सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि जहां कानून का शासन लागू करने की आवश्यकता होती है वहां करुणा और सहानुभूति की कोई भूमिका नहीं होती है। जस्टिस बीवी नागरत्ना और जस्टिस उज्जल भुइयां की पीठ ने बिलकिस बानो मामले में 11 दोषियों को आत्मसमर्पण करने का आदेश देते हुए कहा, कानून के शासन का अस्तित्व और कानून के दायरे में लाए जाने का डर उन लोगों के लिए एक निवारक के रूप में काम करता है, जिन्हें अपने हितों के लिए दूसरों की हत्या करने में कोई संकोच नहीं होता।
छूट के आदेशों में कोई त्रुटि नहीं
पीठ ने कहा, अदालतों को न्याय देना चाहिए। वास्तव में भारत में अदालतों की ताकत और अधिकार इसलिए हैं क्योंकि वे न्याय देने में शामिल हैं। यह उनका लक्ष्य होना चाहिए। पीठ ने दोषियों की उस दलील को खारिज कर दिया कि वे 10 अगस्त, 2022 से स्वतंत्रता का आनंद ले रहे हैं और छूट के आदेशों में कोई त्रुटि नहीं है। उनका कहना था कि भले ही छूट के आदेशों को अनुच्छेद 142 के तहत अधिकार क्षेत्र का प्रयोग करके रद्द किया जा सकता है, लेकिन संविधान के अनुसार उन्हें दोबारा कारावास की सजा नहीं दी जा सकती और वे स्वतंत्र व्यक्ति के रूप में जेल से बाहर रह सकते हैं।
पीठ ने कहा, हम यह स्पष्ट करना चाहते हैं कि जब कानून का शासन कायम होगा तभी हमारे संविधान के तहत स्वतंत्रता और अन्य सभी मौलिक अधिकार कायम रहेंगे, जिसमें अनुच्छेद 14 में निहित समानता और कानून की समान सुरक्षा का अधिकार भी शामिल है। पीठ ने कहा, कानून के शासन के अभाव में या इसे नजरअंदाज कर या आंखें मूंद लेने की स्थिति में हमारे संविधान के तहत किसी व्यक्ति की स्वतंत्रता का कोई मतलब नहीं रह जाएगा।
गवाह ने कहा-न्याय मिला, फैसले से खुश रिश्तेदारों ने चलाए पटाखे
फैसले पर संतोष जताते हुए गवाह देवगढ़ बारिया के अब्दुल रजाक मंसूर ने कहा कि आज जाकर न्याय मिला। वहीं, दाहोद के देवगढ़ बारिया शहर में बिलकिस बानो के कुछ रिश्तेदारों ने फैसले पर खुशी जाहिर करते हुए पटाखे चलाए।
सीने से पहाड़ जितना बड़ा पत्थर उतर गया : बानो
सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद बिलकिस बानो ने कहा, मेरी आंखें राहत के आंसुओं से भींग गई हैं। पिछले डेढ़ साल में आज पहली बार मेरे चेहरे पर मुस्कान आई। मैंने अपने बच्चों को गले लगाया और मुझे ऐसा लग रहा है कि मेरे सीने से पहाड़ जितना बड़ा पत्थर उतर गया। उन्होंने यह बयान अपनी वकील शोभा गुप्ता के जरिये जारी किया है। बानो ने कहा, अब मैं सांस ले पा रही हूं। यही न्याय का अहसास है। मेरे लिए, मेरे बच्चों और हर जगह की हर एक महिला के लिए समान न्याय का समर्थन करने और उम्मीद की रौशनी के वादे के लिए मैं भारत के माननीय सुप्रीम कोर्ट का शुक्रिया अदा करती हूं। ब्यूरो
बिलकिस ने आगे कहा कि मैंने पहले भी कहा है और फिर से कह रही हूं कि जिस तरह की मेरी यात्रा रही है उस पर अकेले नहीं चला जा सकता। मेरी इस यात्रा में मेरे पति और मेरे बच्चे हमेशा मेरे साथ रहे। मेरे साथ मेरे दोस्त थे जिन्होंने इतने नफरत के समय में मुझे बहुत सारा प्यार दिया और मेरा हाथ थामे रखा। मेरे साथ मेरी बेहतरीन वकील शोभा गुप्ता हैं जो पिछले 20 सालों से मेरे साथ मजबूती और दृढ़ता के साथ चल रही हैं और जिन्होंने न्याय के प्रति मेरी उम्मीद को कभी खोने नहीं दिया।
उन्होंने कहा कि जिन लोगों ने मेरे परिवार को खत्म कर दिया और मेरे अस्तित्व को आतंक से भर दिया था, डेढ़ साल पहले 15 अगस्त 2022 को जब उन्हें पूरी सजा से पहले ही छोड़ दिया गया तो उस वक्त मैं टूट गई थी। मुझे लगा कि साहस का मेरा भंडार खत्म हो गया है, लेकिन तब तक ही जब तक लाखों की संख्या में लोगों की एकजुटता मेरे पास नहीं थी।
सजा माफी के लिए महाराष्ट्र सरकार से अपील कर सकते हैं दोषी
बिलकिस बानो मामले में 11 दोषी अपनी सजा माफ करने के अब महाराष्ट्र सरकार से गुहार कर सकते हैं। सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि गुजरात सरकार के पास दोषियों को दी गई सजा की माफी के लिए आवेदनों पर विचार करने का कोई अधिकार क्षेत्र नहीं है। केवल उस राज्य की सरकार ही ऐसे आवेदनों पर विचार करने के लिए सक्षम है, जहां अपराधियों पर मुकदमा चलाया गया और सजा सुनाई गई। बानो के सबूतों के साथ छेड़छाड़ और गवाहों की जान खतरे में होने की आशंका जताने पर गुजरात हाईकोर्ट ने मामले की सुनवाई अहमदाबाद से मुंबई स्थानांतरित कर दी थी। शीर्ष अदालत ने अपने फैसले में यह भी कहा कि हम एक अन्य कारण से ऐसा कह रहे हैं कि यदि दोषी कानून के अनुसार छूट मांगने के इच्छुक हैं तो उन्हें जेल में रहना होगा क्योंकि जमानत पर या जेल के बाहर होने पर वे छूट नहीं मांग सकते हैं।