साल 1909 में 21 साल की उम्र में राधाकृष्ण ने मद्रास प्रेसिडेंसी कॉलेज में कनिष्ठ व्याख्याता के तौर पर दर्शन शास्त्र पढ़ना आरंभ किया। फिर उन्होंने 1910 में शिक्षण का प्रशिक्षण मद्रास में लेना शुरू किया।
उस वक्त उन्हें मात्र 37 रुपये वेतन मिलता था। उनके अद्भुत व्याख्यानों के कारण उन्हें 1929 में व्याख्यान देने हेतु 'मैनचेस्टर विश्वविद्यालय' ने आमंत्रित किया। इसके बाद उन्होंने मैनचेस्टर एवं लंदन में कई व्याख्यान दिए।
ऑक्सफर्ड विश्वविद्यालय के प्राध्यापक
1931-1936 तक आंध्र विश्वविद्यालय के वाइस चांसलर रहने के बाद 1936 से 1952 तक राधाकृष्ण ऑक्सफर्ड विश्वविद्यालय के प्राध्यापक रहे। इसके बाद वह 1937 से 1941 तक जॉर्ज पंचम कॉलेज के प्रोफेसर भी रहे। फिर 1939 से 1948 तक काशी हिंदू विश्वविद्यालय के चांसलर बने।
1953 से 1962 तक दिल्ली विश्वविद्यालय के चांसलर रहे। फिर साल 1946 में यूनेस्को में भारतीय प्रतिनिधि के रूप में भी उपस्थित हुए। राधाकृष्ण का निधन 17 अप्रैल 1975 को हुआ। मरणोपरांत उन्हें 1984 में भारत रत्न से सम्मानित किया गया।