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Supreme Court: क्या अदालतों को मध्यस्थता के फैसलों में संशोधन का अधिकार? संविधान पीठ में सुनवाई के बाद फैसला

Thu, 13 Feb 2025 12:47 PM IST
ज्योति भास्कर न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली

सार

क्या अदालतों को मध्यस्थता कानून के तहत सुनाए गए फैसलों में संशोधन का अधिकार है? इस सवाल पर निर्णायक फैसले के लिए सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ में आज सुनवाई शुरू हुई। चीफ जस्टिस संजीव खन्ना की अध्यक्षता में पांच जजों की पीठ फैसला सुनाएगी।
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सुप्रीम कोर्ट - फोटो : संवाद न्यूज एजेंसी
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विस्तार
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सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ इस सवाल पर फैसला करेगी कि क्या अदालतें मध्यस्थता के फैसलों में संशोधन कर सकती हैं। चीफ जस्टिस संजीव खन्ना की अध्यक्षता में गठित पांच न्यायाधीशों की इस पीठ में जस्टिस बीआर गवई, न्यायमूर्ति संजय कुमार, जस्टिस केवी विश्वनाथन और जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह शामिल हैं। गुरुवार को शुरू हुई सुनवाई के बाद सरकार की तरफ से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने दलीलें पेश कीं। उच्चतम न्यायालय को यह फैसला करना है कि अगर कोर्ट ने 1996 के मध्यस्थता और सुलह कानून के तहत पारित आदेशों में अवॉर्ड का फैसला सुनाया है, तो क्या अदालतों को इनमें संशोधन का अधिकार है?

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फैसले में संशोधन का अधिकार संवेदनशील और विवादास्पद
इससे पहले विगत 23 जनवरी को सीजेआई की अध्यक्षता वाली तीन जजों की पीठ ने कहा था कि फैसले में संशोधन का अधिकार संवेदनशील और विवादास्पद सवाल है। इसलिए संविधान पीठ में सुनवाई के बाद इसका फैसला लिया जाएगा। 

लगभग तीन दशक पुराने कानून से जुड़ा सवाल
बता दें कि मध्यस्थता कानून 1996 के तहत विवादों का समाधान किया जाता है। यह एक वैकल्पिक कानूनी तरीका है, जिसमें न्यायाधिकरणों के फैसलों में हस्तक्षेप किया जा सकता है। हालांकि, अदालतों की इसमें न्यूनतम भूमिका होती है। इस कानून की धारा 34 और 37 के कानूनूी पहलुओं पर अदालत को विचार करना है। अगर अदालत प्रक्रियाओं में अनियमितता, नीतियों के उल्लंघन और अधिकार क्षेत्र जैसे बिंदुओं पर मध्यस्थता के फैसले को गलत पाती है तो कानून की धारा 34 के तहत पुराने फैसले को निरस्त किया जा सकता है। इसके अलावा धारा 37 के तहत अदालत न्यायाधिकरण के निर्णय को रद्द करने से इन्कार करने का आदेश भी पारित कर सकती है। हालांकि, मध्यस्थता से संबंधित आदेशों के खिलाफ अपील के बहुत सीमित विकल्प होते हैं।
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संविधान पीठ को इन जटिल कानूनी बिंदुओं पर फैसला करना है
इससे पहले फरवरी, 2024 में भी न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता, जस्टिस केवी विश्वनाथन और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की सुप्रीम कोर्ट पीठ ने कुछ पेचीदा कानूनी सवालों की सूची तैयार कर चीफ जस्टिस के पास भेज दिया था। इसमें सबसे अहम सवाल यही है कि क्या अदालत को मध्यस्थता कानून की धारा 34 के तहत आदेश को संशोधित करने का अधिकार भी हासिल है? अगर अदालत को संशोधन का अधिकार है तो इसकी सीमा क्या होगी और किन परिस्थितियों में आदेश संशोधित किया जा सकता है? तमाम जटिल कानूनी बिंदुओं पर संविधान पीठ सुनवाई के बाद निर्णायक फैसला लेगी।

न्यायालयों को मध्यस्थता निर्णयों में संशोधन का अधिकार विधायिका को सौंपा जाए: सुप्रीम कोर्ट में केंद्र सरकार 
केंद्र सरकार ने आज सुप्रीम को बताया कि 1996 के मध्यस्थता और सुलह कानून के तहत मध्यस्थता के फैसलों में संशोधन करने का अधिकार न्यायालयों को देने का सवाल विधायिका पर छोड़ा जाना चाहिए, ताकि देश की बदलती मध्यस्थता जरूरतों के अनुसार इसे देखा जा सके। सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस (सीजेआई) संजीव खन्ना और जस्टिस बी. आर. गवई, संजय कुमार, के. वी. विश्वनाथन और ऑगस्टिन जॉर्ज मसीह की पांच सदस्यीय संविधान पीठ यह विचार कर रही थी कि क्या न्यायालय 1996 के मध्यस्थता और सुलह अधिनियम की प्रावधानों के तहत मध्यस्थता निर्णयों में संशोधन कर सकते हैं।

सुप्रीम कोर्ट ने मेघालय सरकार के फैसले को बरकरार रखा
सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को मेघालय के चंद्रमोहन झा (सीएमजे) विश्वविद्यालय को भंग करने का आदेश दिया। शीर्ष कोर्ट ने कुप्रबंधन सहित कई खामियों के कारण संस्थान को बंद करने के राज्य सरकार के 2014 के फैसले को बरकरार रखा। 

जस्टिस पी.एस. नरसिम्हा और जस्टिस संदीप मेहता ने कहा कि सीएमजे विश्वविद्यालय के कुलपति की नियुक्ति के लिए तय प्रक्रिया का पालन ठीक से नहीं किया गया था। इसके परिणामस्वरूप विश्वविद्यालय के कुलपति की नियुक्ति को हाईकोर्ट की खंडपीठ ने अमान्य घोषित किया था और इस फैसले में कोई कमी नहीं पाई गई। 

तमिलनाडु सरकार और राज्यपाल के बीच विधेयकों को मंजूरी देने पर विवाद, सुप्रीम कोर्ट ने पूछे 12 सवाल
सुप्रीम कोर्ट ने तमिलनाडु सरकार और और राज्यपाल आर.एन.रवि के बीच विधेयकों को मंजूरी में देने में देरी को लेकर उठे विवाद पर 12 सवालों को स्पष्ट करने के लिए आदेश जारी किया है। ये स वाल खासतौर पर राज्यपाल के अधिकारों पर केंद्रित हैं, खासकर संविधान के अनुच्छेद 200 के तहत विधेयकों को मंजूरी देने, उन्हें रोकने और राष्ट्रपति के पास विचार के लिए भेजने के मामले में। 

जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस आर. महादेवन की पीठ ने 10 फरवरी को अपना फैसला सुरक्षित रखा था। पीठ ने अब इन 12 सवालों को उठाया है। ये सवाल राज्यपाल के अधिकारों और संविधान में उल्लिखित उनके कर्तव्यों से जुड़े हैं।  एक प्रमुख सवाल यह है कि अगर राज्य की विधानसभा ने कोई विधेयक पारित किया है और राज्यपाल ने उसे मंजूरी देने से रोक दिया है, तो क्या राज्यपाल उसे फिर से राष्ट्रपति के विचार के लिए भेज सकते हैं, जब उन्होंने पहले ऐसा नहीं किया था?

इसके अलावा, कोर्ट ने यह भी जानना चाहा कि क्या राज्यपाल का अधिकार सिर्फ राज्य सरकार के मंत्रिमंडल के सलाह पर होता है, या फिर राज्यपाल को इसमें अपनी निजी राय रखने का भी अधिकार है। सुप्रीम कोर्ट ने यह भी पूछा कि क्या 'पॉकेट वीटो' का सिद्धांत संविधान के अनुच्छेद 111, 200 और 201 के तहत लागू होता है। इसका मतलब यह है कि क्या राज्यपाल किसी विधेयक को बिना किसी फैसले के रोक सकते हैं। 
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घुसपैठिये सजा पूरी करने के बाद भी जेलों में क्यों  बगैर वैध दस्तावेज देश में रहने के हकदार नहीं
 सुप्रीम कोर्ट ने घुसपैठियों को सजा पूरी करने के बाद भी जेलों में रखे जाने पर चिंता जताई। शीर्ष अदालत ने केंद्र से सवाल किया कि घुसपैठियों की राष्ट्रीयता का पता लगाने की आवश्यकता क्यों है जबकि उनके खिलाफ सटीक आरोप यह है कि वे उस देश के नागरिक होते हुए भी अवैध रूप से भारत में प्रवेश कर गए हैं। शीर्ष अदालत ने देश में बांग्लादेशी घुसपैठियों की अनिश्चितकालीन हिरासत के मुद्दे को उठाने वाले मामले में फैसला सुरक्षित रख लिया। जस्टिस जेबी पारदीवाला की पीठ ने कहा, जब घुसपैठियों को दोषी ठहराया जाता है, तो वे बिना किसी वैध पासपोर्ट या किसी अन्य दस्तावेज के इस देश में रहने के हकदार नहीं हैं। ऐसे में पड़ोसी देश से उसकी राष्ट्रीयता और सत्यापन के बारे में बताने के लिए कहने का क्या मतलब है? साथ ही, न्यायालय ने पश्चिम बंगाल सरकार को सुधार गृह या डिटेंशन सेंटर न होने के लिए फटकार लगाई। सुधार गृह या डिटेंशन सेंटर नहीं होने के कारण ये अवैध प्रवासी जेलों में सड़ रहे हैं।  

पश्चिम बंगाल से पूछा, क्या राज्य इतना गरीब की सुधार गृह नहीं खोल सकता
पीठ ने कहा, आपके पास सुधार गृह या हिरासत केंद्र क्यों नहीं है? सजा काटने के बाद भी आप व्यक्ति को जेलों में रख रहे हैं। आप ऐसा कैसे कर सकते हैं? क्या राज्य इतना गरीब है कि उसके पास सुधार गृह या डिटेंशन सेंटर तक के लिए पैसे नहीं है? आपके लिए जेल परिसर के बाहर ‘सुधार गृह’ का बोर्ड लगाना बहुत आसान है, लेकिन फिर भी यह जेल ही रहता है। जेल का मतलब है कि आप उसे बाहर घूमने, बाजार में टहलने की अनुमति नहीं देते, उसे सूर्यास्त के बाद उसे फिर से सेल में डाल देते हैं। सुधार गृहों में शायद कुछ स्वतंत्रता हो सकती है।

क्या है मामला
शीर्ष अदालत अवैध घुसपैठियों से संबंधित 2013 में दायर एक स्थानांतरण याचिका पर विचार कर रही थी। याचिकाकर्ता माजा दारूवाला और एक अन्य कॉमन हेल्थ ह्यूमन राइट्स इनिशिएटिव नामक एनजीओ से जुड़े हुए हैं। याचिकाकर्ताओं ने हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश को पत्र में उन सभी अवैध बांग्लादेशी घुसपैठियों पर चिंता जताई थी जिन्हें निर्वासित करने की बजाय हिरासत में रखा जा रहा है।
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