अफगानिस्तान में महिलाओं की स्थिति चिंताजनक (सांकेतिक तस्वीर)
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20 साल पहले तालिबान के सत्ता से बेदखल होने के बाद अफगानिस्तान में महिलाओं ने अपने अधिकारों के लिए लंबा संघर्ष किया, जिसके चलते वहां स्वतंत्र मानवाधिकार आयोग जैसी संस्थाएं बनीं। महिला मंत्रालय गठित हुआ और 2009 में महिला हिंसा के विरुद्ध ऐतिहासिक कानून बना। साथ ही देश महिलाओं के खिलाफ तमाम भेदभाव उन्मूलन सम्मेलन जैसे कई वैश्विक मानवाधिकार मंचों से भी जुड़ा। लेकिन 15 अगस्त को तालिबान की वापसी के साथ ही महिला अधिकारों को लेकर दो दशकों की तरक्की जोखिम में पड़ गई है।
90 फीसदी महिलाएं हिंसा की शिकार
विश्व स्वास्थ्य संगठन का अनुमान है कि 90 फीसदी अफगान महिलाएं घरेलू हिंसा की शिकार हैं और 17% ने यौन प्रताड़ना झेली है। जब वह न्याय व्यवस्था का रुख करती हैं तो पुरुषों के मुकाबले खुद को असमर्थ पाती हैं।
न्याय के लिए झेलना पड़ता है दबाव
अफगान महिला अगर कानूनी कार्रवाई का निर्णय ले तो उसे पहले अपने परिवार की ही हिंसा का सामना करना पड़ता है। ज्यादातर मामलों में पति, परिवार के सदस्य, वकील और जज तक उसे कानूनी रास्ता अपनाने से रोकते हैं। महिलाओं को कठोर सामाजिक दबाव सहते हुए जिरगा (स्थानीय नेताओं की सभा) और शूरा (परामर्श प्रक्रिया) जैसी अनौपचारिक न्याय व्यवस्था से गुजरना पड़ता है। यहां तक कि इन स्थानों पर भी परिवार का पुरुष ही पीड़ित महिला का प्रतिनिधित्व करता है। यानी उन्हें अपनी आपबीती बताने की आजादी भी नहीं होती है।
कट्टरपंथी व्यवस्था का खौफ
हालांकि, पिछले कुछ वर्षों में वहां महिला न्याय को लेकर समाज और सरकार के स्तर पर सुधार की राह खुलने लगी थी। लेकिन तालिबान की वापसी ने अब तक हुई महिला अधिकारों को लेकर हुई तरक्की पर संकट खड़ा कर दिया है। तालिबान की न्याय व्यवस्था के बारे में पूरी दुनिया वाकिफ है। बीते दो दशकों में अफगान महिलाओं को काफी अंतरराष्ट्रीय राजनीतिक दबाव के बाद सांविधानिक सुरक्षा मुहैया कराई गई थी, पर अब तालिबान राज में यह ज्यादा दिनों तक नहीं टिकी रह पाएंगी।