तीन दशक पुराने मामले में बड़ा फैसला सुनाते हुए सुप्रीम ने पूर्व भारतीय वायुसेना अधिकारी आर सूद की बर्खास्तगी को अवैध करार दिया है। कोर्ट ने कहा कि उन्हें गलत तरीके से सेवा से हटाया गया था और अब उनकी प्रतिष्ठा बहाल की जानी चाहिए। यह फैसला न सिर्फ एक व्यक्ति के लिए, बल्कि सैन्य न्याय व्यवस्था पर भी बड़ा संदेश माना जा रहा है।
कोर्ट ने साफ कहा कि 1993 में दिया गया दंड असमान और अनुचित था। जिस वरिष्ठ अधिकारी के आदेश पर सूद ने कार्रवाई की, उसे हल्की सजा मिली, जबकि सूद को सेवा से हटा दिया गया। अदालत ने इस असमानता को न्याय के सिद्धांतों के खिलाफ बताया और बर्खास्तगी के आदेश को रद्द कर दिया।
32 साल बाद मिला न्याय?
अदालत ने कहा कि सूद को पिछले 32 वर्षों तक अपमान के साथ जीना पड़ा। इसलिए अब न्याय की मांग है कि उनकी प्रतिष्ठा पूरी तरह बहाल की जाए। हालांकि वह अब सेवानिवृत्ति की उम्र पार कर चुके हैं, इसलिए उन्हें दोबारा सेवा में नहीं लिया जा सकता, लेकिन सभी सेवा संबंधी लाभ दिए जाएंगे।
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क्या मिलेगा आर्थिक और सेवा लाभ?
सुप्रीम कोर्ट ने निर्देश दिया कि सूद को 1993 से उनकी रिटायरमेंट तक 50 प्रतिशत वेतन और भत्तों का बकाया दिया जाए। साथ ही उन्हें प्रमोशन का लाभ भी मिलेगा और पेंशन समेत अन्य सभी सुविधाएं ब्याज के साथ प्रदान की जाएंगी।
सजा में असमानता पर उठे सवाल
कोर्ट ने कहा कि एक वरिष्ठ अधिकारी को हल्की सजा और अधीनस्थ को कड़ी सजा देना समानता के सिद्धांत का उल्लंघन है। अदालत ने माना कि सूद ने अपने वरिष्ठ के आदेश का पालन किया था, फिर भी उन्हें सबसे कठोर दंड दिया गया, जो पूरी तरह गलत था।
क्या था पूरा मामला और क्यों हुआ विवाद?
यह मामला 1987 का है, जब एक घटना के बाद सूद और अन्य अधिकारियों पर कार्रवाई हुई थी। बाद में आपराधिक मामले में पर्याप्त सबूत नहीं मिलने पर सूद को राहत मिल गई थी, लेकिन सेवा से बर्खास्तगी का आदेश जारी रहा। अब सुप्रीम कोर्ट ने इसे अवैध मानते हुए न केवल आदेश रद्द किया, बल्कि उनकी प्रतिष्ठा बहाल करने का भी निर्देश दिया है।
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