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अध्ययन: पर्यटन बना अंटार्कटिका के लिए संकट, एक पर्यटक से पिघल रही 100 टन बर्फ; इंसानी दखल से बढ़ा खतरा

Fri, 29 Aug 2025 06:39 AM IST
शुभम कुमार अमर उजाला नेटवर्क

सार

अंटार्कटिका में बढ़ती इंसानी दखलअंदाजी जैसे, पर्यटन और वैज्ञानिक अभियान तेजी से बर्फ पिघलने का कारण बन रही है। एक शोध में पता चला कि पिछले 40 वर्षों में भारी धातुओं की मात्रा 10 गुना बढ़ी है। जहाजों से निकले जहरीले तत्व बर्फ को नुकसान पहुंचा रहे हैं। एक पर्यटक से करीब 100 टन बर्फ पिघल सकती है।

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अंटार्कटिका (सांकेतिक तस्वीर) - फोटो : Adobe Stock
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विस्तार
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दुनिया का सबसे ठंडा और बर्फ से ढका महाद्वीप अंटार्कटिका अब इन्सानी  दखल के चलते तेजी से पिघल रहा है। पहले से ही जलवायु परिवर्तन का संकट झेल रहा यह क्षेत्र अब बढ़ते पर्यटन, वैज्ञानिक अभियानों और प्रदूषण से और ज्यादा असुरक्षित होता जा रहा है। इंटरनेशनल एसोसिएशन ऑफ अंटार्कटिका टूर ऑपरेटर्स (आईएएटीओ) के मुताबिक पिछले दो दशकों में यहां पर्यटकों की संख्या 20,000 से बढ़कर 1.2 लाख तक पहुंच गई है। विशेषज्ञों का कहना है कि इन पर्यटकों को लाने वाले जहाज मुख्य रूप से फॉसिल फ्यूल से चलते हैं, जिनसे जहरीले तत्व जैसे निकेल, कॉपर, जिंक और सीसा हवा में घुलते हैं और बर्फ को तेजी से पिघलाते हैं।

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नीदरलैंड्स की यूनिवर्सिटी ऑफ ग्रोनिंगन के वैज्ञानिक राउल कोर्डेरो और उनकी टीम ने हाल ही में एक व्यापक अध्ययन किया है। इसके लिए उन्होंने दक्षिण शेटलैंड द्वीप से एल्सवर्थ पर्वत तक फैले 2,000 किलोमीटर लंबे क्षेत्र से बर्फ के नमूने लिए। विश्लेषण से पता चला कि जिन जगहों पर इन्सानी गतिविधियां ज्यादा हुईं, वहां भारी धातुओं वाले सूक्ष्म कण पिछले चार दशकों में 10 गुना तक बढ़ गए। कोर्डेरो के मुताबिक एक अकेला पर्यटक भी करीब 100 टन बर्फ के पिघलने का कारण बन सकता है। वैज्ञानिक अभियानों का असर तो इससे 10 गुना ज्यादा होता है।

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माइक्रोप्लास्टिक का बढ़ता खतरा
अंटार्कटिका की बर्फ में पहले ही माइक्रोप्लास्टिक पाए जा चुके हैं। साइंस ऑफ द टोटल एनवायरनमेंट जर्नल में प्रकाशित एक अध्ययन में वैज्ञानिकों ने प्रति लीटर बर्फ में 73 से लेकर 3,099 तक माइक्रोप्लास्टिक कणों की मौजूदगी दर्ज की। इतनी अधिक मात्रा विशेषज्ञों के लिए भी चौंकाने वाली है।
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वैश्विक संकट का संकेत
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि अंटार्कटिका में तेजी से हो रहे बदलावों को नियंत्रित नहीं किया गया तो समुद्र का स्तर आने वाले दशकों में कई मीटर तक बढ़ सकता है। इसका सीधा असर तटीय शहरों, द्वीपीय देशों और वैश्विक पारिस्थितिकी पर पड़ेगा। पिछले 40 वर्षों में यहां हरियाली 10 गुना से ज्यादा बढ़ गई है जो जलवायु परिवर्तन का सीधा संकेत है। अंटार्कटिक क्षेत्र वैश्विक औसत से कहीं ज्यादा तेजी से गर्म हो रहा है और यहां असामान्य गर्मी की घटनाएं आम होती जा रही हैं। अगर समय रहते अंतरराष्ट्रीय समुदाय ने सख्त कदम नहीं उठाए तो इसका अस्तित्व भयानक खतरे में पड़ जाएगा।

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