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Supreme Court: 'मानवीय गरिमा जीवन का हिस्सा', सड़क हादसे में घायल बच्ची के मामले पर अदालत ने क्यों कही ये बात?

Mon, 03 Aug 2026 07:06 PM IST
हिमांशु सिंह चंदेल न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली

सार

Supreme Court: सुप्रीम कोर्ट ने सड़क हादसे में गंभीर रूप से घायल हुई एक बच्ची को बड़ा राहत देते हुए मुआवजा 45.40 लाख रुपये से बढ़ाकर 83.38 लाख रुपये कर दिया। अदालत ने कहा कि किसी बच्चे की स्थायी विकलांगता केवल शारीरिक नुकसान नहीं, बल्कि उसके पूरे भविष्य और मानवीय गरिमा पर असर डालती है। लेकिन कोर्ट ने इस फैसले में ऐसा क्या कहा, जो आगे ऐसे मामलों की सुनवाई के लिए अहम माना जा सकता है? आइए, सबकुछ विस्तार से जानते हैं...
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मोटर वाहन अधिनियम पर सुप्रीम कोर्ट ने क्या बड़ी टिप्पणी की? - फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स
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विस्तार
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सुप्रीम कोर्ट ने सड़क हादसे में गंभीर रूप से घायल बच्चों के मुआवजे से जुड़े मामलों पर अहम टिप्पणी करते हुए कहा है कि मानवीय गरिमा जीवन का अभिन्न हिस्सा है। अदालत ने कहा कि यदि किसी हादसे में बच्चा स्थायी या लगभग पूरी तरह विकलांग हो जाता है, तो उसका असर केवल उसके शरीर तक सीमित नहीं रहता, बल्कि उसके पूरे भविष्य और जीवन जीने के तरीके पर पड़ता है। इसी सोच के आधार पर शीर्ष अदालत ने छह महीने की उम्र में सड़क हादसे का शिकार हुई बच्ची का मुआवजा बढ़ाकर 83.38 लाख रुपये कर दिया।
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सुप्रीम कोर्ट की न्यायमूर्ति उज्जल भुइयां और न्यायमूर्ति एनवी अंजारिया की पीठ ने यह फैसला बच्ची की मां की ओर से दायर अपील पर सुनाया। इससे पहले ओडिशा हाईकोर्ट ने जनवरी 2023 में मोटर दुर्घटना दावा अधिकरण (एमएसीटी) की ओर से तय 30.12 लाख रुपये के मुआवजे को बढ़ाकर 45.40 लाख रुपये किया था। अब सुप्रीम कोर्ट ने इसे और बढ़ाते हुए 83.38 लाख रुपये कर दिया। अदालत ने कहा कि यह मामला ऐसे बच्चे का है, जिसकी पूरी जिंदगी हादसे के कारण बदल गई और इसलिए मुआवजा तय करते समय मानवीय और व्यावहारिक दृष्टिकोण अपनाना जरूरी है।

सुप्रीम कोर्ट ने मानवीय गरिमा को लेकर क्या कहा?

अदालत ने कहा कि जब किसी गंभीर हादसे में बच्चा अपने रोजमर्रा के काम भी खुद करने की क्षमता खो देता है, तो यह केवल शारीरिक विकलांगता का मामला नहीं रहता। इससे उसकी मानवीय गरिमा भी प्रभावित होती है। कोर्ट ने कहा कि ऐसी चोट बच्चे के शरीर के साथ-साथ उसके पूरे जीवन के अनुभव को बदल देती है। इसलिए ऐसे मामलों का आकलन केवल सामान्य शारीरिक नुकसान के आधार पर नहीं किया जा सकता। अदालत ने कहा कि बच्चों के मामलों को वयस्कों के मामलों की तरह नहीं देखा जाना चाहिए।

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बच्ची की हालत को लेकर अदालत ने क्या माना?

पीठ ने कहा कि हादसे के समय बच्ची केवल छह महीने की थी। जून 2015 में हुए सड़क हादसे में उसे रीढ़ की हड्डी और तंत्रिका तंत्र में गंभीर चोटें आई थीं। मेडिकल रिकॉर्ड के अनुसार बच्ची को 90 प्रतिशत स्थायी शारीरिक विकलांगता हुई थी। हालांकि अदालत ने कहा कि बच्ची सामान्य दैनिक काम भी अपने दम पर नहीं कर सकती और उसे हर छोटे-बड़े काम के लिए दूसरों की मदद की जरूरत होगी। इसलिए उसकी कार्यात्मक विकलांगता 100 प्रतिशत मानी जाएगी, क्योंकि वह स्वतंत्र रूप से जीवन नहीं जी सकती।

मोटर वाहन अधिनियम को लेकर कोर्ट ने क्या कहा?

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि मोटर वाहन अधिनियम, 1988 एक कल्याणकारी कानून है और इसकी व्याख्या भी उसी भावना से की जानी चाहिए। अदालत ने कहा कि बचपन में लगी गंभीर चोट का असर केवल तत्काल इलाज तक सीमित नहीं रहता, बल्कि वह बच्चे के पूरे भविष्य को प्रभावित करता है। ऐसे मामलों में अदालतों को यह समझना होगा कि नुकसान केवल शारीरिक क्षमता का नहीं, बल्कि शिक्षा, रोजगार, सामाजिक जीवन और आत्मसम्मान जैसे जीवन के हर पहलू का होता है। इसलिए मुआवजा तय करते समय इन सभी बातों को ध्यान में रखना जरूरी है।

इस फैसले का क्या महत्व?

सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि सड़क हादसों में गंभीर रूप से घायल बच्चों के मामलों में अदालतों को संवेदनशील और मानवीय दृष्टिकोण अपनाना चाहिए। अदालत ने कहा कि स्थायी विकलांगता से जूझ रहे बच्चे का पूरा भविष्य प्रभावित होता है और मुआवजा तय करते समय इसी वास्तविकता को आधार बनाया जाना चाहिए। इसी आधार पर अदालत ने बीमा कंपनी को बच्ची को 83.38 लाख रुपये का मुआवजा देने का निर्देश दिया। यह फैसला भविष्य में ऐसे मामलों की सुनवाई के लिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
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