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Telangana Election: बीआरएस-कांग्रेस की जंग में भाजपा को मौन लाभार्थियों से उम्मीद, जानें चुनावी रणनीति

Sun, 12 Nov 2023 05:30 AM IST
गुलाम अहमद न्यूज डेस्क, अमर उजाला, हैदराबाद

सार

अपनी मजबूत स्थिति के बावजूद कांग्रेस के लिए भाजपा से जुड़ी कई अहम बातों को नजरंदाज करना भारी पड़ सकता है। राज्य में हुए उपचुनावों और हैदराबाद निगम चुनावों में भाजपा का प्रदर्शन कांग्रेस से काफी बेहतर रहा है।
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Telangana Election 2023 - फोटो : AMAR UJALA
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विस्तार
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तेलंगाना के विधानसभा चुनाव नए तरह का समीकरण गढ़ते दिख रहे हैं। चुनाव पूर्व सर्वेक्षणों में सत्तारूढ़ भारत राष्ट्र समिति (बीआरएस) और कांग्रेस के बीच कड़ी टक्कर दिखाई गई है। कुछ इलाकों में कांग्रेस को बीआरएस पर बढ़त ही बताई गई है। हालांकि बीआरएस के खिलाफ 9 साल की एंटी इन्कंबेंसी के बावजूद मुख्यमंत्री के चंद्रशेखर राव यानी केसीआर की कई लोकप्रिय योजनाओं के असर को नजरंदाज करना आसान नहीं होगा। बीआरएस और कांग्रेस के सबसे मजबूत होने के बावजूद भाजपा को केंद्रीय योजनाओं के मौन लाभार्थियों से बड़ी उम्मीद है। राज्य में 30 नवंबर को मतदान होना है।

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तेलंगाना के चुनावी रण किसी भी लिहाज से कम महत्वपूर्ण नहीं है क्योंकि विधानसभा चुनावों में बीआरएस और कांग्रेस के प्रदर्शन से अगले लोकसभा चुनाव की तस्वीर तय हो सकती है। वैसे तो तेलंगाना में पिछले दो चुनावों से कांग्रेस यहां मुख्य विपक्ष की भूमिका में है। लेकिन पिछले कई साल से भाजपा ही सड़कों पर विपक्ष की सक्रिय भूमिका निभाते ज्यादा नजर आती रही है।

कांग्रेस की बात करें तो इसके पक्ष में हाल में कर्नाटक में मिली बड़ी जीत का उत्साह शामिल है। पार्टी को लगता है कि बीआरएस सरकार के खिलाफ 9 वर्ष की एंटी-इन्कंबेंसी के साथ उसकी 6 चुनावी गारंटियां जीत दिला सकती हैं। तेलंगाना कर्नाटक का पड़ोसी राज्य है और कर्नाटक चुनाव में गारंटियों के बूते कांग्रेस को मिली सफलता का असर यहां भी पड़ने की संभावना से जानकार इनकार नहीं कर रहे है।
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इसके अलावा, 2014 और 2018 के विधानसभा चुनावों पर नजर डालें तो पता चलता है, हालांकि बीआरएस ने दोनों बार प्रभावशाली सफलता हासिल की थी लेकिन कांग्रेस के वोट शेयर में लगातार बढ़ोतरी हुई है। इसके अलावा कांग्रेस तेलंगाना राज्य बनाने के श्रेय का दावा भी करती है। अपने जमीनी संगठन के बूते कांग्रेस को लगता है कि वह वोटरों तक यह बात सफलतापूर्वक पहुंचा सकती है।

स्थानीय और उपचुनावों में बेहतर प्रदर्शन
अपनी मजबूत स्थिति के बावजूद कांग्रेस के लिए भाजपा से जुड़ी कई अहम बातों को नजरंदाज करना भारी पड़ सकता है। राज्य में हुए उपचुनावों और हैदराबाद निगम चुनावों में भाजपा का प्रदर्शन कांग्रेस से काफी बेहतर रहा है। कांग्रेस गारंटियों की बात करती है, तो केंद्र सरकार की विभिन्न लोककल्याणकारी योजनाओं ने भाजपा के पक्ष में लाभार्थियों का एक मौन वोट बैंक तैयार किया है।

आदिवासी वोट बैंक का रुख
भाजपा ने राज्य में आदिवासियों को शिक्षा और नौकरियों में आरक्षण बढ़ाकर 10 फीसदी करने का वादा किया है। राज्य सरकार के अनुमानित आंकड़ों के हिसाब से प्रदेश में 2011 की जनगणना के आधार पर अनुसूचित जनजातियों की संख्या 9 फीसदी से ज्यादा है। वहीं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी मुलुग में आदिवासियों की देवी के नाम पर देश का पहला केंद्रीय आदिवासी विश्वविद्यालय खोलने की भी घोषणा कर चुके हैं। इन सबके बीच पार्टी देश में पहली आदिवासी महिला को राष्ट्रपति बनाने का मुद्दा भी जनता के बीच ले जा रही है।

शहरी मतदाताओं पर निगाहें
यह सच है कि भाजपा का 2018 में प्रदर्शन 2014 से भी ज्यादा खराब रहा। लेकिन, बाद में उपचुनावों के साथ-साथ हैदराबाद नगर निगम चुनावों में उसने अप्रत्याशित बढ़त दिखाकर अपनी स्थिति बदलने का संकेत दिया है। स्थानीय चुनावों में 150 सीटों में से सत्ताधारी बीआरएस को 56 सीटें मिली थीं, जबकि बीजेपी अपने दम पर 48 सीटें लाकर भाग्यनगर का भाग्य बदलने की बात करने लगी। भाजपा की शहरी वोट बैंक पर नजर है। यही वजह है कि केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह हाल में पार्टी नेताओं और कार्यकर्ताओं से कह चुके हैं कि शहरी सीटों और खासकर हैदराबाद पर पूरा फोकस रखें।

हैदराबाद शहरी क्षेत्र और खासकर पश्चिमी हिस्से में वोटरों की संख्या तेजी से बढ़ने को भाजपा अपने लिए फायदेमंद मान रही है। इसके अलावा पार्टी राज्य में विपक्ष की भूमिका में सड़कों पर लगातार नजर आई। इसलिए चुनावी सर्वेक्षणों में कांग्रेस को बढ़ते दिखने के बावजूद भाजपा को पूरी तरह खारिज करना जल्दबाजी हो सकती है। ऊपर से हैदराबाद समेत प्रदेश के बड़े हिस्से में असदुद्दीन ओवैसी की एआईएमआईएम के साथ खड़े रहने से भी कांग्रेस को ज्यादा डर है।

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