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Supreme Court: पनीरसेल्वम को झटका, पलानीस्वामी को अन्नाद्रमुक मुख्यालय की चाबी सौंपने के खिलाफ दायर खारिज

Mon, 12 Sep 2022 10:40 PM IST
अभिषेक दीक्षित न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
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सुप्रीम कोर्ट (फाइल) - फोटो : सोशल मीडिया
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सुप्रीम कोर्ट ने एडप्पादी के पलानीस्वामी को अन्नाद्रमुक मुख्यालय की चाबी सौंपने के मद्रास हाईकोर्ट के मदुरै बेंच के आदेश के खिलाफ पूर्व सीएम और अन्नाद्रमुक नेता ओ पनीरसेल्वम की याचिका खारिज कर दी।

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सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि लोकतंत्र में एक राजनीतिक दल को उसका कार्यालय सील कर काम करने से नहीं रोका जा सकता है। जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ और जस्टिस हिमा कोहली की पीठ ने कहा कि किसी राजनीतिक दल के कार्यालय को सील करने की अनुमति का दुरुपयोग किया जा सकता है और इसका व्यापक असर हो सकता है जो लोकतांत्रिक व्यवस्था में उचित नहीं होगा। 

पीठ ने कहा कि हम हाईकोर्ट के आदेश में दखल नहीं देंगे। पनीरसेल्वम पार्टी से निष्कासित हैं। यदि हम आपको पार्टी कार्यालय में प्रवेश की इजाजत देते हैं तो यह मुसीबत बन सकती है। कुल मिलाकर, हाईकोर्ट के इस आदेश ने शांति बनाए रखी है और पिछले दो महीनों से कुछ भी अप्रिय नहीं हुआ है। 
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पीठ ने कहा कि उसका यह आदेश अन्य न्यायिक फोरम में लंबित अन्य कार्यवाही के आड़े नहीं आएगा। पीठ मद्रास हाईकोर्ट के 20 जुलाई के एक आदेश को चुनौती देने वाली पनीरसेल्वम की याचिका पर सुनवाई कर रही थी, जिसने तमिलनाडु के राजस्व विभाग की कार्यवाही को रद्द कर दिया था और कहा था कि कार्यालय की चाबियां पार्टी प्रमुख के पलानीस्वामी को सौंपी जाएं। दरअसल, राजस्व विभाग ने अन्नाद्रमुक के पनीरसेल्वम और पलानीस्वामी गुटों के बीच हुई हिंसा के चलते 11 जुलाई को कार्यालय सील कर दिया था।

सुप्रीम कोर्ट (फाइल) - फोटो : सोशल मीडिया
बिल्डरों के अतिक्रमण की SIT जांच वाली याचिका खारिज
इस बीच सुप्रीम कोर्ट ने एक अन्य याचिका को भी खारिज कर दिया, जिसमें नोएडा और देश भर में बिल्डरों के कथित उल्लंघनों की जांच के लिए विशेष जांच दल (एसआईटी) के गठन का अनुरोध किया गया था। याचिका में विभिन्न विकास प्राधिकरणों के अधिकारियों के साथ कथित मिलीभगत करने का आरोप भी लगाया गया था। चीफ जस्टिस यूयू ललित और जस्टिस एसआर भट्ट की पीठ ने याचिकाकर्ता के वकील से कहा कि उन्हें तथ्यों के साथ स्पष्ट मामला लेकर आना होगा और किसी भी उल्लंघन के बारे में अधिकारियों को बताना होगा।

कॉलेजियम ने 20 नामों को मंजूरी दी
मुख्य न्यायाधीश यूयू ललित की अध्यक्षता वाले सुप्रीम कोर्ट के कॉलेजियम ने पंजाब और हरियाणा, बॉम्बे और कर्नाटक हाईकोर्ट में 20 न्यायाधीशों की नियुक्ति को मंजूरी दे दी है। कॉलेजियम ने सोमवार को हुई बैठक में पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय में नौ न्यायिक अधिकारियों को न्यायाधीश के रूप में पदोन्नत करने के प्रस्ताव को मंजूरी दी। 
  • शीर्ष अदालत ने न्यायिक अधिकारियों- गुरबीर सिंह, दीपक गुप्ता, अमरजोत भट्टी, रितु टैगोर, मनीषा बत्रा, हरप्रीत कौर जीवन, सुखविंदर कौर, संजीव बेरी और विक्रम अग्रवाल को पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों के रूप में पदोन्नत करने के प्रस्ताव को मंजूरी दी है।
  • इसके अलावा न्यायिक अधिकारियों - संजय आनंदराव देशमुख, यंशिवराज गोपीचंद खोबरागड़े, महेंद्र वधूमल चांदवानी, अभय सोपानराव वाघवासे, रवींद्र मधुसूदन जोशी, और वृषाली @ शुभांगी विजय जोशी और अधिवक्ता संतोष गोविंदराव चपलगांवकर और मिलिंद मनोहर सथाये को बॉम्बे हाई कोर्ट में न्यायाधीशों के रूप में पदोन्नत करने के प्रस्ताव को भी मंजूरी दी।
  • सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम ने सात सितंबर को हुई अपनी बैठक में कर्नाटक उच्च न्यायालय में स्थायी न्यायाधीशों के रूप में अतिरिक्त न्यायाधीशों न्यायमूर्ति मोहम्मद गौस शुकुरे कमल, न्यायमूर्ति राजेंद्र बादामीकर और न्यायमूर्ति खाजी जयबुन्निसा मोहिउद्दीन की नियुक्ति के प्रस्ताव को मंजूरी दे दी है।

सांकेतिक तस्वीर।
इस याचिका पर विचार करने से इनकार
सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को उस जनहित याचिका पर विचार करने से इनकार कर दिया जिसमें शराब की रोकथाम के लिए एक राष्ट्रीय नीति की मांग की गई थी। सुनवाई की शुरुआत में याचिकाकर्ता ने भारत के मुख्य न्यायाधीश(सीजेआई) और जस्टिस एस रविन्द्र भट की पीठ के समक्ष कहा कि देश की एक छोटी आबादी गंभीर रूप से शराब की आदी है और केंद्र ने इस विषय पर कोई नीति नहीं बनाई है हालांकि समवर्ती सूची ने केंद्र सरकार को इस विषय पर नीतियां बनाने की शक्ति दी है। हालांकि, पीठ याचिकाकर्ता की दलीलों से संतुष्ट नहीं दिखी। शीर्ष अदालत के रुख को देखते हुए याचिकाकर्ता ने अपनी याचिका वापस ले ली।
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court new - फोटो : istock
सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र से 10 लाख रुपए का मुवावजा देने को कहा
वहीं,  सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को उस 75 वर्षीय व्यक्ति को 10 लाख रुपए का मुआवजा देने को कहा, जिसने भारतीय जासूस होने का दावा किया था और उसे 1970 के दशक में जासूसी के आरोप में पाकिस्तान की जेल में रखा गया था। भारत के मुख्य न्यायाधीश(सीजेआई) यूयू ललित और जस्टिस एस रवींद्र भट की पीठ ने स्पष्ट किया कि अदालत उनके दावों पर अपना विचार व्यक्त नहीं कर रही है, लेकिन मामले के समग्र दृष्टिकोण को देखते हुए उन्हें मुआवजे का भुगतान किया जाना चाहिए।
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