गरीबी–पलायन बढ़ेगा
पर्यावरण विशेषज्ञ हिमानी उपाध्याय (फेलो, PIK) ने बताया कि उत्तराखंड राज्य की 70 फीसदी कृषि सीधे तौर पर वर्षा जल पर आधारित है। अगर कृषि के अनुकूल वांछित मौसम में वर्षा नहीं होगी, तो इससे कुल कृषि उत्पादन में कमी आ जाएगी। इससे ग्रामीण इलाकों में लोगों में गरीबी की समस्या बढ़ेगी। इससे लोग मजबूरन राज्य से पलायन को मजबूर होंगे जो राज्य में पहले ही एक गंभीर मुद्दा है।
अनुमान है कि यहां लोगों को उचित मात्रा में रोजगार की संभावना न बन पाना पलायन के पीछे सबसे गंभीर मुद्दा है। अनुमान है कि राज्य का 50 फीसदी पलायन इसी कारण से होता है। इसके अलावा शिक्षा कारणों से 15 फीसदी, स्वास्थ्य सुविधाओं में कमी के कारण 9 फीसदी पलायन होता है। अनुमान है कि 2011 से राज्य के 734 पहाड़ी गांवों में इक्का-दुक्का घरों में ही लोग रह गये हैं। बाकी के लोगों ने अपनी सुविधानुसार अन्य जगहों पर पलायन कर लिया है।
रिपोर्ट में यह भी अनुमान लगाया गया है कि भारी आबादी की जरूरतों के कारण ऊर्जा संसाधनों का उपयोग बढ़ने से तापमान की बढ़ोतरी निश्चित है। पर्यावरण संतुलन साधने के तमाम प्रयास किये जाने के बाद भी तापमान बढ़ोतरी को 1.5 फीसदी से कम पर रोकना संभव नहीं होगा। लेकिन अगर इसे दो फीसदी से कम पर रोका जा सके, पर्यावरण संतुलन साधने के व्यापक प्रयास किये जाएं और केंद्र-राज्य और जनसहभागिता के स्तर पर पूरा सहयोग किया जाए, तो तापमान वृद्धि के नकारात्मक परिणामों को काफी हद तक रोका जा सकता है।
रिपोर्ट में राज्य सरकार को जिलेवार ज्यादा मानवीय प्रेक्षण करने, मौसम की खराबी से लोगों को बचाने और कृषि पर संकट की स्थिति में लोगों को भोजन और रोजगार उपलब्ध कराने के व्यापक सुझाव भी दिए गये हैं।