सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी (सुभासपा) के विधायक अब्बास अंसारी की पत्नी निखत बानो को जमानत दे दी है। दरअसल, बानो को जेल में अपने पति के साथ कथित गैरकानूनी मुलाकात के लिए गिरफ्तार किया गया था।
न्यायमूर्ति एएस बोपन्ना और न्यायमूर्ति एमएम सुंदरेश की पीठ ने निखत को राहत दी है। पीठ का कहना है कि याचिकाकर्ता एक साल के बच्चे की मां है। इसके अलावा, कोर्ट ने बानो को निचली अदालत से अनुमति लिए बिना अपने पति अब्बास अंसारी से मिलने पर भी रोक लगा दी है। बता दें, मऊ से विधायक एवं जेल में बंद गैंगस्टर मुख्तार अंसारी का बेटा अब्बास अंसारी धनशोधन मामले में कासगंज की एक जेल में बंद है।
इलाहाबाद हाईकोर्ट के आदेश को चुनौती
यह है मामला
पुलिस और जिला प्रशासन ने गत फरवरी में नियमों का उल्लंघन करके अंसारी और उसकी पत्नी बानो के साथ-साथ उनके चालक नियाज की मुलाकात की जानकारी मिलने पर चित्रकूट जिला जेल में छापा मारा था। बानो के पास से कई मोबाइल फोन और विदेशी मुद्रा समेत अन्य सामग्री मिली थी। बाद में बानो और नियाज दोनों को गिरफ्तार कर लिया गया था।
बानो पर यह हैं आरोप
पुलिस ने जेल वार्डन जगमोहन, जेलर संतोष कुमार, जेल अधीक्षक अशोक कुमार सागर और उप जेलर चंद्रकला को भी गिरफ्तार किया था। इस मामले में अंसारी, निखत बानो, नियाज, खान और नवनीत सचान के खिलाफ आरोपपत्र दाखिल किया गया है। इस संबंध में 11 फरवरी को उपनिरीक्षक श्याम देव सिंह की शिकायत पर कर्वी थाने में मामला दर्ज किया गया था।
याचिकाओं पर पेज सीमा के लिए याचिका पर सुप्रीम ने कही बड़ी बात
सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को एक याचिका में व्यक्त की गई चिंता को प्रशंसनीय बताया, जिसमें अदालतों में दायर याचिकाओं पर पृष्ठ सीमा की आवश्यकता को उठाया गया था, लेकिन कहा कि इस प्रकृति की एक आकार सभी के लिए उपयुक्त दिशा तय करना मुश्किल हो सकता है। मुख्य न्यायाधीश डी वाई चंद्रचूड़ की अध्यक्षता वाली पीठ ने कहा कि यदि याचिकाकर्ता के पास मामलों के शीघ्र निपटान की सुविधा के लिए प्रशासनिक पक्ष पर कोई ठोस सुझाव है, तो वह शीर्ष अदालत के महासचिव के समक्ष एक प्रतिनिधित्व रखने के लिए स्वतंत्र हो सकता है।
एम3एम के निदेशकों की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र और ईडी से जवाब मांगा
सुप्रीम कोर्ट ने गुरुग्राम स्थित रियल्टी समूह एम3एम के निदेशकों बसंत बंसल और पंकज बंसल की पंजाब व हरियाणा उच्च न्यायालय के उस आदेश के खिलाफ दायर याचिका पर शुक्रवार को केंद्र व प्रवर्तन निदेशालय से जवाब मांगा, जिसमें एक पूर्व न्यायाधीश के खिलाफ कथित रिश्वतखोरी के मामले से जुड़ी धनशोधन जांच में उन्हें जमानत पर रिहा करने से इनकार कर दिया गया था। न्यायमूर्ति एएस बोपन्ना और न्यायमूर्ति एमएम सुंदरेश की पीठ ने केंद्र सरकार और प्रवर्तन निदेशालय को नोटिस जारी कर तीन सप्ताह के भीतर जवाब देने को कहा है।
विपक्षी गठबंधन के नाम के खिलाफ याचिका पर विचार से सुप्रीम इन्कार
सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को विपक्षी गठबंधन का नाम इंडिया रखे जाने के खिलाफ दाखिल याचिका पर सुनवाई से इन्कार कर दिया। अदालत ने याचिकाकर्ता को चुनाव आयोग के पास जाने की सलाह दी। जस्टिस संजय किशन कौल और जस्टिस सुधांशु धूलिया की पीठ ने याचिकाकर्ता से कहा, इस तरह का मामला चुनाव आयोग के समक्ष रखा जाना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट इस मामले पर सीधे सुनवाई नहीं कर सकता है। याचिका वकील रोहित खेरीवाल ने दायर की थी। इसमें कहा गया था कि किसी भी राजनीतिक दल या गठबंधन को खुद को इंडिया कहने की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए। सुनवाई के दौरान रोहित खेरीवाल ने कहा कि राजनीतिक दलों में खुद को ज्यादा राष्ट्रवादी दिखाने की होड़ मची हुई है। इस पर जस्टिस कौल ने पूछा कि क्या यह कोर्ट इस होड़ पर नियंत्रण लगा सकता है? अदालत ने कहा, हम यहां राजनीतिक दलों की नैतिकता पर सुनवाई नहीं कर सकते हैं।
आनंद मोहन संग रिहा कितने लोग लोक सेवकों की हत्या के हैं दोषी?
सुप्रीम कोर्ट ने बिहार सरकार से सवाल किया कि पूर्व लोकसभा सांसद आनंद मोहन के साथ इस साल अप्रैल में रिहा किए गए कितने लोगों को ड्यूटी पर लोक सेवकों की हत्या का दोषी ठहराया गया था। बिहार सरकार ने शीर्ष अदालत को सूचित किया था कि 1994 में गोपालगंज के तत्कालीन जिला मजिस्ट्रेट जी कृष्णैया की हत्या के मामले में आजीवन कारावास की सजा काट रहे आनंद मोहन समेत कुल 97 दोषियों को एक ही समय में समय से पहले रिहा कर दिया गया था। जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस दीपांकर दत्ता की पीठ ने बिहार सरकार के वकील रंजीत कुमार को अतिरिक्त हलफनामा दायर कर लोक सेवक की हत्या में रिहा किए गए दोषियों का विवरण देने को कहा। मृतक कृष्णैया की पत्नी उमा कृष्णैया के वकील सिद्धार्थ लूथरा ने पीठ से अनुरोध किया कि सरकार को आनंद मोहन को दी गई छूट के मूल रिकॉर्ड उन्हें देने के लिए कहा जाए ताकि वे अपनी प्रतिक्रिया तैयार कर सकें। कुमार ने अनुरोध पर आपत्ति जताई और कहा कि कोई गलत काम नहीं हुआ। इस पर जस्टिस दत्ता ने पूछा, क्या इन सभी 97 लोगों को, जिन्हें छूट दी गई थी, एक लोक सेवक की हत्या का दोषी ठहराया गया था और यदि नहीं, तो कितने लोग ऐसे अपराध के दोषी थे।
विवरण दें, जिन्हें छूट दी गई
जस्टिस दत्ता ने कहा, याचिकाकर्ता का मामला यह है कि मोहन को लाभ पहुंचाने के लिए छूट नीति में बदलाव किया गया था। आप उन व्यक्तियों के बारे में विवरण प्रस्तुत करें जिन्हें लोक सेवकों की हत्या के लिए दोषी ठहराया गया था और छूट दी गई थी। सुप्रीम कोर्ट में आनंद मोहन की रिहाई के खिलाफ कृष्णैया की पत्नी की याचिका पर निर्णायक सुनवाई 26 सितंबर को होगी।
याचिका के पन्नों का आकार तय नहीं कर सकते
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अदालतों में दाखिल की जाने वाली याचिकाओं में पन्नों की सीमा तय करने का मुद्दा प्रंशसनीय तो है लेकिन इस तरह का कोई नियम बनाना बेहद मुश्किल है। क्योंकि सभी मामलों के लिए कोई एक आकार तय नहीं किया जा सकता। सीजेआई जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़, जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस मनोज मिश्रा की पीठ ने कहा, यदि याचिकाकर्ता के पास मामलों के शीघ्र निपटान की सुविधा के लिए प्रशासनिक पक्ष पर कोई ठोस सुझाव है, तो वह शीर्ष अदालत के महासचिव के समक्ष एक प्रतिनिधित्व रखने के लिए स्वतंत्र है। याचिकाकर्ता के वकील ने पीठ को बताया कि उनकी अपील पूरी तरह से न्याय तक बेहतर पहुंच सुनिश्चित करने का एक प्रयास है।
प्रशासनिक पक्ष पर कर सकते हैं विचार
सीजेआई ने कहा, लेकिन हमें बताएं कि हम कैसे सीमा तय कर दें। क्या हम कह सकते हैं कि सभी मामलों में लिखित आवदेनों के लिए पन्नों की एक सीमा होनी चाहिए? एक तरफ, आपके पास अनुच्छेद 370 (मामले) पर सुनवाई करने वाली संविधान पीठ है और फिर आपके पास उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम के तहत एक याचिका है। क्या हम कह सकते हैं कि आपके पास 10 पन्नों से अधिक लिखित प्रस्तुति नहीं होनी चाहिए। सीजेआई ने कहा, अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट का क्षेत्राधिकार हमसे बहुत अलग है। याचिकाकर्ता के वकील ने कहा, इस मुद्दे पर शीर्ष अदालत के प्रशासनिक पक्ष में विचार किया जा सकता है।