रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने नौसेना की तीन दिवसीय कमांडर कॉन्फ्रेंस का उद्घाटन किया। उन्होंने किसी भी चुनौती का जवाब देने के लिए नौसेना की क्षमता पर पूरा भरोसा जताया। रक्षा मंत्री ने कहा कि नौसेना ने प्रमुख और संवेदनशील स्थानों पर जहाजों और विमानों को तैनात करके समुद्री हितों की रक्षा के लिए मिशन आधारित तैनाती को प्रभावी ढंग से पूरा किया है। लेकिन सामरिक मामलों के जानकारों का कहना है कि समुद्री क्षेत्र की सुरक्षा से लेकर चीन से मिल रही चुनौतियों की दिशा में अभी कई मील के पत्थर तय करने हैं। नौसेना के सामने प्रशांत महासागर से लेकर हिंद महासागर क्षेत्र तक भारतीय हितों की रक्षा एक बड़ी चुनौती बनती जा रही है।
पाकिस्तान के ग्वादर बंदरगाह तक पहुंच चुके चीन की निगाह ईरान के चाबहार बंदरगाह के जरिए मलक्का जल डमरू क्षेत्र तक है। यह एक बड़ा अंतरराष्ट्रीय व्यापार मार्ग है और अमेरिका समेत कुछ देशों के साथ ट्रेड वार को देखते हुए चीन का इरादा बहुत नेक नहीं जान पड़ रहा है। चीन की दूसरी चुनौती हिंद महासागरीय क्षेत्र में भारत के चारों ओर उसकी दूरगामी रिंग ऑफ पर्ल योजना की भी है। वह सेतुवे, श्रीलंका के हंबनटोटा, बांग्लादेश के चट्गांव तक अपनी पहुंच बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ रहा है। समझा जा रहा है कि तीन दिवसीय नौसेना की कमांडर कॉन्फ्रेंस में इसके बाबत व्यापक चर्चा होगी।
एक पूर्व रियर एडमिरल के मुताबिक सैन्य बलों की चुनौतियां कभी घटने वाले नहीं हैं। फिलहाल अभी नौसेना को अपनी संचार प्रणाली को ठोस, हैकरों की पहुंच से दूर, गोपनीय और सुरक्षित बनाने की आवश्यकता है। संचार प्रणाली में इन्क्रिप्टेड टेक्नोलॉजी को तेजी से बढ़ाने की आवश्यकता है। ताकि हमारे टोही वाहन आदि आसानी से दुश्मन की नजरों में न आ सकें। वायुसेना से अवकाश प्राप्त वाइस एयर मार्शल एनबी सिंह ने भी कहा कि वायुसेना ने समय रहते इस क्षेत्र में विशेष ध्यान दिया था, लेकिन सेना और नौसेना को संचार प्रणाली को सुरक्षित बनाने में विशेष ध्यान देना चाहिए। बताते हैं संचार प्रणाली के सुरक्षित होने के बाद फायर पॉवर में गुणात्मक तब्दीली आती है।
जनरल बिपिन रावत ने इसी साल जनवरी में चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ का पदभार संभाला है। उनका कार्यकाल तीन साल का है और इसमें तीनों सेनाओं के बीच में संयुक्त सैन्य ऑपरेशन, लॉजिस्टिक, प्रशिक्षण की गुणवत्ता, सहायक सेवाओं, संचार, मरम्मत और रखरखाव में तालमेल को बढ़ाना है। एकल सेवा दृष्टिकोण को समाप्त करने, साझा तौर पर रक्षा-सामान खरीदने तथा तीनों सेनाओं में मौजूदा कमांड की पुर्नस्थापना जैसी चुनौतियां है। थिएटर और सक्रिय कमांड पर चर्चा, प्रारूप, जिम्मेदारी, इसका ढांचा और इसके घटक निर्धारित करने का लक्ष्य तय करना है। समझा जा रहा है कि नौसेना समेत अन्य सैन्य बलों की कमांडर कॉन्फ्रेंस और संयुक्त कमांडर कॉन्फ्रेंस में शीर्ष कमांडरों के साथ इसको केंद्र में रखकर चर्चा हो सकती है।
लेफ्टिनेंट जनरल (रिटा.) बलवीर सिंह संधू कहते हैं कि सैन्य चुनौती तो काफी बढ़ रही है। सैन्य चुनौतियों और भावी रणनीति पर चर्चा भी सैन्य कमांडर कॉन्फ्रेंस के दौरान ही होती हैं। निश्चित रूप से चाहे नौसेना हो या सेना, अहम विषयों पर चर्चा होगी। हालांकि संधू का मानना है कि पिछले कुछ महीने से कोविड-19 के संक्रमण और चीन द्वारा लद्दाख क्षेत्र में की गई घुसपैठ ने तमाम दूरगामी रणनीतियों की तरफ से ध्यान भटका दिया था। नौसेना से हाल में रिटायर हुए एक वरिष्ठ अधिकारी का भी कहना है कि पिछले कुछ समय से मुख्य ध्यान तात्कालिक मुद्दों पर केंद्रित रहा। हालांकि सैन्य अधिकारी का कहना है कि दूरगामी रणनीतियों पर लगातार काम चलता रहता है। इसका बहुत बड़ा असर नहीं पड़ता।