सुप्रीम कोर्ट ने धनशोधन मामले में झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के सहयोगी को जमानत दे दी है। इस दौरान कोर्ट ने कहा कि पीएमएलए मामलों में भी जमानत नियम है और जेल में रखना अपवाद है। न्यायमूर्ति बीआर गवई और केवी विश्वनाथन की पीठ ने कहा, 'अदालत ने माना है कि धन शोधन निवारण अधिनियम (पीएमएलए) के तहत मामलों में भी जमानत एक नियम है और जेल एक अपवाद है।' पीठ ने कहा कि किसी भी व्यक्ति को उसकी आजादी से वंचित नहीं किया जाना चाहिए।
शीर्ष कोर्ट ने पूर्व उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया से जुड़े धन शोधन और भ्रष्टाचार मामलों में 9 अगस्त के फैसले का हवाला देते हुए कहा कि व्यक्ति की आजादी हमेशा नियम होती है और कानून द्वारा स्थापित प्रक्रिया द्वारा उससे वंचित करना अपवाद है। धन शोधन मामले में आरोपी की जमानत के लिए दोहरी शर्तें रखने वाली पीएमएलए की धारा 45 में भी सिद्धांत को इस तरह से नहीं लिखा गया कि स्वतंत्रता से वंचित करना नियम है।
पीठ ने कहा कि पीएमएलए की धारा 45 के तहत दोहरा परीक्षण इस सिद्धांत को खत्म नहीं करता है। ऐसा कहते हुए कोर्ट ने प्रेम प्रकाश नाम के व्यक्ति को जमानत दे दी। उन्हें ईडी ने सोरेन का करीबी सहयोगी बताया है। उन पर राज्य में अवैध खनन में शामिल होने का आरोप है। इससे पहले शीर्ष कोर्ट ने झारखंड उच्च न्यायालय के 22 मार्च के आदेश को खारिज कर दिया, जिसमें उसे जमानत देने से इनकार कर दिया गया था और निचली अदालत को मामले में सुनवाई में तेजी लाने का निर्देश दिया था।
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महाराष्ट्र के बदलापुर समेत स्कूलों में बच्चों के साथ हाल ही में हुई यौन उत्पीड़न की घटनाओं के मद्देनजर 'बचपन बचाओ आंदोलन' ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया है। संगठन ने देश के शैक्षणिक संस्थानों में बच्चों की सुरक्षा और संरक्षा पर केंद्र के दिशा-निर्देशों के क्रियान्वयन से संबंधित याचिका लगाई है। संठगन ने मामले की सुनवाई जल्द से जल्द करने की मांग की है। सुप्रीम कोर्ट ने 24 सितंबर को इस पर सुनवाई करने पर सहमति जताई है।
मध्यस्थ बनने के लिए अयोग्य व्यक्ति दूसरे को नामित कर सकता है या नहीं? सुप्रीम कोर्ट करेगा फैसला
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सुप्रीम कोर्ट ने विवादास्पद कानूनी प्रश्न पर सुनवाई शुरू की है कि क्या मध्यस्थ बनने के लिए अयोग्य व्यक्ति किसी अन्य को नामित कर सकता है। सीजेआई जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ की पांच सदस्यीय संविधान पीठ ने मध्यस्थता एवं सुलह अधिनियम, 1996 के प्रावधानों से संबंधित दलीलें सुनीं, जिनमें मध्यस्थों की नियुक्ति से संबंधित मामला भी शामिल था। सीजेआई जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़, जस्टिस ऋषिकेश रॉय, जस्टिस पीएस नरसिम्हा, जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस मनोज मिश्रा की पीठ ने कहा कि संरचना के स्तर पर मध्यस्थ न्यायाधिकरण की स्वतंत्रता धारणा का विषय है। सीजेआई ने कहा, जब पक्ष मध्यस्थता में प्रवेश कर रहे होते हैं, तो यह एक स्वतंत्र निर्णायक या स्वतंत्रता की कमी की उनकी धारणा होती है, जो महत्वपूर्ण है। इसलिए, आपको ऐसी परिस्थितियां बनानी चाहिए जो प्रक्रिया में विश्वास की भावना को बढ़ावा दें। एक पक्ष की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता एनके कौल ने कहा, यदि कोई व्यक्ति मध्यस्थ नियुक्त होने में अक्षम या अयोग्य है, तो वे किसी मुद्दे से निपटने के लिए मध्यस्थों का पैनल नामित या उपलब्ध नहीं करा सकते।