रुझान प्रचलित दलित राजनीति से नौजवानों की निराशा का नतीजा हो। बहरहाल, विश्वविद्यालयों में और राजनीतिक विमर्श के स्तर पर इस तरह के स्टडी सर्किल चलने लगे जो संघ परिवार को हज़म नहीं हो सकते थे। मद्रास आईआईटी, हैदराबाद विश्वविद्यालय और जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के भीतर दलित छात्रों और विद्यार्थी परिषद के बीच तनाव पहले से चल रहा था। परिषद ने अपना हिसाब साफ़ करने के लिए हर जगह अपने सरकारी संगठन होने का लाभ उठाया। इस चक्कर में वामपंथी और आम्बेडकरवादी दलित युवकों की टक्कर में सीधे-सीधे सरकार आ गई।

भाजपा दलितों को साथ लेकर हिंदू एकता का दायरा बड़ा करना चाहती है। इसलिए वह आंबेडकर का नाम तो लेना चाहती है पर उनके रेडिकल विचारों से दूर रह तक दलितों का हिंदुत्ववादीकरण करना चाहती है। आंबेडकर के विचारों की संगति भले ही कम्युनिस्ट पार्टियों की राजनीति से न बैठे, पर मार्क्सवादी विचारों के व्यापक दायरे में उन्हें जगह मिल रही है। नई राजनीतिक संरचनाएँ बन रही हैं जिनका प्रभाव राजनीतिक रूप से सचेत दलितों के ऊपर गहराई से पड़ रहा है। भाजपा के पास इसकी कोई काट नहीं है। अगर वह समझती है कि कुछ दलित उद्योगपतियों को आसान कर्ज़ देकर वह इस राजनीति को अपनी तरफ़ मोड़ सकती है, तो वह ग़लतफ़हमी में है। ऐसी योजनाओं का राजनीतिक प्रभाव पड़ते-पड़ते गंगा-जमुना में बहुत पानी बह जाएगा और उसी के साथ भाजपा का हिंदू एकता का ख़्वाब भी नष्ट हो जाएगा।
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(ये लेखक के निजी विचार हैं।)
(लेखक विकासशील समाज अध्ययन पीठ (सीएसडीएस) में भारतीय भाषा कार्यक्रम के निदेशक और एसोसिएट प्रोफेसर हैं।)
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