मेडिकल दाखिले के लिए नेशनल एंट्रेंस एलिजिबिलिटी टेस्ट (नीट) को लेकर राज्य सरकारों की आपत्तियों के बाद केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय इस पूरे मामले पर अटॉर्नी जनरल से कानूनी सलाह लेगी। जरूरत पड़ने पर इस मुद्दे को केंद्रीय कैबिनेट में भी ले जाया सकता है। वहीं, दिल्ली के स्वास्थ्य मंत्री ने आशंका जताई है कि नीट पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले के खिलाफ केंद्र सरकार अध्यादेश भी ला सकती है।
नीट पर राज्यों की राय जानने के लिए केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री जेपी नड्डा की ओर से बैठक बुलाई गई थी। बैठक में तमिलनाडु, महाराष्ट्र और गुजरात को छोड़ कर ज्यादातर राज्यों ने सैद्धांतिक तौर पर नीट से सहमति जताई। हालांकि, इस साल नीट के तहत परीक्षा कराने के लिए ज्यादातर राज्य तैयार नहीं हैं।
राज्यों की राय जानने के बाद अब इस मुद्दे पर मंत्रालय में बैठक होगी। इसके बाद निर्णय लिया जाएगा। बैठक के बाद केंद्रीय स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्री जेपी नड्डा ने कहा कि राज्यों की राय ले ली गई है। कुछ राज्यों की भाषा और सिलेबस को लेकर आपत्ति है। लिहाजा इस मसले पर अदालत से और समय मांगा जाएगा।
सालाना 20 हजार करोड़ का व्यवसाय
सरकार सभी राज्यों से कर रही है बात
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दिल्ली के स्वास्थ्य मंत्री सत्येंद्र जैन ने नीट का समर्थन करते हुए कहा कि सभी राज्य सुप्रीम कोर्ट के फैसले का स्वागत कर रहे हैं, लेकिन इसे लागू नहीं करना चाहते। देश में मेडिकल शिक्षा का बाजार करीब 20 हजार करोड़ का है। मेडिकल कॉलेज में भ्रष्टाचार की वजह से मेधावी छात्र दाखिला नहीं ले पाते। कई कॉलेजों में राजनीतिकों की हिस्सेदारी है। इसलिए नीट लागू न करने का दवाब बनाया जा रहा है।
केंद्रीय मंत्री जेपी नड्डा ने सोमवार को कहा कि नीट पर सरकार राज्य सरकारों से और बातचीत करेगी। उन्होंने सोमवार को एम्स में राज्यों के स्वास्थ्य मंत्रियों के साथ उनकी दिक्कतों पर बातचीत की। नड्डा ने बताया कि हमने भाषा, सिलेबस और राज्य सरकारों की अन्य दिक्कतों पर बातचीत की। हम आगे नीट को लागू करने से पहले राज्यों के साथ और बातचीत करेंगे।
वहीं वित्त मंत्री अरुण जेटली ने कहा कि सरकार कोर्ट के फैसले पर सभी राज्यों से बातचीत कर रही है। सभी राज्यों के स्वास्थ्य मंत्री केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री से मिल रहे हैं। राजनीतिक पार्टियां भी इस पर चर्चा के लिए मिल रही हैं। जेटली के मुताबिक राज्यों की भाषाएं अलग अलग हैं इसलिए उनके बोर्ड असमान हैं। इस मसले पर उच्चतम न्यायालय ने फैसला सुना दिया है। अब गेंद कार्यपालिका के पाले में है। सरकार को इस मामले में देखना पड़ेगा।