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निर्भया जैसे मामलों में न्याय में देरी से आक्रोशित होती है जनता : सुप्रीम कोर्ट

Thu, 19 Dec 2019 02:08 AM IST
गौरव पाण्डेय न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली

सार

  • दुष्कर्म कानून के अनुपालन को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने लिया स्वत: संज्ञान
  • राज्यों व हाईकोर्ट को ऐसे मामलों में स्टेट रिपोर्ट दाखिल करने को कहा
  • सुप्रीम कोर्ट ने निर्भया फंड के इस्तेमाल को लेकर भी जानकारी मांगी
  • कहा, कानून में कई संशोधन हुए लेकिन उद्देश्य प्राप्त नहीं हो सका
  • इस मामले में वरिष्ठ वकील सिद्धार्थ लूथरा अमाइकस क्यूरी नियुक्त
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सांकेतिक तस्वीर - फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स
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विस्तार
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सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को स्वत: संज्ञान लेते हुए बलात्कार व यौन अपराध के मामलों में आपराधिक कानून के अनुपालन का परीक्षण करने का निर्णय लिया है। शीर्ष अदालत ने कहा है कि इस तरह के मामलों में देरी से हाल में यह देखा गया कि लोग प्रदर्शन करने पर मजबूर हो जाते हैं और उनके दिमाग में चिंता व असंतोष की भावना आ जाती है।

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सुप्रीम कोर्ट ने सभी राज्यों व हाईकोर्ट को ऐसे मामलों में जांच, अभियोजन, मेडिको-फोरेंसिक, पुनर्वास और लीगल एड एजेंसियों की कार्यप्रणाली पर स्टेट रिपोर्ट दाखिल करने के लिए कहा है। चीफ जस्टिस एसए बोबडे की अध्यक्षता वाली पीठ ने इस मामले में वरिष्ठ वकील सिद्धार्थ लूथरा को अमाइकस क्यूरी नियुक्त किया है।

चीफ जस्टिस एसए बोबडे की अध्यक्षता वाली पीठ ने पाया कि वर्ष 2012 में निर्भया गैंगरेप के बाद पूरा देश सदमे में था। इसके बाद यौन आपराधिक कानून में कई संशोधन हुए लेकिन बलात्कार की घटनाओं में कमी लाने के उद्देश्य की प्राप्ति नहीं हो सकी है।

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2017 में दर्ज हुए दुष्कर्म के 32,559 मुकदमे

नेशनल क्राइम रिकार्ड ब्यूरो के साल 2017 के रिकॉर्ड के मुताबिक, भारत में दुष्कर्म के 32,559 मुकदमे दर्ज किए गए। इन मामलों में देरी के कारण प्रदर्शन हुए और लोगों के मन में चिंता और अशांति घर कर गई। निर्भया मामला भी इससे अछूता नहीं है क्योंकि अब भी यह आखिरी मुकाम पर पहुंच नहीं सका है। वास्तव में यह उन मामलों में से एक है जब जांच एजेंसियों ने जनमानस में गुस्से का माहौल देखते हुए जल्द काम किया।

सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि ऐसे में अदालत के लिए दखल देना आवश्यक है। अदालत के लिए जमीनी हकीकत का पता लगाना जरूरी है कि उन संशोधनों पर कितना अमल हुआ। अदालत के लिए यह देखना जरूरी हो गया कि जांच एजेंसियां, अभियोजन पक्ष, मेडिको-फॉरेंसिक एजेंसी, पुनर्वास, लीगल एड एजेंसी और अदालतें किस तरह से इन मामलों को देख रही हैं।

सुप्रीम कोर्ट के सेक्रेटरी जनरल को यह निर्देश दिया गया है कि वह सभी राज्य के मुख्य सचिवों, पुलिस महानिदेशकों और हाईकोर्ट के रजिस्ट्रार जनरल से रिकॉर्ड हासिल करने में मदद करने के लिए कहा है। सभी राज्यों व केंद्रशासित प्रदेशों से यौन अपराध मामलों में गाइडलाइंस का अनुपालन सहित अन्य पहलुओं पर रिकार्ड तलब किया है। राज्यों का यह बताने के लिए कहा गया कि क्या जांच और ट्रायल के चरण में प्रक्रिया का पालन हुआ या नहीं? साथ ही कोर्ट ने निर्भया फंड के इस्तेमाल पर भी जानकारी मांगी है।

साथ ही चीफ जस्टिस की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय पीठ यह भी जानना चाहती है कि बलात्कार के मामलों में अब भी टू-फिंगर टेस्ट किया जा रहा है। राज्य सरकारों को इस बारे में जानकारी देने के लिए कहा गया है। साथ ही पीठ ने पीड़िता और गवाहों की सुरक्षा को लेकर भी स्टेटस रिपोर्ट दाखिल करने के लिए कहा है। कोर्ट इस मामले में सात जनवरी को सुनवाई करेगा।

कानून के अमल और स्थिति के बारे में जानकारी जुटाने की जरूरत

पीठ ने कहा कि दुष्कर्म से संबंधित कानून के प्रावधानों पर अमल और स्थिति के बारे में जानकारी जुटाने की आवश्यकता है। पीठ ने न्यायालय की मदद के लिए इस मामले में वरिष्ठ अधिवक्ता सिद्धार्थ लूथरा को न्याय मित्र नियुक्त किया है।
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निर्भया मामले पर सुप्रीम कोर्ट ने कहा, पूर्व के आदेश में कोई गलती नहीं

निर्भया मामले में फांसी की सजा पाए अक्षय कुमार सिंह की पुनर्विचार याचिका खारिज करते हुए जस्टिस आर भानुमति की पीठ ने कहा, पूर्व के आदेश में कोई गलती नहीं है। इस पुनर्विचार याचिका में वहीं आधार लिए गए थे जो बाकी के तीन दोषियों द्वारा उठाए गए थे, जो पहले ही खारिज हो चुकी हैं। 

अक्षय की ओर से पेश वकील एपी सिंह ने पीठ से कहा कि यह पूरा मामला मीडिया और राजनीतिक दबाव में हुआ है। सिंह ने मामले की जांच पर सवाल उठाते हुए कहा कि जब जांच एजेंसी असली गुनहगार को पकड़ने में नाकामयाब रही तो उसने अक्षय को पकड़ लिया था। 

उन्होंने यह भी कहा कि इस मामले के दोषियों को फांसी पर जल्द लटकाने के लिए कवायद चल रही है, वहीं दूसरे मामलों में फांसी की सजा पाए दोषियों की अब तक फांसी नहीं हुई है। फांसी की सजा मानवाधिकार के विपरीत है। दिल्ली में प्रदूषण का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि गैस चैंबर बन चुकी दिल्ली में ऐसे ही लोगों की आयु घट रही है ऐसे में फांसी की सजा की कोई जरूरत नहीं है। 

मालूम हो कि मई 2017 में को सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले के चारों दोषियों की फांसी की सजा को बरकरार रखा था। इसके बाद विनय, पवन और मुकेश ने पुनर्विचार याचिकाएं दायर की थी लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने उनकी याचिकाओं को खारिज कर दिया था। उस वक्त अक्षय ने पुनर्विचार याचिका दायर नहीं की थी। गत 10 दिसंबर को अक्षय ने पुनर्विचार याचिका दायर की थी।
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