केंद्र सरकार के तीन कृषि कानूनों को लेकर देश के टॉप अर्थशास्त्रियों ने गंभीर चिंता जताई है। कृषि मंत्री नरेंद्र तोमर को लिखे अपने पत्र में अर्थशास्त्रियों ने कहा है कि इन कानूनों से किसान का भला नहीं होगा। अगर केंद्र सरकार इनमें संशोधन का कोई रास्ता निकालती है तो वह कारगर साबित नहीं होगा।
हैदराबाद यूनिवर्सिटी के अर्थशास्त्र विभाग से रिटायर्ड प्रोफेसर डी नरसिम्हा रेड्डी और इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ पब्लिक एडमिनिस्ट्रेशन के प्रोफेसर रहे कमल नयन काबरा सहित दर्जनभर अर्थशास्त्रियों ने अपने पत्र में कहा, हम अपील करते हैं कि सरकार इन अधिनियमों को वापस ले। इसके बाद किसान संगठनों और अन्य हितधारकों के साथ व्यापक विचार-विमर्श कर ऐसा निर्णय ले जो वास्तव में किसानों और अर्थव्यवस्था के लिए समान एवं स्थायी लाभ वाला साबित हो। अगर सरकार यह कदम उठाती है तो ही उसे लोकतांत्रिक तरीका कहा जाएगा।
सेंटर फॉर डेवेलमेंट स्ट्डीज के प्रोफेसर केएन हरिलाल, एमडीयू रोहतक के पूर्व अर्थशास्त्री प्रोफेसर राजेंद्र चौधरी, सीआरआरआईडी चंडीगढ़ के सीनियर प्रोफेसर सुरेंद्र कुमार, इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंस नई दिल्ली के प्रोफेसर अरुण कुमार, सीआरआरआईडी चंडीगढ़ के प्रोफेसर रणजीत सिंह, नाबार्ड चेयर प्रोफेसर टाटा इंस्टीट्यूट फॉर सोशल साइंस मुंबई के प्रोफेसर आर रामा कुमार, प्रो. विकास रावल और जेएनयू के एसो. प्रोफेसर हिमांशु आदि ने कृषि मंत्री को पत्र लिखा है। ये सभी अर्थशास्त्री कृषि नीति के मुद्दों पर लंबे समय से काम करते रहे हैं।
इनका मानना है कि भारत सरकार को हाल के कृषि अधिनियमों को निरस्त कर देना चाहिए। ये देश के छोटे और सीमांत किसानों के हित में नहीं हैं। लाखों छोटे किसानों के लाभ के लिए कृषि विपणन प्रणाली में सुधार और परिवर्तन आवश्यक हैं, लेकिन इन अधिनियमों द्वारा लाए गए सुधार उस उद्देश्य की पूर्ति नहीं करते हैं। अर्थशास्त्रियों ने इसमें पांच अहम बातों का उल्लेख किया है...
- तीनों कानून, कृषि बाजारों को विनियमित करने में राज्य सरकार की भूमिका को सीमित कर देते हैं। इसके बाद कृषि क्षेत्र में राज्य का कोई ज्यादा हस्तक्षेप नहीं रह जाएगा। जुलाई 2019 में कृषि मंत्रालय के अनुसार, 20 से अधिक राज्यों ने अपने एपीएमसी अधिनियमों में संशोधन किया था ताकि राज्य के विनियमन के तहत कार्य करने वाली निजी मंडियों, ई-ट्रेडिंग, इलेक्ट्रॉनिक भुगतान, ई-एनएएम, आदि की अनुमति मिल सके। ऐसे तंत्र के सफल होने के लिए, किसानों, व्यापारियों व कमीशन एजेंटों आदि हितधारकों के बीच एक सामान्य माध्यम विकसित किया जाता है। इस प्रक्रिया को स्थानीय वास्तविकताओं के हिसाब से अधिक संवेदनशील व जवाबदेह बनाया जा सकता है। राज्य सरकार इस पर प्रभावी तरीके से नियंत्रण कर सकती है।
- तीनों कानूनों की एक बड़ी कमी ये है कि इनके जरिए व्यापार क्षेत्र में व्यावहारिक रूप से अनियमित बाजार का निर्माण किया जाएगा। मौजूदा विनियमित एपीएमसी प्रणाली में हेरफेर को रोकने के लिए तंत्र मौजूद है। वहीं नई प्रणाली को लेकर किसानों का डर सही है कि मूल्य और गैर-मूल्य कारकों पर निष्पक्षता सुनिश्चित नहीं की जा सकती है। इस प्रणाली में शोषण का सामना दूरदराज के क्षेत्रों के किसानों को बहुत अधिक स्तर पर करना पड़ सकता है। खासतौर पर आदिवासी क्षेत्र, जिनकी संरचित बाजारों तक पहुंच नहीं है।
- खंडित बाजार की समस्या बनी रहेगी। इन अधिनियमों के आने से पहले भी कृषि वस्तुओं की बिक्री का बड़ा प्रतिशत एपीएमसी विनियमित बाजार यार्डों के बाहर होता रहा है। हालांकि, एपीएमसी मार्केट यार्ड अभी भी दैनिक नीलामी के माध्यम से बेंचमार्क कीमतों का निर्धारण करते हैं। दूसरी तरफ तीनों कानूनों के तहत मूल्य संकेतों की कहीं जगह ही नहीं होगी। बाजार में बड़ी कंपनी का एकाधिकार हो जाएगा। साल 2006 में अपने एपीएमसी अधिनियम को हटाने के बाद बिहार का अनुभव बताता है कि किसानों के पास खरीदारों की तुलना में कम पसंद है। उनके पास सौदेबाजी की शक्ति भी कम है। नतीजा, अन्य राज्यों की तुलना में वहां काफी कम कीमतें रही हैं।
- कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग के अधिनियम में, दोनों पक्ष यानी छोटे किसानों और कंपनियों के बीच भारी विषमता रहेगी। यहां पर किसानों के हितों की पर्याप्त सुरक्षा करने के लिए कोई खास प्रावधान नहीं किया गया है। अब विभिन्न कंपनियां ऐसे किसी भी दायित्व से खुद को बचाने के लिए अधिकांश व्यवस्थाएं एग्रीगेटर या आयोजकों के माध्यम से करेंगी। तीनों कानूनों में इसे नियमित करने का प्रावधान ही नहीं है। किसानों को चिंता है कि उदारीकृत भूमि लीज व्यवस्था की दिशा में सरकार के कदमों के साथ कृषि सेवा समझौतों के प्रावधान बड़े पैमाने पर कॉर्पोरेट खेती का मार्ग प्रशस्त करेंगे।
- नई व्यवस्था में बड़े कृषि-व्यवसायी यानी कार्पोरेट सेक्टर का वर्चस्व होना तय है। इन तीन कानूनों की मदद से कोई भी कंपनी खुद को राज्य के कानूनों से अलग कर सकती है। तीन अधिनियम एक साथ राज्य स्तर के विनियमन, लाइसेंसिंग, कृषि, किसानों और व्यापारियों के बीच मौजूदा रिश्तों, स्टॉकिंग, प्रसंस्करण एवं विपणन आदि को किस तरह से कंपनियों के हवाले कर सकते हैं। ये सब बातें पहले भी किसानों के लिए असंतोष का कारण बनती रही हैं।
जब बाजार में चंद बड़े खिलाड़ी होंगे तो बाजार के समेकन और कृषि वस्तुओं में मूल्य श्रृंखलाओं के बारे में चिंता होना लाजमी है। संयुक्त राज्य अमेरिका और यूरोप जैसे अन्य देशों में भी ये हो चुका है। वहां "गेट-बिग-या-गेट-आउट" थ्योरी के कारण अनिवार्य रूप से छोटे किसानों, छोटे व्यापारियों और स्थानीय कृषि-व्यवसायों को पीछे की ओर धकेल दिया गया।
दूसरी ओर भारतीय किसानों को एक ऐसी प्रणाली की आवश्यकता है जो किसानों को मजबूत बना दे। इसमें एफपीओ के हाथों में भंडारण, प्रसंस्करण और विपणन बुनियादी ढांचे के माध्यम से मूल्य श्रृंखला में बेहतर सौदेबाजी की शक्ति और उनकी विस्तारित भागीदारी को सक्षम बनाती है। यह किसान की आय बढ़ाने के लिए एक प्रभावी रास्ता होगा। सरकार ने पहले इस नीति पर चलते हुए कुछ पहल की हैं। इसे और ज्यादा बेहतर बनाया जा सकता है।