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32 साल बाद मिला न्याय?: सुप्रीम कोर्ट ने पूर्व वायुसेना अधिकारी की बर्खास्तगी की रद्द, बहाल की प्रतिष्ठा

Wed, 15 Apr 2026 10:07 PM IST
Himanshu Singh Chandel पीटीआई, नई दिल्ली

सार

सुप्रीम कोर्ट ने 32 साल पुराने मामले में पूर्व वायुसेना अधिकारी आर सूद की बर्खास्तगी को अवैध करार देते हुए उनकी प्रतिष्ठा बहाल करने का आदेश दिया है। अदालत ने सजा में असमानता को गलत बताया और 50 प्रतिशत वेतन, पेंशन व अन्य लाभ देने के निर्देश दिए। आइए, विस्तार से पूरे मामले को जानते हैं। 
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सुप्रीम कोर्ट - फोटो : ANI
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विस्तार
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तीन दशक पुराने मामले में बड़ा फैसला सुनाते हुए सुप्रीम ने पूर्व भारतीय वायुसेना अधिकारी आर सूद की बर्खास्तगी को अवैध करार दिया है। कोर्ट ने कहा कि उन्हें गलत तरीके से सेवा से हटाया गया था और अब उनकी प्रतिष्ठा बहाल की जानी चाहिए। यह फैसला न सिर्फ एक व्यक्ति के लिए, बल्कि सैन्य न्याय व्यवस्था पर भी बड़ा संदेश माना जा रहा है।
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कोर्ट ने साफ कहा कि 1993 में दिया गया दंड असमान और अनुचित था। जिस वरिष्ठ अधिकारी के आदेश पर सूद ने कार्रवाई की, उसे हल्की सजा मिली, जबकि सूद को सेवा से हटा दिया गया। अदालत ने इस असमानता को न्याय के सिद्धांतों के खिलाफ बताया और बर्खास्तगी के आदेश को रद्द कर दिया।

32 साल बाद मिला न्याय?
अदालत ने कहा कि सूद को पिछले 32 वर्षों तक अपमान के साथ जीना पड़ा। इसलिए अब न्याय की मांग है कि उनकी प्रतिष्ठा पूरी तरह बहाल की जाए। हालांकि वह अब सेवानिवृत्ति की उम्र पार कर चुके हैं, इसलिए उन्हें दोबारा सेवा में नहीं लिया जा सकता, लेकिन सभी सेवा संबंधी लाभ दिए जाएंगे।
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क्या मिलेगा आर्थिक और सेवा लाभ?
सुप्रीम कोर्ट ने निर्देश दिया कि सूद को 1993 से उनकी रिटायरमेंट तक 50 प्रतिशत वेतन और भत्तों का बकाया दिया जाए। साथ ही उन्हें प्रमोशन का लाभ भी मिलेगा और पेंशन समेत अन्य सभी सुविधाएं ब्याज के साथ प्रदान की जाएंगी।

सजा में असमानता पर उठे सवाल
कोर्ट ने कहा कि एक वरिष्ठ अधिकारी को हल्की सजा और अधीनस्थ को कड़ी सजा देना समानता के सिद्धांत का उल्लंघन है। अदालत ने माना कि सूद ने अपने वरिष्ठ के आदेश का पालन किया था, फिर भी उन्हें सबसे कठोर दंड दिया गया, जो पूरी तरह गलत था।

क्या था पूरा मामला और क्यों हुआ विवाद?
यह मामला 1987 का है, जब एक घटना के बाद सूद और अन्य अधिकारियों पर कार्रवाई हुई थी। बाद में आपराधिक मामले में पर्याप्त सबूत नहीं मिलने पर सूद को राहत मिल गई थी, लेकिन सेवा से बर्खास्तगी का आदेश जारी रहा। अब सुप्रीम कोर्ट ने इसे अवैध मानते हुए न केवल आदेश रद्द किया, बल्कि उनकी प्रतिष्ठा बहाल करने का भी निर्देश दिया है।

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ग्राहकों के प्रतिनिधि हैं बैंक समय पर चेक पेश न करना सेवा में कमी : सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि बैंक ग्राहकों के एजेंट के रूप में कार्य करते हैं। उन पर उचित सावधानी बरतने और चेक के पुराने होने से पहले उसे भुगतान के लिए प्रस्तुत करना वैधानिक दायित्व है। पुराने चेक को भुगतान सेवा में कमी माना जाएगा। जस्टिस बीवी नागरत्ना और जस्टिस उज्ज्वल भुइयां की पीठ ने शिकायतकर्ताओं को दिए गए मुआवजे को कम कर दिया। यह फैसला राष्ट्रीय उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग के निर्णय के खिलाफ केनरा बैंक की अपील पर आया है। आयोग ने ग्राहक कविता चौधरी के पक्ष में फैसला सुनाया था। यह विवाद मई 2018 में तब शुरू हुआ जब कविता और प्रिया चौधरी ने लगभग 1.06 करोड़ रुपये के दो चेक अपने केनरा बैंक खातों में जमा किए। बैंक ने इन चेकों को उनकी वैधता अवधि के बाद पेश किया, जो खारिज हो गए थे। 

आयोग ने इसे बैंक की कमी मानते हुए ग्राहक को चेक के मूल्य के 10 फीसदी धनराशि 8 फीसदी ब्याज के साथ हर्जाने के रूप में देने को कहा। शीर्ष अदालत ने बैक की लापरवाही तो मानी, लेकिन जुर्माने की रकम को 6 फीसदी और ब्याज दर को भी 6 फीसदी कर दिया। इसके अलावा, ग्राहकों को मुकदमेबाजी लागत के रूप में 50,000 रुपये का भुगतान करने के आयोग के आदेश को बरकरार रखा।
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