सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को सीईसी और ईसी की नियुक्ति वाले नए कानून मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्त अधिनियम, 2023 की धारा 7 के संचालन पर रोक लगाने से इनकार कर दिया। शीर्ष अदालत ने केंद्र सरकार को नोटिस भी जारी किया है। इस कानून में मुख्य चुनाव आयुक्त और चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति की सिफारिश वाली समिति में सीजेआई को शामिल नहीं किया गया है। नए कानून में समिति में प्रधानमंत्री (अध्यक्ष) और लोकसभा में विपक्ष के नेता व प्रधानमंत्री की ओर से नामित एक केंद्रीय कैबिनेट मंत्री का प्रावधान है।
जस्टिस संजीव खन्ना और जस्टिस दीपांकर दत्ता की पीठ ने हालांकि इस प्रावधान को चुनौती देने वाली एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (एडीआर) की याचिका को इसी तरह के एक पुराने मामले के साथ जोड़ दिया। पीठ ने कहा, लंबित याचिका को अप्रैल में सूचीबद्ध किया गया है, इस नई याचिका पर सुनवाई पुरानी याचिका के साथ होगी।
सुनवाई के दौरान एडीआर की ओर से पेश वकील प्रशांत भूषण ने पीठ से धारा 7 पर रोक लगाने की गुहार लगाई। यह देखते हुए कि चुनाव आयुक्त अनूप चंद्र पांडे 14 फरवरी को सेवानिवृत्त हो रहे हैं, पीठ ने कहा कि वह इस अंतरिम प्रार्थना को स्वीकार नहीं कर सकती। भूषण ने कहा कि यदि आगामी लोकसभा चुनाव से पहले रोक नहीं लगाई गई तो प्रार्थनाएं निरर्थक हो सकती हैं। इस पर जस्टिस खन्ना ने कहा कि साांविधानिक वैधता के मामले कभी भी निष्फल नहीं होते। यह कहते हुए पीठ ने भूषण के अनुरोध पर विचार करने से मना कर दिया।
सॉलिसिटर जनरल को नोटिस जारी करने की मांग भी ठुकराई
सुप्रीम कोर्ट ने भूषण के इस अनुरोध को भी ठुकरा दिया कि भारत के सॉलिसिटर जनरल को नोटिस जारी किया जाए और मामले को अगले सप्ताह सूचीबद्ध किया जाए। जस्टिस खन्ना ने कहा, यह ऐसा मामला नहीं है जिस पर इस तरह निर्णय लिया जा सकता है। इसमें समय लगेगा। ऐसे मामलों में हमें कई पहलुओं पर गौर करना होता है।
याचिका में दावा, अधिनियम ने शीर्ष अदालत के एक फैसले को पलटा
याचिका में कहा गया कि इस अधिनियम ने अनूप बरनवाल बनाम भारत सरकार (2023) में शीर्ष न्यायालय की संविधान पीठ के फैसले को पलट दिया है। उस फैसले में कहा गया था कि चुनाव आयोग के सदस्यों की नियुक्ति को कार्यपालिका के हाथों में छोड़ना लोकतंत्र की सेहत और स्वतंत्र व निष्पक्ष चुनाव के संचालन के लिए गंभीर रूप से हानिकारक होगा।
अनूप बरनवाल मामले में कोर्ट ने निर्देश दिया था कि सीईसी और ईसी के पदों पर नियुक्ति प्रधानमंत्री, लोकसभा में विपक्ष के नेता और सीजेआई की समिति की सलाह के आधार पर राष्ट्रपति करेंगी। याचिकाकर्ता संगठन का कहना है कि 2023 अधिनियम ने सीजेआई के स्थान पर एक कैबिनेट मंत्री (प्रधानमंत्री द्वारा नामित) को शामिल कर दिया गया है। याचिका में बताया गया है कि 2023 अधिनियम लोकसभा में ऐसे समय पारित किया गया था जब अधिकतर विपक्षी संसद सदस्यों को लोकसभा स्पीकर ने निलंबित कर दिया था।