झारखंड अवैध खनन मामले में सीबीआई को जांच जारी रखने की सुप्रीम अनुमति
सुप्रीम कोर्ट ने झारखंड के साहिबगंज में अवैध खनन से जुड़े एक मामले में सीबीआई जांच जारी रखने की अनुमति दे दी, लेकिन केंद्रीय एजेंसी को अगली सुनवाई तक आरोपपत्र दाखिल करने से रोक दिया।
जस्टिस संजीव खन्ना व जस्टिस दीपांकर दत्ता ने शुक्रवार को झारखंड सरकार की तरफ से दाखिल एक याचिका पर सीबीआई से जवाब मांगा। अदालत ने जवाब दाखिल करने के लिए वक्त देते हुए मामले को आठ जुलाई से प्रारंभ हो रहे हफ्ते में सूचीबद्ध करने का निर्देश दिया। झारखंड सरकार ने हाईकोर्ट के 23 फरवरी के उस फैसले को चुनौती दी गई थी, जिसमें अदालत ने उसकी सीबीआई जांच को चुनौती देने वाली याचिका खारिज कर दी थी।
अदालत ने झारखंड सरकार की तरफ से मौजूद वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल व अरुणाभ चौधरी की दलील पर गौर किया। अधिवक्ताओं ने अदालत को बताया कि झारखंड हाईकोर्ट ने 18 अगस्त को सिर्फ सीबीआई की प्रारंभिक जांच का आदेश दिया था। लेकिन, पुलिस ने मामले की जांच कभी भी सीबीआई को सौंपी ही नहीं। पुलिस मामले में क्लोजर रिपोर्ट पेश कर चुकी है। अधिवक्ता जयंज गुप्ता की तरफ से दाखिल अपील में झारखंड सरकार ने दावा किया है कि उसकी याचिका हाईकोर्ट ने सिर्फ इस आधार पर खारिज कर दी थी कि उसने पिछले साल सीबीआई जांच का आदेश दिया था।
उच्चतम न्यायालय ने विवाह से जुड़े कानूनी प्रावधानों पर अहम टिप्पणी की। अदालत में दो जजों की खंडपीठ ने सलाह देते हुए कहा, सहनशीलता और सम्मान अच्छे वैवाहिक रिश्ते की नींव हैं। छोटे-मोटे झगड़ों को बढ़ा-चढ़ाकर नहीं बताया जाना चाहिए। शुक्रवार को अदालत की ने यह टिप्पणी एक महिला की तरफ से दायर दहेज-उत्पीड़न के मामले को रद्द करते हुए आई। पति के खिलाफ कानून की धारा 498ए के तहत दायर याचिका पर अदालत ने कहा कि वैवाहिक विवादों में मुख्य पीड़ित बच्चे होते हैं। पति-पत्नी अपने दिल में इतना जहर लेकर लड़ते हैं कि वे एक पल के लिए भी नहीं सोचते कि अगर शादी खत्म हो जाएगी, तो उनके बच्चों पर क्या असर होगा।
प्रत्येक मामले में क्रूरता का निर्धारण ठीक तरीके से होना जरूरी
अदालत ने कहा कि कई बार, एक विवाहित महिला के माता-पिता और करीबी रिश्तेदार बात का बतंगड़ बना देते हैं। छोटी-छोटी बातों पर वैवाहिक बंधन पूरी तरह से नष्ट कर देते हैं। शीर्ष अदालत के मुताबिक महिला, उसके माता-पिता और रिश्तेदारों के दिमाग में सबसे पहली चीज- पुलिस आती है। ऐसी धारणा होती है कि पुलिस ही सभी बुराईयों का रामबाण इलाज है, लेकिन मामला पुलिस तक पहुंचते ही पति-पत्नी के बीच सुलह की बची-खुची संभावना भी खत्म हो जाती है। खंडपीठ ने कहा, अदालत को देखना चाहिए कि प्रत्येक मामले में क्रूरता का निर्धारण ठीक तरीके से हो। सभी झगड़ों को सही दृष्टिकोण से तौला जाना चाहिए। हमेशा दोनों की शारीरिक और मानसिक स्थिति, उनके चरित्र और सामाजिक स्थिति को भी ध्यान में रखना चाहिए। बहुत मशीनी तरीके अपनाने और हाइपर -संवेदनशील दृष्टिकोण से निर्णय करना विवाह जैसे संबंध के लिए विनाशकारी साबित होंगे।
अच्छे विवाह पर शीर्ष अदालच की टिप्पणी
जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस मनोज मिश्रा की पीठ ने कहा, एक अच्छे विवाह की नींव सहिष्णुता, समायोजन और एक-दूसरे का सम्मान करना है। एक-दूसरे की गलतियों को एक निश्चित सहनीय सीमा तक सहन करना हर विवाह में अंतर्निहित होना चाहिए। छोटी-मोटी नोक-झोंक, छोटे-मोटे मतभेद सांसारिक मामले हैं। इन्हें बढ़ा-चढ़ाकर पेश नहीं किया जाना चाहिए। शीर्ष अदालत ने कहा, पूरे मामले को संवेदनशीलता से संभालने के बजाय, आपराधिक कार्यवाही शुरू करने से एक-दूसरे के लिए नफरत के अलावा कुछ नहीं आएगा। इस टिप्पणी के साथ शीर्ष अदालत ने पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय के आदेश को खारिज कर दिया। हाईकोर्ट में दायर याचिका ने पति ने अपने खिलाफ दर्ज आपराधिक मामले को रद्द करने की अपील की थी, लेकिन अदालत ने याचिका खारिक कर दी।
उच्चतम न्यायालय ने केंद्र सरकार से कहा है कि व्यावहारिक वास्तविकताओं पर विचार करने के बाद भारतीय न्याय संहिता की धारा 85 और 86 में जरूरी बदलाव करने पर विचार करे। अदालत ने कहा कि झूठी या मनगढ़ंत शिकायतों के लिए इनके दुरुपयोग को रोकना जरूरी है। शीर्ष अदालत ने कहा कि 14 साल पहले भी केंद्र से दहेज विरोधी कानून पर फिर से विचार करने को कहा गया था। ऐसा इसलिए क्योंकि बड़ी संख्या में शिकायतें ऐसी मिलीं जिसमें घटनाओं को बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया गया। शुक्रवार को न्यायमूर्ति जेबी पारदीवाला और न्यायमूर्ति मनोज मिश्रा की पीठ ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट भारतीय न्याय संहिता, 2023 की धारा 85 और 86 पर गौर करेगी। अदालत विचार करेगी कि क्या कानूनी प्रावधानों और व्यावहारिक यथार्थों पर न्यायालय के सुझावों के आलोक में गंभीरता से गौर किया है।
कानून की धाराओं में क्या है?
बता दें कि भारतीय न्याय संहिता की धारा 85 के मुताबिक किसी भी महिला का पति या पति का रिश्तेदार उसके साथ क्रूरता करेगा, उसे तीन साल तक की कैद की सजा दी जाएगी। हिंसा के उत्तरदायी होने पर भी जेल भेजा जाएगा। धारा 86 में 'क्रूरता' की परिभाषा का विस्तार किया गया है। अब क्रूरता के दायरे में महिला को मानसिक और शारीरिक दोनों तरह की हानि पहुंचाना शामिल है। गौरतलब है कि 1 जुलाई से ये कानूनी प्रावधान देशभर में लागू हो जाएंगे।