किसानों को दिल्ली की तरफ आगे बढ़ने से रोकने के लिए सड़कों पर कीलें ठोंक दी गई हैं। कंटीले तारों की कई स्तर की बाड़ लगा दी गई है। लेकिन भाजपा के साथ-साथ एनडीए के सहयोगी दलों के कई नेता भी मानते हैं कि इन कीलों को ठोंकने से एनडीए सरकार की साख प्रभावित हो रही है। इससे देश-विदेश में एक नकारात्मक संदेश जा रहा है जो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की उस लोकप्रियता को प्रभावित कर सकता है, जो उन्होंने दुनिया भर के शीर्ष नेताओं से बात-मुलाकात करके बनाई है। इन नेताओं का मानना है कि अब स्वयं प्रधानमंत्री को किसानों से बातचीत कर इस मामले का तुरंत कोई हल निकालना चाहिए। बातचीत शुरू करने को लेकर कोई हठधर्मिता नहीं दिखाई जानी चाहिए।
किसान नेता अविक साहा ने अमर उजाला से कहा कि वे स्वयं भी यह नहीं मानते कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के कहने पर या उनकी जानकारी में देकर इस तरह का कदम उठाया गया होगा। लेकिन किसानों के रास्ते में कीलें ठोंकने से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की वह साख अवश्य प्रभावित हो रही है, जो उन्होंने अपनी मेहनत से देश-विदेश में यात्रा करके और विश्व के शीर्ष नेताओं से मुलाकात करके बनाई है। प्रधानमंत्री को चाहिए कि वे पहल कर इस गतिरोध को दूर करें क्योंकि अब बात केवल एक मुद्दे पर प्रदर्शन का नहीं रह गया है। इससे अब देश की साख प्रभावित होने लगी है और प्रधानमंत्री यह कभी नहीं चाहेंगे कि देश की छवि पर कोई असर पड़े।
जनता दल यूनाइटेड के नेता केसी त्यागी ने अमर उजाला से कहा कि यह कटु सच्चाई है कि आजादी के पूर्व से लेकर आज तक किसानों को कभी उनकी उपज का सही मूल्य नहीं मिला। इसलिए एमएसपी या मंडियों के लिए किसानों की नाराजगी को बेवजह नहीं कहा जा सकता। सरकार को किसानों की बातों को ध्यान से सुनना चाहिए।
उन्होंने कहा कि सरकार कृषि कानूनों को डेढ़ साल तक निलंबित रखने पर सहमत हो गई है। अब सरकार को आगे बढ़कर इन कानूनों को तब तक निलंबित रखने का प्रस्ताव कर देना चाहिए जब तक कि इसका किसानों और विशेषज्ञों की बनी कमेटी से कोई सर्वमान्य हल नहीं निकल जाता। उन्होंने कहा कि अगर सरकार यह प्रस्ताव कर देती है तो किसानों को भी इसे तुरंत खारिज करने पर नहीं अड़ना चाहिए।
केसी त्यागी ने कहा कि किसानों ओर सरकार दोनों को यह बात ध्यान में रखनी चाहिए कि कुछ लोग ऐसे हैं जो किसी भी कीमत पर समस्या का समाधान नहीं होने देना चाहते। किसानों की समस्याओं का सही हल खोजने के इच्छुक सही किसान नेताओं की इस सोच को सफल नहीं होने देना चाहिए।