सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र से सवाल किया कि आनुवंशिक रूप से संशोधित (जीएम) फसलों की जैव सुरक्षा पर अदालत की ओर से नियुक्त तकनीकी विशेषज्ञ समिति (टीईसी) की रिपोर्ट पर जेनेटिक इंजीनियरिंग मूल्यांकन समिति (जीईएसी) ने ध्यान क्यों नहीं दिया। इस मामले पर सुनवाई 16 जनवरी को फिर शुरू होगी।
जस्टिस बीवी नागरत्ना और जस्टिस संजय करोल की पीठ ने केंद्र की ओर से पेश अटॉर्नी जनरल आर वेंकटरमणी से पूछा कि क्या जीईएसी या विशेषज्ञों की उपसमिति ने ट्रांसजेनिक सरसों संकर डीएमएच-11 को पर्यावरणीय स्तर पर जारी किए जाने की मंजूरी देने के 25 अक्तूबर, 2022 के फैसले से पहले टीईसी की रिपोर्टों पर कभी विचार किया था। अटॉर्नी जनरल ने कहा कि एक वैधानिक निकाय होने के नाते जीईएसी को इन रिपोर्टों पर विचार नहीं करना चाहिए, लेकिन हर वैज्ञानिक निष्कर्ष पर विचार किया गया है। इस पर जस्टिस नागरत्ना ने कहा, हम ऐसा क्यों पूछ रहे हैं इसका कारण यह है कि जीईएसी शून्य में काम नहीं कर रहा था। यह अनियंत्रित नहीं है। ये रिपोर्टें हैं जिनमें अदालत को इस मुद्दे पर सौंपी गई एक असहमति रिपोर्ट भी शामिल है।
पूछा, दस्तावेज पर विचार नहीं करना तो रिपोर्टों को क्यों महत्व दिया जाना चाहिए
पीठ ने पूछा, यदि जीईएसी को इन दस्तावेज पर विचार नहीं करना है तो इन रिपोर्टों को क्या महत्व दिया जाना चाहिए? वेंकटरमणी ने कहा कि टीईसी की सिफारिशों और केंद्र द्वारा उठाए गए कदमों के विस्तृत विश्लेषण से पता चलता है कि जीएम फसलों के पर्यावरणीय जोखिम मूल्यांकन के लिए एक व्यापक, पारदर्शी और विज्ञान-आधारित ढांचा सुनिश्चित करने के लिए वर्ष 2012 से नियामकीय व्यवस्था को और मजबूत किया गया है। ट्रांसजेनिक सरसों हाइब्रिड डीएमएच-11 को दिल्ली विश्वविद्यालय के सेंटर फॉर जेनेटिक मैनिपुलेशन ऑफ क्रॉप प्लांट्स (सीजीएमसीपी) द्वारा विकसित किया गया है। सरकार ने वर्ष 2002 में व्यावसायिक खेती के लिए अबतक केवल एक जीएम फसल – बीटी कपास – को मंजूरी दी है।