सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि कल्याणकारी योजनाएं या कानून लाने से पहले सरकारों को राज्य के खजाने पर पड़ने वाले वित्तीय प्रभाव का आकलन करना चाहिए। योजनाओं को समग्रता से नहीं देखने पर यह जुमला बनकर रह जाएंगी। जस्टिस यूयू ललित, जस्टिस एस रवींद्र भट और जस्टिस पीएस नरसिम्हा की पीठ ने बुधवार को कहा कि शिक्षा का अधिकार कानून अदूरदर्शिता का सटीक उदाहरण है।
केंद्र सरकार से दो हफ्ते में रिपोर्ट देने को कहा
कोर्ट ने पाया कि केंद्र सरकार ने रिपोर्ट दाखिल करने के लिए कुछ और समय की मांग की है। लिहाजा केंद्र को दो हफ्ते में रिपोर्ट दाखिल करने के लिए कहा है। अगली सुनवाई 26 अप्रैल को होगी। पीठ ने इससे पहले संरक्षण अधिकारी नामित करने की प्रथा को खारिज कर दिया था।
संरक्षण अधिकारियों की कमी से योजना पर असर
पीठ ने 25 फरवरी को मामले की सुनवाई के दौरान पाया था कि कई राज्यों ने अधिनियम के तहत राजस्व अधिकारियों या आईएएस अधिकारियों को ‘संरक्षण अधिकारी’ के रूप में नामित करने के लिए चुना था। कोर्ट ने कहा था कि यह कानून निर्माताओं की मंशा नहीं थी, क्योंकि ऐसे अधिकारी इस काम को करने के लिए अपेक्षित समय नहीं दे पाएंगे। कोर्ट ने यह भी पाया था कि कुछ राज्यों में संरक्षण अधिकारियों की संख्या कम है। इसके बाद कोर्ट ने केंद्र सरकार से हलफनामा दायर कर इस संबंध में विस्तृत जानकारी देने के लिए कहा था।