फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

चीनी घुसपैठ: सेना के सामने खड़ी हो गई बड़ी चुनौती, जाड़ों में कैसे होगी बॉर्डर पर सैनिकों को रसद की आपूर्ति!

Fri, 24 Jul 2020 02:17 PM IST
Harendra Chaudhary शशिधर पाठक, अमर उजाला, नई दिल्ली

सार

  • कई मोर्चों पर लड़ रही है भारतीय सेना
  • 30 से 40 हजार सैनिकों की रसद का इंतजाम कोई बच्चों का खेल नहीं
  • सैन्य तैनाती के साथ लॉजिस्टिक सपोर्ट भी बड़ी चुनौती
  • समस्या के समाधान में जुटे सैन्य अफसर
विज्ञापन
लद्दाख क्षेत्र - फोटो : पीटीआई (फाइल)
विज्ञापन

विस्तार
वॉट्सऐप चैनल फॉलो करें

पूर्वी लद्दाख में चीन की जनमुक्ति सेना (पीएलए) ने गलवां घाटी, हॉट स्प्रिंग, गोगरा पोस्ट, डेपसांग और पैंगोंग त्सो में घुसपैठ करके सैन्य बलों की चिंता बढ़ा दी है। भारतीय सेना चीन की हरकतों से सबक लेते हुए फ्रंट लाइन पर तैनाती बढ़ा रही है। तीन अतिरिक्त डिवीजन की तैनाती का निर्णय लेने के साथ कई मोर्चे पर तमाम चुनौतियों से जूझना पड़ रहा है।

विज्ञापन

सेना मुख्यालय के सूत्रों की मानें तो सेना ने इन चुनौतियों से जूझने की तैयारी को युद्धस्तर पर आरंभ कर दिया है। हालांकि लेफ्टिनेंट जनरल (पूर्व, आर्मी सप्लाई कोर) बलबीर सिंह संधू का कहना है कि समय कम है, चुनौती बड़ी है। इसलिए सब कुछ आसान नहीं है।

संधू कहते हैं कि हमें यह नहीं पता कि इतनी बड़ी तादाद (30 हजार से अधिक) में हमारे सैनिक वहां कब तक और कितने दिन तैनात रहेंगे। दूसरे चाहे गलवां घाटी हो या हॉट स्प्रिंग, गोगरा पोस्ट, डेपसांग, पैंगोंग के पास का क्षेत्र यहां सीधे नहीं पहुंचा जा सकता। सर्दियां आते ही इस क्षेत्र का तापमान शून्य से 25-30 डिग्री नीचे तक चला जाता है।
विज्ञापन


इस समय भी तापमान कोई माइनस 18-20 डिग्री सेल्सियस रहता है। 14000 फीट से लेकर 17000 फीट की ऊंचाई वाले इस क्षेत्र की हवा में ऑक्सीजन की मात्रा भी कम होती है। इसलिए मैदानी इलाके से जाने वाले सैन्य बलों को वहां के वातावरण में ढलने में एक सप्ताह से अधिक का समय लग जाता है।

पता नहीं कब तक तैनात रहेंगे सैनिक?

सेना मुख्यालय से लेकर विदेश मंत्रालय तक को इसका अंदाजा नहीं है कि पूर्वी लद्दाख में कब तक भारतीय सैनिकों की इतनी बड़ी संख्या में तैनात रहेगी। सेना मुख्यालय के सूत्र का कहना है कि जब तक चीन के सैनिक एलएसी पर और अपने क्षेत्र में नहीं चले जाते, तब तक कोई खतरा मोल नहीं लिया जा सकता।

फिलहाल सेना, आईटीबीपी दोनों की साझा तैयारी यही है कि चीन की सेना के सामानांतर सैन्य तैनाती बनाकर रखी जाए। सैन्य बलों का कहना है कि चीनी सैनिकों ने मई 2020 से जिस तरह की आक्रामकता और व्यवहार (हिंसक झड़प, सहमति को न मानना) दिखाया है, उसको देखते हुए किसी तरह की ढिलाई समस्या को बढ़ा सकती है।

सब नए सिरे से तैयारी की जरूरत

पूर्व लेफ्टिनेंट जनरल बलबीर सिंह संधू का कहना है कि लद्दाख तक रसद सामग्री, हथियार उपकरण, चिकित्सा के साधन, इंजीनियरिंग (सड़क, पुल, बिजली, पानी की आपूर्ति समेत), शेल्टर (युद्धक सामान, चिकित्सा, इंजीनियरिंग, रसद के भंडारण, सैनिकों के रहने), ईधन, तेल (गाडियों के आदि के साथ-साथ सैनिकों को गर्म रखने तथा युद्ध में लड़ने के लिए हमेशा फिट रखने) की आपूर्ति बड़ी चुनौती है।

यह तैयारी काफी पहले से करनी पड़ती है और इसकी सप्लाई चेन बनानी पड़ती है। बताते हैं श्रीनगर से लेह तीन दिन में ट्रक से करीब 8-10 टन माल ढोया जा सकता है, लेकिन यहां से चीन घुसपैठ वाले क्षेत्र तक इसे पहुंचाने में 13-15 दिन तक लग सकते हैं। ऐसे में आर्मी सप्लाई कोर की चुनौती काफी बड़ी हो जाती है।

कैसे ले जाएंगे सामान?

पुूर्व लेफ्टिनेंट जनरल का कहना है कि सेना सड़क, ट्रेन और हवाई-मार्ग के जरिए रसद आपूर्ति समेत अन्य सामानों को अग्रिम चौकी तक पहुंचाती है। इसमें सबसे बड़ी समस्या मौसम खड़ी करता है। लेह-लद्दाख में सुबह-सवेरे ही हेली से सामग्री पहुंचा दी जाती है, क्योंकि धूप निकलने के बाद हवा हल्की हो जाती है और हेलीकाप्टर की सर्विस मुश्किल हो जाती है।

इसके अलावा सर्दी के मौसम में जोजीला पास का रूट बंद हो जाता है। ऐसे में सड़क के रास्ते से आपूर्ति अवरुद्ध जाती है। हालांकि इस साल के अंत तक रोहतांग सुरंग के चालू हो जाने की संभावना है, लेकिन इसके बावजूद लेह-लद्दाख का आपरेशन बहुत आसान नहीं है। बताते हैं सर्दी के मौसम में भारतीय सेना आईएल-76, सी-17 ग्लोब मास्टर पर ही ज्यादा निभर करती है।

क्योंकि श्रीनगर लेह राजमार्ग बर्फ से ढक जाता है। बारालचा ला, तांगलांग ला रास्ता अधिक ऊंचाईयों वाला है। यह भी बर्फ से ढक जाता है। वैसे भी चुनौती भरे समय में सेना के हथियार, साजो-सामान भी पहुंचाने होते हैं।

भारी सामानों की आपूर्ति सड़क रास्ते से ही ठीक रहती है। दूसरे भूस्खलन का खतरा भी हमेशा बना रहता है। इसलिए आपरेशनल दबाव काफी बढ़ जाता है।

सामान्य दिनों की बात छोड़ दीजिए

पूर्व लेफ्टिनेंट जनरल संधू के मुताबिक जिस तरह से तनाव की स्थिति बनी है, इसकी तुलना सामान्य दिनों से मत कीजिए। इस समय जरूरतें अचानक काफी बढ़ जाती है। सप्लाई चेन को बनाए रखने में रणनीतिक तैयारी और समय की भूमिका काफी बढ़ जाती है। ऊंचाई वाले क्षेत्रों में हर 500 या 1000 फीट की ऊंचाई के लिए सामान की गुणवत्ता, जरूरत सभी में बदलाव आता जाता है।

कपड़े आदि की गुणवत्ता बदलने लगती है और इसमें एक-एक लेयर जुड़ती चली जाती है। विशेष कपड़े, विशेष स्नो बूट, विशेष हेलमेट, स्टिक, रोप, मेडिकल किट, सपोर्ट, स्पेशल फूड पैकेट, अन्य लॉजिस्टिक सपोर्ट की जरूरत पड़ती जाती है।

एक अनुमान के अनुसार मई 2020 से पहले तक लेह-लद्दाख क्षेत्र में छह महीने के लिए कोई दो से ढाई लाख टन खाद्य और अन्य सामग्री की आपूर्ति का दबाव रहा होगा। इसका 70 फीसदी हिस्सा तो सियाचिन और कारगिल क्षेत्र में चला जाता होगा, लेकिन मौजूदा परिस्थिति में यह कई गुना बढ़ गया है।

सैन्य तैनाती की कीमत, रिस्क सब काफी बढ़ जाता है

संधू के अनुसार सैनिक को शून्य से नीचे तापमान में रख कर लड़ने के काबिल बनाए रखना कोई काम आसान नहीं है। ऐसे समय में केरोसिन तेल के सहारे उन्हें गर्म वातावरण दिया जाता है। सब कुछ बहुत आसान नहीं होता। रहने, निगरानी करने की सुविधा, रिजर्व में बैठी फोर्स को फिट रखना सब जरूरी होता है।

लद्दाख के अग्रिम इलाकों में टेंट आदि भी विशेष किस्म के होते हैं। कई क्षेत्र ऐसे हैं जहां ठंड बढ़ते ही नलों में बर्फ जम जाती है। तापमान के शून्य से नीचे 20-30 डिग्री की तरफ बढ़ते ही पूरी लाइफ स्टाइल चेंज हो जाती है।

इसलिए मैदानी इलाके से इन क्षेत्रों में सैन्य बलों की तैनाती कई गुना मंहगी हो जाती है। बताते हैं एक सैनिक के लिए 2.5 किग्रा का राशन, दो जोड़ी माउंटेन इक्विपमेंट समेत अन्य साजो-सामान आवश्यक हो जाते हैं। बताते हैं सियाचिन में तैनात सैनिकों के लिए हम इन्ही मानदंडों को अपनाते हैं।

विज्ञापन




 

और पढ़ें...
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें