केरल
लव जिहाद मामले में चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा की अध्यक्षता वाली पीठ ने कहा कि किसी वयस्क द्वारा अपनी पंसद से शादी करने के निर्णय पर अदालत दखल नहीं दे सकती।
पीठ ने कहा कि हम यह नहीं कह सकते यह शादी उसके हित में नहीं है। यह अदालत का काम नहीं है कि वह यह तय करें कि किसी व्यक्ति द्वारा लिए गए शादी का निर्णय सही है या नहीं? हम इस आधार पर विवाह को शून्य करार नहीं दे सकते कि जिस व्यक्ति से महिला ने शादी की है वह सही चयन नहीं है।
मालूम हो कि केरल हाईकोर्ट ने हिन्दू धर्म से इस्लाम धर्म कुबूल कर हादिया द्वारा मुस्लिम युवक शफीन जहां से की गई शादी को शून्य करार दिया था और हादिया को उसके पिता की कस्टडी में भेज दिया था।
गुरुवार को सुनवाई के दौरान हादिया के पिता की ओर से पेश वरिष्ठ वकील श्याम दीवान ने केरल हाईकोर्ट के फैसले को सही बताते हुए कहा कि उपलब्ध तथ्य व साक्ष्यों पर शादी को शून्य करार दिया गया था।
हाईकोर्ट के सामने ऐसे तथ्य थे जो इशारा कर रहे थे कि गैरकानूनी उद्देश्यों के लिए धर्म परिवर्तन का काम चल रहा है। उन्होंने कहा कि हाईकोर्ट अनुच्छेद-226 के तहत अपने अधिकार का प्रयोग करते हुए महिला के संरक्षण के लिए शादी को शून्य करार दे सकता है।
इस पर पीठ ने कहा कि अगर किसी व्यक्ति का गैरकानूनी कामों से संबंध हो तो उस पर कानून के तहत कार्रवाई होगी। पीठ ने कहा अगर सरकार के पास यह पुख्ता जानकारी है कि गैरकानूनी उद्देश्यों के लिए लोगों की विदेशों मे भर्तियां की जा रही है तो सरकार उनकी विदेश यात्रा को रोक सकती है। लेकिन जहां तक पति-पत्नी के संबंध की बात है अदालत इसमें दखल नहीं दे सकती। अदालत यह नहीं कह सकती कि इस मामले में शादी करने की सहमति सही नहीं नजर आ रही है। अगली सुनवाई आठ मार्च को होगी।
मालूम हो कि हादिया ने सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा दायर कर कहा था कि वह मुस्लिम है और मुस्लिम ही बना रहना चाहती है। उसने कहा कि उसने अपनी मर्जी से इस्लाम धर्म कुबूल किया है और शादी की है। उसने कहा है कि वह अपने पति के साथ जीवन व्यतीत करना चाहती है। फिलहाल अदालती निर्देश के तहत हादिया अपनी अधूरी पढ़ाई पूरी कर रही है।