केंद्रीय जांच एजेंसी 'सीबीआई' की वैधता सवालों के घेरे में है। सुप्रीम कोर्ट में सीबीआई निदेशक कहते हैं, पश्चिम बंगाल, राजस्थान, झारखंड, महाराष्ट्र, केरल, पंजाब, छत्तीसगढ़ और मिजोरम द्वारा सामान्य सहमति वापस लेने का मतलब जांच एजेंसी के कामकाज में बाधा डालना है। देश की अर्थव्यवस्था को प्रभावित करने वाले बैंक धोखाधड़ी से संबंधित लगभग 78 फीसदी मामलों की जांच, विभिन्न राज्यों द्वारा सहमति न देने की वजह से शुरू नहीं हो पा रही है। अनुरोध पत्र, राज्यों के पास लंबित पड़े हैं। सीबीआई जांच के मामले में राज्यों द्वारा आम सहमति वापस लेने के मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट ने चिंता जताई है। साल 2013 में गुवाहाटी हाईकोर्ट अपने एक फैसले में 'सीबीआई' को असंवैधानिक करार दे चुका है। केंद्र ने उस फैसले पर स्टे ले लिया।
वरिष्ठ अधिवक्ता डॉ. एलएस चौधरी बताते हैं दिल्ली स्पेशल पुलिस एस्टेब्लिशमेंट एक्ट-1946 के सेक्शन पांच और छह को देखें तो मालूम होता है कि सीबीआई, अपनी मर्जी से राज्यों में नहीं जा सकती। केस टू केस जांच होनी चाहिए। वजह, सीबीआई एक नियमित जांच एजेंसी नहीं है। राज्यों में सीबीआई को सामान्य सहमति लेनी पड़ती है, मगर केंद्रशासित प्रदेशों में ऐसा कोई प्रावधान नहीं है। अगर राज्य ने किसी केस में एक बार सहमति प्रदान कर दी है, तो जांच पूरी होने से पहले वह उसे वापस नहीं ले सकता। हालांकि राज्यों को पूर्णतया 'सामान्य सहमति' वापस लेने का अधिकार है। राज्यों का आरोप यह रहता है कि केंद्र, सीबीआई की आड़ लेकर उनके कार्य में हस्तक्षेप करता है। केंद्र द्वारा जांच एजेंसी का दुरुपयोग करने की बात कही जाती है। केंद्र एवं राज्यों के बीच ऐसे विवाद थम सकते हैं, बशर्ते इसके लिए संविधान में संशोधन कर दिया जाए। यह प्रक्रिया उतनी आसान भी नहीं है। केंद्र, राज्य और कानून के जानकारों को इस बाबत काम करना होगा। उसमें यह ध्यान देना होगा कि संशोधन प्रक्रिया में कहीं संविधान के मूल ढांचे के साथ कोई छेड़छाड़ न हो जाए। पुलिस, जब राज्य सूची के विषयों में शामिल होगी तो केंद्रीय जांच ब्यूरो को राज्यों की सहमति लेने के लिए अनुरोध पत्र नहीं देने पड़ेंगे।
केंद्र एवं राज्यों के बीच सीबीआई को लेकर विवाद होता रहता है। राज्यों का आरोप यह रहता है कि केंद्र सरकार, जांच एजेंसी के माध्यम से अपनी मनमानी करती है। बतौर डॉ. एलएस चौधरी, सबसे पहले यह देखना चाहिए कि दिल्ली स्पेशल पुलिस एस्टेब्लिशमेंट एक्ट-1946, जिसके तहत सीबीआई को पावर मिलती है, वहां 'सीबीआई' शब्द कहीं लिखा ही नहीं है। सीबीआई के गठन या उसके अधिकार क्षेत्र की बात भी नहीं लिखी है। डीएसपीई एक्ट में संशोधन हुए, मगर 'सीबीआई' का नाम उसमें शामिल नहीं हो सका। सुप्रीम कोर्ट ने सीबीआई को 'तोता' बताया तो विपक्षी दल इसे सरकार की कठपुतली कहते हैं। सीबीआई का अपना कोई एक्ट ही नहीं है, तो केंद्र व राज्यों के बीच विवाद चलता रहेगा। सीधा सा मतलब है कि सीबीआई, दिल्ली स्पेशल पुलिस एस्टेब्लिशमेंट एक्ट-1946 के तहत काम करती है। ऐसे में यह पुलिस की एक शाखा है। अब पुलिस तो राज्य सूची का विषय है। इसका अर्थ यह हुआ कि केंद्र उसमें हस्तक्षेप नहीं कर सकता। सुप्रीम कोर्ट ने सीबीआई जांच के लिए राज्यों द्वारा आम सहमति नहीं देना, इस मुद्दे पर चिंता जताई है। सुप्रीम कोर्ट इस मुद्दे का परीक्षण करने के लिए तैयार है। सर्वोच्च अदालत ने कहा, ये वांछनीय हालात नहीं हैं। जस्टिस एसके कौल और जस्टिस एमएम सुंदरेश, इन दो जजों की बेंच ने इस मामले को मुख्य न्यायाधीश एनवी रमना के पास भेज दिया है।
अधिवक्ता डॉ. एलएस चौधरी ने सीबीआई की संवैधानिक वैधता को चुनौती दी थी। गोवाहाटी हाईकोर्ट ने छह नवंबर 2013 को नरेंद्र कुमार बनाम भारत सरकार केस में फैसला सुनाया था कि सीबीआई संवैधानिक संस्था नहीं है। इसके पास किसी व्यक्ति को हिरासत में लेने का अधिकार नहीं है। हाईकोर्ट ने कहा, संविधान के अनुसार केंद्र सरकार ऐसी एजेंसी या फोर्स नहीं रख सकती। अदालत ने सीबीआई को पूरी तरह असंवैधानिक घोषित कर दिया था। अगर सीबीआई को पुलिस की तरह अधिकार देने हैं, तो उसे संविधान की 'समवर्ती सूची' में शामिल करना होगा। केंद्र सरकार ने इस फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में नौ नवंबर 2013 को दूसरे शनिवार की छुट्टी के दिन स्टे ले लिया। तब से लेकर आज तक सुप्रीम कोर्ट में वह अपील पेंडिंग है। डॉ. चौधरी बताते हैं, सरकार हर बार नई तारीख ले लेती है। अभी डेढ़ साल से कोरोना संक्रमण की वजह से अपील मंजूर नहीं हो सकी। इस मामले की सुनवाई कम से कम पांच जजों की बेंच के समक्ष होगी।
संविधान के किसी भी अध्याय में सीबीआई के गठन का कहीं कोई प्रावधान ही नहीं है। इसके चलते 'केंद्रीय जांच एजेंसी' सीबीआई को आज भी संवैधानिक दर्जा हासिल नहीं है। सीबीआई को पहली अप्रैल 1963 को एक एग्जीक्यूटिव ऑर्डर के तहत बनाया गया था। संविधान सभा के सदस्य डॉ बीआर अंबेडकर और नजीरुद्दीन अहमद ने सीबीआई जैसी संस्था बनाने के लिए कहा था। उनका कहना था कि एक ऐसी एजेंसी केंद्र सरकार की 'संघ सूची' में शामिल रहेगी। उस एजेंसी के कामकाज को लेकर उन्होंने कहा, इसका कार्य आपराधिक केस दर्ज करना या अपराधी को गिरफ़्तार करना नहीं होगा। यह एजेंसी केंद्र सरकार के पास विभिन्न अपराधों की जो सूचनाएं आती हैं, उन्हें क्रॉस चेक कर सकती है। एजेंसी को अंतरराज्यीय अपराधों की तुलना कर उसकी रिपोर्ट केंद्र सरकार को भेजने का अधिकार था। पुलिस, जो कि 'राज्य सूची' का विषय है, उसकी तर्ज पर यह जांच एजेंसी न तो किसी को गिरफ्तार कर सकती है और न ही किसी से पूछताछ। आज सीबीआई द्वारा किसी को गिरफ़्तार करने, जांच करने या पूछताछ का जो भी अधिकार मिला है, वह डीएसपीई एक्ट के तहत संभव हो सका है।