लोक परीक्षा विधेयक: गड़बड़ करने वालों को 10 साल तक जेल और एक करोड़ जुर्माने का प्रावधान; जानें बिल के बारे में
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
Published by: शिवेंद्र तिवारी
Updated Tue, 06 Feb 2024 10:06 PM IST
सार
The Public Examinations ( Prevention of Unfair Means) Bill 2024: लोक परीक्षा (अनुचित साधनों का निवारण) विधेयक 2024 लोकसभा में पारित हो गया। विधेयक में संगठित अपराध, माफिया और साठगांठ में शामिल लोगों के खिलाफ कार्रवाई का प्रावधान है।
लोक परीक्षा विधेयक
- फोटो : Amar Ujala
मंगलवार को लोकसभा में लोक परीक्षा (अनुचित साधनों का निवारण) विधेयक-2024 पारित हो गया। यह विधेयक परीक्षाओं में गड़बड़ी करने वालों पर नकेल कसने के लिए लाया गया है। एक बार कानून बन जाने के बाद दोषियों को 10 साल तक की जेल हो सकती है।
आइये जानते हैं लोक परीक्षा (अनुचित साधनों का निवारण) विधेयक क्या है? इसके उद्देश्य क्या हैं? कानून बनने से क्या बदलेगा?
लोक परीक्षा विधेयक
- फोटो : Amar Ujala
मंगलवार को लोकसभा में लोक परीक्षा (अनुचित साधनों का निवारण) विधेयक-2024 पारित हो गया। यह विधेयक परीक्षाओं में गड़बड़ी करने वालों पर नकेल कसने के लिए लाया गया है। एक बार कानून बन जाने के बाद दोषियों को 10 साल तक की जेल हो सकती है।
आइये जानते हैं लोक परीक्षा (अनुचित साधनों का निवारण) विधेयक क्या है? इसके उद्देश्य क्या हैं? कानून बनने से क्या बदलेगा?
लोकसभा
- फोटो : संसद टीवी
लोक परीक्षा (अनुचित साधनों का निवारण) विधेयक क्या है?
इस विधेयक को 5 फरवरी को लोकसभा में पेश किया गया। केंद्रीय कार्मिक राज्य मंत्री जितेंद्र सिंह ने सदन में लोक परीक्षा (अनुचित साधनों का निवारण) पेश किया। 6 फरवरी को विधेयक लोकसभा से पारित हो गया। अब इसे राज्यसभा में पेश किया जाएगा। केंद्रीय मंत्रिमंडल ने हाल में इस विधेयक को मंजूरी दी थी।
विधेयक में परीक्षाओं में गड़बड़ी करने पर अधिकतम 10 साल की जेल और एक करोड़ रुपये तक के जुर्माने का प्रावधान किया गया है।
इसके उद्देश्य क्या हैं?
केंद्रीय कार्मिक राज्य मंत्री जितेंद्र सिंह ने सदन में कहा कि पिछले कुछ वर्षों में प्रश्नपत्र लीक होने के मामलों ने लाखों छात्रों और अभ्यर्थियों के हितों को प्रभावित किया है। इसे रोकना जरूरी है। ऐसा नहीं करना लाखों युवाओं के भविष्य के साथ खिलवाड़ होगा। बजट सत्र की शुरुआत पर दोनों सदनों की संयुक्त बैठक को संबोधित करते हुए राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने कहा था कि सरकार परीक्षाओं में होने वाली गड़बड़ी को लेकर युवाओं की चिंताओं से अवगत है। इस दिशा में सख्ती लाने के लिए नया कानून बनाने का निर्णय लिया गया है।
विधेयक का मकसद परीक्षाओं में अनुचित साधनों के उपयोग को रोकना है। संघ लोक सेवा आयोग, कर्मचारी चयन आयोग, रेलवे भर्ती बोर्ड, राष्ट्रीय परीक्षण एजेंसी, बैंकिंग कार्मिक चयन संस्थान और केंद्र सरकार के विभाग और भर्ती के लिए उनके जुड़े कार्यालय द्वारा कराई जाने वाली परीक्षाएं इस विधयेक के दायरे में आएंगी।
कानून बनने से क्या बदलेगा?
प्रस्तावित कानून का मकसद व्यक्तियों, संगठित माफिया और पेपर लीक, पेपर हल करने, नकल करने, कंप्यूटर संसाधनों के हैकिंग में लगे संस्थानों पर नकेल कसना है।
लोक परीक्षाओं के संबंध में अपराध: विधेयक में कहा गया है कि यह परीक्षा में होने वाली किसी भी अनुचित लिप्तता या मिलीभगत या साजिश पर रोक लगाता है। इन अपराधों को कारित करने पर तीन से पांच साल तक की कैद और 10 लाख रुपये तक का जुर्माना होगा।
जिम्मेदारियां तय: विधेयक के प्रावधानों के उल्लंघन की स्थिति में सेवा प्रदाताओं को पुलिस और संबंधित परीक्षा प्राधिकरण को रिपोर्ट करना होगा। सेवा प्रदाता द्वारा किए गए अपराध पर एक करोड़ रुपये तक का जुर्माना लगाया जाएगा। ऐसे सेवा प्रदाता से जांच की वसूल भी की जाएगी। इसके अलावा, उन्हें चार साल तक लोक परीक्षा आयोजित करने से भी रोक दिया जाएगा। यदि यह स्थापित हो जाता है कि सेवा प्रदाताओं से जुड़े अपराध किसी व्यक्ति की सहमति या मिलीभगत से गड़बड़ी की गई थी, तो ऐसे व्यक्तियों को जवाबदेह ठहराया जाएगा। इन्हें तीन साल से लेकर 10 साल तक की कैद और एक करोड़ रुपये जुर्माने की सजा होगी।
संगठित अपराध: प्रस्तावित कानून संगठित अपराधों के लिए कड़ी सजा का उल्लेख करता है। एक संगठित अपराध उसे माना जाएगा जब लोक परीक्षाओं में कोई व्यक्ति या व्यक्तियों का समूह गैरकानूनी कृत्य में शामिल हो। संगठित अपराध करने वाले व्यक्तियों को पांच साल से 10 साल तक की सजा और कम से कम एक करोड़ रुपये का जुर्माना लगाया जाएगा। यदि किसी संस्था को संगठित अपराध करने का दोषी ठहराया जाता है, तो उसकी संपत्ति कुर्क और जब्त कर ली जाएगी और परीक्षा की लागत भी उससे वसूल की जाएगी।
पूछताछ और जांच: विधेयक के तहत सभी अपराध संज्ञेय और गैर-जमानती होंगे। उपाधीक्षक या सहायक पुलिस आयुक्त रैंक से नीचे का अधिकारी अधिनियम के तहत अपराधों की जांच नहीं करेगा। केंद्र सरकार जांच को किसी भी केंद्रीय जांच एजेंसी को स्थानांतरित कर सकती है।